मर्म, सही दृष्टिकोण का…बेहतर जीवन शैली भाग..११..अंश..१..कमल भंसाली

आज हम बेहतर जीवन शैली का सबसे अहम सवाल, जो शायद सबसे महत्वपूर्ण भूमिका व्यक्तितत्व निर्माण के दौरान निभाता है, कि हमारा नजरिया जिंदगी के प्रति क्या है ? इस पर चर्चा करते है, दोस्तों, इसे हम अपने आपसे यों भी पूछ सकते है, कि अपनी जिंदगी के प्रति हमारा दृष्टिकोण क्या है ? तय यही है, की अभी हम जिस तरह से जी रहे, वही सत्य है। जीवन के हजारों दृष्टिकोणों का मूल्यांकन समय समय पर हमारे लिए जरूरी है, परन्तु ऐसा हम नहीं करते। जितना समय हम निर्जीव साधनों की देख रेख में लगाते है, उस से कम समय शायद हम अपना आत्म निरीक्षण में लगाते है। जीवन कोई साधारण बात नहीं है, हमारे शरीर का हर अंग अपनी निश्चित कार्य प्रणाली पर निर्भर है। हम हमारी सारी आत्मिक और शारीरिक अनभूतियों से ही, उसे आनन्द और निराशा के कई रंगों के रस का रस्वादन कराते है।

सत्य है, जीवन एक है, पर दृष्टिकोण अनेक है। यह भी तय है, नजरिया बदलता है, इंसान के जीवन का स्वरुप भी बदल जाता है। एक आम इंसान अपनी सोच और आस्था से कमजोर होते जीवन को मजबूती दिला सकता है। बड़े बड़े अविष्कारों के पीछे हमने वैज्ञानिकों के दृष्टिकोणों को बार बार बदलते सुना है, तब जाकर उन्होंने बार बार उनमे सुधार किये है। हकीकत, यही कहती है, कि हम दूसरों के गुणों और अवगुणों का अवलोकन कर लेते है, पर क्या हमनें कभी समय निकाल खुद का निरीक्षण किया, शायद ज्यादातर उत्तर नहीं में ही होगा। हम विशिष्ठता से स्नेह जरुर रखते है, पर यह नहीं जानते की उत्तमता की तलाश अपने अंदर से शुरु करनी पड़ती है। जीवन के हर एक नजरिया में लचीलापन और गंभीरता का समावेश होना जरूरी है । सिद्धांत और सत्य के लिए जीने वाले सत्यकाम आज की निरर्थक आर्थिक और आधुनिक समाज की देन नहीं हो सकता। सच, यही है, हम व्यवहारिक और राजनीति युक्त सम्बंधित समाज का हिस्सा है। इस बदले हुए परिवेश में नैतिकता की स्थिति काफी कमजोर हैं और उस पर पूर्णतिया निर्भर रहना, सांसारिक शब्दों में असफलता को बुलावा देना है। समाज के ज्ञानी सुधारकों को नैतिकता की चट्टान से फिसलते, हम सब ने देखा है।

बेहतर जीवन शैली सबसे पहले यह सुझाव देगी, कि समय काल के अनुरुप हम जीवन और उसके विचारों में सक्षमता पूर्वक परिवर्तन स्वीकार करते रहेंगे। यह भी समझने कि बात है, रीति रिवाजों के नाम पर प्रदर्शित आधुनिकता से सजे आडम्बरों को हम रोक नहीं सकते, पर वक्त की जरुरत के नाम पर उनको बढ़ावा देने से हम बचे, यही सही है। बात वही है, नजरिया समाज के प्रति बदलना होगा। आज के समाज से पहले के समाज की तुलना वर्तमान से करके जी तो सकते है, पर उस जीने में सार्थकता की कमी रहेगी। आधुनिक युग के साधनों ने जगह की दूरी जरुर कम कर दी, पर मन की दूरियां बढ़ा दी।बाहरी प्यार को इतना सुंदर बना दिया की भीतर की कालिख को देखना मुश्किल हो गया। हमें इसी धरातल पर अगर जीवन को बेहतर बनाना है, तो यथार्थ को स्वीकृति देनी ही होगी। यह भी समझने की बात है, कि सब समय सब बातें सही हो,यह जरुरी नहीं है। कुछ बातें पुराने समय की अच्छाइयाँ हो सकती है, पर आज वो बुराइयों के रुप में जानी जा सकती है।

हम पर्दा प्रथा को ही ले, कुछ समय पहले इसे संस्कारों में गिना जाता था, आज इसकी बुराइयों में पहचान करायी जाती है। समय बदलता है, तो जीवन बदलता है, परन्तु रीति रिवाजों और सामाजिक नियमों में उस अनुपात में बदलाव आने में समय लगता है। आज भारतीय समाज का बदलाव बाहर से जितना आकर्षक दीखता है, वाकई क्या ऐसा है ? यह एक अनुत्तरित जिज्ञासा ही होगी, अगर हम क्षेत्र के अनुसार इसका अनुसंधान नहीं करते। किसी भी समाज का विश्लेषण उसकी आर्थिक उन्नति की भूमिका में ही अगर किया जाय, यह एक अर्द्धसत्य हीं होगा। जीवन में अर्थ (धन)के महत्व को बेहतर जीवन शैली कभी नहीं नकारती, परन्तु उससे होने वाले नकारत्मक व्यवहार पर अपनी प्रतिक्रिया जरुर कर सकती है, क्योंकि बिना व्यवहार कोई शैली तैयार नहीं हो सकती। अर्थ के बढ़ने से अगर जीवन को सकारत्मक चिंतन नहीं मिलता तो अर्थ बिना अर्थ ही जीवन को समाप्त कर देगा। अर्थ को अगर कर्म के साक्षेप देखा जाय तो हिन्दू शास्त्रों के अनुसार चार पुरुषार्थों में एक माना गया है, बाकी तीन धर्म, काम और मोक्ष है। सही कामों से हम सीमित धन प्राप्त करते है, तो उसका मानसिक स्वास्थ्य पर स्वच्छ और सकारत्मक प्रभाव पड़ता है, जो जीवन को सही गति देता है। हमे यह चिंतन जरुर करना चाहिए की धन के प्रति हमारा नजरिया अति लालसा से तो प्रभावित तो नहीं है, ना। अगर हम कहें हां, तो शायद हम ऊपर से भव्य, भीतर से खोखला जीवन जी रहे है। इससे न तो अपना भला होगा, न ही परिवार और समाज का। जिंदगी से अगर कभी अगर हम बात करे तो शायद वो सबसे पहले यहीं कहेगी की ” हां, मैं शांत और सही ढंग से जीना चाहूंगी, क्योंकि मैं बार बार धरा पर विभिन्न रुप में वापस नहीं आना चाहूंगी”।

समय आ गया है, चिंतन को बदलने का, अति साधनों के प्रयोग से शरीर और मन की अवस्था और आयु दोनों ही कम होती है, अतः हम धन अर्जन के साथ प्रेम की भावनाओं में थोड़ी पवित्रता अपना ले। कभी कभी लोग कहते है की पैसा प्रेम का दुश्मन है, बेहतर जीवन जीने वाले शायद ही कभी इस तथ्य को स्वीकार करेंगे। आज हकीकत यहीं है, पैसा है, तो प्यार है, नहीं तो आदमी बेकार है। अतः हम अगर अपने व्यक्तित्व के उच्चतम विकास में विश्वास रखते है, तो हमे सहर्ष कर्म पथ पर सही और नेक आय अर्जित अपनी संयमित जरूरतों के लिए जरुर करनी चाहिए, पर दूसरे आत्मिक विकास गुणों की बढ़ोतरी का प्रयास भी कम नहीं करना चाहिए। इस तरह जीवन दृष्टिकोणों को सही आयाम के अनुसार बदलते रहना चाहिए,।सिद्धान्तों के नाम पर हमारा अपना अड़ियल रुख जीवन को गलत दिशा नहीं दे, यह ध्यान रखकर अपने सही सिद्धांतों को भी आदर हम दे।

हमारा चिंतन बहुत सारी धारणाये जगह जगह से ग्रहण करता है, लाजमी है, सब चिंतन सही परिस्थितिया निर्मण नहीं करे। परन्तु, यह भी तय है, बहुत में से ही कुछ का सही उपयोग किया जा सकता। C.S. LEWIS ने तभी तो अपनी पुस्तक ..That Hideouts Strength में लिखते है, ” There are a dozen views about everything until you know the answer. Then there’s never more than one.”

सच तो यह भी है, कि संघर्ष में हमे अपने सही दृष्टिकोण को कभी भी घबराकर नहीं छोड़ना चाहिए कुछ ऐसा Christian D Larson कहते है कि ” so long as the man with ambition is a failure, the world will tell him to tell him to let go of his ideal, but when his ambition is realized, the world will praise him for the persistence and the determination that he manifested during his dark hours, and everybody will point to his life as an example for coming generation. This is invariably the rule.Therefore pay no attention to what the world says when you are down.Be determined to get up, to reach the highest goal you have in view, and you will.”

ध्यान देने और मनन करे हम, की धैर्य सही दृष्टिकोण की उच्चित और न्याय संगत परीक्षा है, प्रकृति का नियम यही है, जो सही है, वो ही बहुमूल्य है।…..क्रमश ……कमल भंसाली

कमल भंसाली

बेहतर जीवन शैली…भाग ५ अंश २..संपन्नता का आधार..परिवार

भारतीय परिवेश में परिवार की उष्णता आज भी बरकरार है, हालांकि,आर्थिक और संचारिक प्रणाली ने कहीं इसकी गरिमा बढ़ाई तो कहीं इसकी आस्था को ठेस भी पँहुचाई । आज दोस्तों, हम परिवार की आत्मा के बारे में चिंतन करने की चेष्टा करते है। अगर शास्त्रों की माने तो परिवार का इतिहास मानव विकास के हजारों वर्ष बाद हुआ। शुरुआती मानव, दैनिक देह कर्म में ही लगा रहता, प्रकृति के दिए फल और शिकार आदि से अपनी क्षुधा शांत करता।परन्तु, जब से उसने दिमाग से काम लेना शुरु किया, तब उसने परिवार और समाज का निर्माण करना शुरु कर दिया। आज परिवार शब्द कई नई कठिन परिस्थितियों का सामना कर संकुचित होने कि स्थिति में जा रहा है। हम अभी तो यह नहीं कह सकते कि आनेवाले समय में “परिवार” शब्द इतिहास बन जाएगा, परन्तु यह तो तय है कि स्थिति खतरनाक मोड़ पर है ।अगर हम इस विचारधारा के कायल है और हम मानते है कि परिवार का अस्तित्व मानव कल्याण के लिए जरुरी है, तब हम साथ में बने रहे और अपने विचारों से इस प्रयास को साथ दे, कि परिवार सुखी जीवन के लिए जरुरी है।

समय साक्षी रहेगा, जो nuclear family (एकल परिवार) के शुभचिंतक है, उन्हें अपनी भूल समझ में आ जायेगी परन्तु तब तक शायद बहुत देर हो जाए । वक्त की बात है कि जो परिवारों के सहयोग से बने, आज वही इस व्यवस्था का विरोध कर रहे है ।इतिहास भी गवाही दे सकता है, कि महान आत्माए परिवार के संस्कारों के ही प्रयास से निखरती है। सभी जानते है की आज साधन और अर्थ जीवन की महत्व पूर्ण जरुरत है, परन्तु ऐसा तो पहले भी वक्त के अनुसार रहता था। सवाल उठता है कि, फिर परिवार को क्यों नकारा जाता है ? क्यों परिवारों में स्नहे, प्यार, सहानुभूति, और सेवा की कमी हो गई । माँ, बाप और बुजर्गो के साथ युवकों के सम्बन्ध क्यों गरिमापूर्ण नहीं रहे ? क्यों नारी का संस्कारी स्वभाव अपनी सुंदरता खो रहा है ? क्यों भाई, बहन, सासु, ससुर, बहू के समबन्ध नई परिभाषा खोज रहे है ? रिश्तेदार और पड़ोसियो के समबन्ध अजनबी बन रहे है ? सवाल कई है, जिन्हें समझना और उनका समाधान निकलना अब मुश्किल ही लग रहा है। फिर भी आशा यही करेंगे की भविष्य के गर्भ में कुछ सुधार के रास्ते जरुर निकलेंगे और हर परिवार फिर से मुस्करायेगा।

परिवार आखिर किस बात की कमी महसूस कर रहा है, जिससे आज वो उदासियों का दर्द भोग रहा है, यह जानना भी नितांत जरूरी है, अतः इसके बारे मे अगर थोड़ी चर्चा करें तो अनुचित नहीं होगा ।

आखिर परिवार में ऐसा क्या मिलता है, जो हम इतनी चिंता करते है ?…..

1 सुरक्षा.. परिवार बुरे समय में छतरी का काम करता है। कभी जब इंसान शारीरिक, मानसिक और आर्थिक लाचारी भोगता है, तो उस समय परिवार अपनी पूर्ण संगठित शक्ति से उसका सहयोग करता है । विभिन्न परिसिथ्तियों में अगर कोई सकारत्मक ऊर्जा प्रदान करता है, उसे परिवार के नाम से जाना जाता है ।

2.संस्कार….संसार में व्यवहार ही अर्थ के साथ चलता है, समय पर अर्थ के बिना व्यवहार काम निकाल देता है। सहयोग व्यवहार से ही मिल सकता है, धन साधन खरीद सकता है, पर सहयोग दिल से नहीं। व्यवहार संस्कार के बिना नहीं मिलता और संस्कार का विश्वविद्यालय परिवार ही होता हैं ।

3. सहयोग… बिन मांगे सहयोग देने कोई आता है, वो परिवार ही होता है ।

4. दर्द निवारक.. आज शारीरिक और मानसिक दर्द इतनी तरह के पनप रहें कि हर दर्द के पीछे किसी तन्हाई की कहानी होती है, पर सुनने वाले नदारद है । ऐसी स्थिति के जिम्मेदार आज हम ही है, जो आर्थिक मजबूरी के बहाने अपनों से दूर हो गये। अगर यह दुरी रिश्तों के प्रति सही भावना से होती तो हम सिर्फ शरीर से ही दूर होते, मन से नहीं। अति स्वतन्त्रता की चाह तथा मार्ग दर्शन की कम अपेक्षा ने, जीने के सही तत्वों को नकार दिया। परिवार इस तरह के भटकाव को रोकने में पूर्ण सक्षम होता है। स्नेह भरे दो शब्द चाहे किसी भी तरह के सम्बन्ध से मिले तो गम काफी कमजोर पड़ जाते है । कभी एक कहानी सुनी थी, किसी विधवा माँ का एकलौता बेटा युद्ध के मैदान में शहीद हो गया, जब उसका शव माँ के पास भेजा गया तो सारा गांव इस शौक के समय उस के घर के बार इकठ्ठा हो गया। माँ ने जब अपने इकलौते पुत्र को इस अवस्था में देखा तो दुःख से जड़ हो गयी। वों बिना पलके झपके मृत बेटे का शव एक टक काफी देर तक अपलक देखती रहीं, न मुंह से कोई बोल फूटे, न ही क्रंदन किया। हालात ने उसे गम के तासीर का यही रुप दिया, वो अबला अपने बिगड़ते भविष्य के सामने लाचार खड़ी थी। गांववाले भी चिंतित थे, अचानक कई बुजर्गों की आवाज हवा में फैल गई की इसे रुलाना जरूरी है, नहीं तो यह दुःख से मर जायेगी। अतः अथक प्रयास के बाद उसे रोना आया, उसे कई तरह के दिलासें दिए गए। इस तरह उसे वापस जीवन धारा में लाया गया।
यह चिंतन और मनन की बात हैं कि परिवार और समाज बिना क्या जीवन सुरक्षित रह पायेगा ? खासकर जब परिस्थितियां विपरीत दिशा में जा रहीं हो

5.आनन्द का स्त्रोत… कभी मैंने ताराचन्द बड़जात्या की बनाई पारिवारिक फ़िल्म “हम आपके हैं कौन ” देखी थी। भारतीय फ़िल्म इतिहास में परिवार पर इससे सुंदर फ़िल्म शायद ही बनी हो, उस में दर्शाया गया की परिवार के साथ में मिलकर रहने से उल्लास किन किन नई परिभाषाओं से जीवन सजाता है, जब हम परिवार और समाज से जुड़े होते है । अकेली और बिना नियम की स्वतन्त्रता सिर्फ तन्हाई ही ला सकती है, एक अच्छा और विशिष्ठ भविष्य नहीं ।

6. मार्ग दर्शक…मैं अनजान हूं, किसी शहर में और मुझे अपने गन्तव्य तक पहुंचना है, मैं नहीं समझ पा रहा कि मुझको को किधर जाना तो इन परिसिथतियों में निश्चित ही जरूरत होगी, कि मुझकों कोई सही रास्ता बताये और मैं शीघ्र ही अपनी मंजिल तक पँहुच जाऊ। ठीक इसी तरह कभी हमें जीवन के चौराहे पर खड़ा होना पड़े और असमंजस स्थिति हों तो परिवार या कोई अच्छा दोस्त ही हमें सही मार्ग का अवलोकन करा सकता है ।

7, चरित्र निर्माण… एक कहावत हम सभी ने सुनी है की अगर धन चला गया, कोई बात नही, स्वास्थ्य कमजोर पड़ रहा तो चिंता की बात है, परन्तु चरित्र चला गया तो फिर जीवन कहां है ?,चरित्र चरित्र ही रहेगा, उसके बिना शरीर बिना आत्मा का हो जाता है। आधुनिकता के दर्प में अगर कोई चरित्र को झुठलाना चाहता है, तो समय उसे खोखला कर देता है। किसी भी व्यवसायिक क्षेत्र में हम चले जाए, हमारे चरित्र के प्रति पहली उत्सुकता जरूर आंकी जायेगी। नौकरी को ही लीजिये, हमें चरित्र प्रमाण पत्र की जरूरत जरूर पड़ती है, या नौकरी प्रदाता हमारे चाल चलन के बारे में जानकारी जरुर करेंगे ।
ध्यान देने की बात है, उनके लिए, जो परिवार को नकारने की कौशिश कर रहे है । वो जिस सफलता को अपनी बता रहे है, उसकी बुनियाद या नीव किसने रखी..जानता हूँ, उत्तर यही होगा..माता,पिता,परिवार और गुरु । सोचिये, हम अपने बच्चों को क्या दे रहे है, हमारा दायित्व उन्हें क्या देने का बोध करा रहा है ?

8. संपति निर्माण…आज का युग आधुनिकता के साथ, असंयमित विचारों का है। हर रोज नये नये आराम और मनोरंजन के साधन मनुष्य को ललचाकर उसे भोगवादी बनाने को प्रेरित करने में, विज्ञापनों का भरपूर उपयोग करने में लगे है, और असहाय मानव इस जाल में बुरी तरह जकड़ गया। हाल यह हो गया की, हर साधन आवशयक लगने लगता है। आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया वाली कहावत सत्यता स्थापित करने लगी। महीना शेष नहीं होता उससे पहले इतने बिल के कागज जेब में भर जाते कि, उन्हें चुकाने की परेशानी से तनाव ग्रस्त हो जाता है। इस समय परिवार ही एक ऐसा साधन है, जो इस समस्या का समाधान काफी हद तक संयुक्त प्रयोग प्रणाली के द्वारा काफी बिना जरूरत के खर्चो को बचत में बदल सकता है। शर्त यही है, की परिवार में प्रेम और आपसी समझ हो, तथा संपति निर्माण में सभी की रूचि हो।
Morio Puzo, ने अपने उपन्यास The Family में लिखा ” The strength of family , like strength of army, is in its loyalty to each other” . इतिहास के पन्नों में हमारे देश कुछ परिवार अपने पारिवारिक समूह के नाम से आज भी पहचाने जाते है, जैसे बिड़ला, टाटा, मोदी और मफतलाल तथा इस तरह के और भी छोटे छोटे कई परिवार हमें आसपास दिखायी देते है, जिनकी आर्थिक सफलता का राज, उनका संगठित होना है।तय है, सम्पत्ति सम्मति से ही बढ़ती है ।

9. धर्म और मानव कल्याण….. ये दो भावनाये परिवार की पृष्ठ भूमि से ही जन्म लेती है। धर्म इन्सान को कर्म के पथ पर सात्विक ऊर्जा प्रदान करके, उसे साधनो के अति उपयोग से होने वाले आत्मिक हानि का बोध कराता रहता है, और मानव कल्याण अति विशिष्ठ होने को प्रेरित करता रहता हैं।

Marianne E Neifert ने Dr. Mom’s Parenting guide में लिखा की ” The family is both the fundamental unit of society as well as the root of culture. It – is a perpetuate source of encouragement, advocacy, assurance and the emotional refuelling that empowers. a child to venture with confidence into the great world and to become all that he can be”…….MARIANNE E NEIFERT …..DR. MOM’S PARENT IN GUIDE.

क्रमश ……

चलते चलते….
दोस्तों…….
कुछ आस्था आधार ढुंढलो
कुछ अपनों पर एतवार करलों
परिवार का सुखद अनुभव पाकर
संसार मुट्ठी में कर लों……..

कमल भंसाली

स्वस्थ शारीरिक और आर्थिक धनवान…|

सपने सभी देखते हैं, सपने अच्छे आते है,तो शुभता महशूस होती है | किसी ज्योतिषी ने कभी नहीं कहा होगा,कब किस प्रकार का सपना देखना, शुभता का प्रतीक है | यहां, मै आपको जरुर एक सपने के बारे में कहूंगा, जो मेरे हिसाब से हम सब को देखना चाहिए ” स्वस्थ शारीरिक और आर्थिक धनवान” बनने का, “यह एक शुभ सपना” है | इसके लिये हमें किसी किताब या किसी मार्गदर्शन की जरूरत नहीं है, सिर्फ हमे यह सपना अपनी आत्मा में बसाना होगा और कुछ आदतों का निवारण कर,अपनी योजना के तहत उनमें सुधार करना होगा | ध्यान रहे, यह सिर्फ धनवान बनने का नहीं अपितु “स्वस्थ धनवान”बनने का है |

हर आदमी जब पैदा होता है तो ज्यादातर स्वस्थ ही होता, परन्तु जरूरी नहीं उसके पास अपार धन हो | कोई अगर गरीब है तो दोष नहीं, परन्तु उसका स्थिति को स्वीकार कर लेना, सही नहीं कहा जा सकता | आइये, हम उन साधनों पर विचार विमर्श करते है, जिनसे हम स्वस्थ आर्थिक धरातल पर खड़े हो सकते है |

सबसे पहले “__________”स्वस्थ काया”____★मुख्य उद्धेश्य ★

स्वस्थ शरीर, को प्रथम सर्वोतम सुख माना गया है | इसलिए पहले यह तय करना होगा की हम आर्थिक रूप से जैसे जैसे सक्षम होते रहेंगे, हम स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह नहीं होंगे | हमारे सारे आर्थिक और व्यापारिक निर्णय हमारा दिमाग करता है | दिमाग तभी सही काम करता है, जब वो तनाव ग्रस्त नहीं होता| | हम,यह तो दावे के साथ नहीं कह सकते कि सब निर्णय सही होंगे, पर जरूरी है, व्यापार मे सफलता का मापदंड एक असफलता से कभी नहीं आँका जाना चाहिए | असफलता को एक स्वस्थ शरीर और मजबूत मन ही, बिना किसी तनाव के सहन कर सकता है | ध्यान देने की बात है, हर आदमी गलती करता है, उसका नुकसान भी होता होगा, पर दुःख मनाने से कभी भी कमी की पूर्ति नहीं होती , सही दिमागी चिन्तन और आत्मिक शांति से सब कुछ संभव है |

दूसरी बात _____________★★जूनून आगे बढने का, आत्मा में बसाना★★

सबसे पहले और आगे बढने से पहले यह गौर करने की बात है कि ” जरूरी नहीं ज्यादा पैसे से ज्यादा खुशियां हासिल की जा सके” | हम भारत में रहते है, हमारे संस्कार यही कहते है की हम कर्म से ही ज्यादा सम्पत्ति हासिल करे, सही कर्म से आमदनी की रफ्तार धीमी होती है, परन्तु संतोषप्रद होती है | गलत तरीकों से कमाया धन, कभी भी मान सम्मान को खतरे में डाल सकता है |हमारी पारिवारिक जिन्दगी बहुत से ऐसे खर्चे कराती है, जिनकी उपयोगिता नहीं रहते हुए भी करने पड़ते है | कई विरोधाभ्यास के बावूजद हम आडम्बर युक्त खर्चे शादियों तथा श्राद्ध आदि में करते है | हमारे यहाँ ये खर्चे अनिवार्य श्रेणी में रखे जाते है | अगर हम अपनी मानसिक चेतना का आधुनिककरण करे तो इन सब से बच सकते है, और हमारी बचत की प्रवृति आगे बढ़ सकती है, और इसे हम समझदारी की बचत कह सकते है |यह हमारा कदम उस आधुनिकता की तरफ भी इशारा करता है, जहाँ हम झूठी शान के कारण आमोद, प्रमोद तथा फैशन पर क्रेडिट कार्ड का प्रयोग करके संतोष का अनुभव करते है | सार यही,फिजूलखर्ची से बचे, आडम्बरों को न अपनाये और छोटी छोटी बचत पर ध्यान दे | वो दिन दूर नहीं जब हम इस बचत से “स्वस्थ धनवान” बन सकते है | ध्यान दे “झूठी शान के आर्थिक पतन”, से बचना जरूरी है | आगे बढना हैं तो आत्म सुधार तो करना ही पड़ेगा |

तीसरी बात_____________★★★ आज ही है, मेरे पास !★★★

हम अपने कार्य को अगर सही ढंग से संपादित करे तो बहुत बचत कर सकते है | जैसे समय पर बिजली, पानी, टैक्स, क्रेडिट कार्ड आदि का भुगतान करे, अंतिम तिथि की प्रतीक्षा न करे तो बचत को बढ़ावा न मिले,पर ह्यास नहीं होता| | ‘कर्ज का मर्ज’ को देर से किया भुगतान काफी बढ़ा सकता है | हमारी बचत योजनायें जो हमने भविष्य में समृद्ध होने के लिए ली वो भी प्रभावित होकर हमारी लापरवाही से कम समृद्ध होती है क्योंकि उनपर भी देरी का शुल्क कम्पनिया काटती है | अत: हमें अपनी टेबल को सदा साफ़ रखना चाहिए | समय समय पर निवेशित योजनाओं का मूल्यांकन और उसी अनुसार निर्णय समीक्षा जरुर करनी चाहिए | आजकल इस तरह के कई सोफ्टवेयर है, जो न केवल हमारी दर्ज की सूचनाओं को सुरक्षित रखते अपितु हमें सम्बन्धित जानकारियां दे सकते है | शेयर मार्केट के तथा अन्य जुओं से दूर रहे परन्तु उनमें तथा म्यूचल फंड में निवेश गुणवता के आधार पर जरुर कर सकते है |

चौथी बात______________★★★★संयमित खर्च★★★★

इंग्लिश में एक कहावत है, जो भारतीय कहावत के अनुरूप है, ” Money saved is money earned” हमारे बड़े बुजुर्ग सदा कहते आये, ” आदमी को पैर उतने ही फैलाने चाहिए, जितनी बड़ी चद्दर” | हर आदमी की जरूरतें कितनी
ही विशाल हो, पर आय का दायरा सीमित ही होता है | आज हर घर में मोबाइल तथा दूसरे इलेक्ट्रोनिक्स की तादाद इतनी बढ़ गई की उनका खर्चा आदमी का रोज का तनाव बढ़ा देता | उपकरणों का कम प्रयोग स्वास्थ ही नहीं हमारी
जमा पूंजी भी बढ़ाता है | हमारी खोज सदा यह ही रहनी चाहिए की सही बचत हम कितनी कर सकते है | तय है, ज्यादा खर्च हमे नाम नही देगा पर बदनाम जरुर कर देगा |

पांचवी बात____________★★★★★वक्त के साथ चलना★★★★★
आज का दौर काफी भावुक है, छोटी छोटी बातों से बहुत जल्दी प्रभावित होता है, खासकर आमदनी के साधन तथा निवेश की योजनाये पर सम्पूर्ण निगरानी नहीं रखने से काफी दिक्कते आ सकती है | उदाहरण स्वरुप कुछ सालों
पहले S.T.D के बूथ कितनी तेजी से खुले थे, मोबाईल तथा इन्टरनेट के प्रचलन के साथ धीरे धीरे लोप हो गये |
जो भी इस काम से जुड़े उन्होंने अगर विकल्प नही ढूंढा तब तक शायद ही उन्हें आर्थिक कठिनाईयों का सामना ही नहीं
तनाव भी भोगा होगा, जो हमारे संकल्प “स्वस्थ धनवान” बनने के विपरीत की दशा है | मेरा सुझाव यही है आनेवाला समय पढ़ने का तथा इलेक्ट्रोनिक साधनों का है, अविष्कार कीजिये नये कामों का | कई क्षेत्र आज भी ऐसे है, जिनकी जानकारी से हम तेजी से आगे बढ़ सकते है – इसे तनाव से नहीं ठंडे दिमाग से चिन्तन करना जरूरी है | यह चिन्तन
सर्वोत्तम नहीं रहेगा “आज भी हमारा, कल भी हमारा” !

छठी और अंतिम बात______★★★★★★सीमित आकांक्षाये विस्तृत खुशिया★★★★★★

हमारी भावना ही हमारी शक्ति तभी होगी जब उसे सही सम्मान और महत्व दें | हम अपनी छोटी छोटी असफलताओं को किसी भी सुरत में अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर आघात नहीं करने देंगे |
हम अपनी आमदनी का कुछ हिस्सा जरुर बचायेंगे, परन्तु वो 5% से कम नहीं होना चाहिए.
“स्वस्थ धनवान”का मतलब कतई ये न समझे की करोड़ो की हमे जरूरत है, हमे जरूरत उतनी ही जिनसे हम अपनी जिन्दगी को सही गतिमान रख सके | बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी हमारी है, परन्तु उनका साथ जीवन में आगे मिलेगा, वर्तमान समय में शंका पूर्ण विश्वास ही होगा | हम अब जानते है, परिवार शब्द छोटा हो रहा है !
हम जब तक जिन्दा रहे तब तक आर्थिक रूप से किसी पर मोहताज नहीं रहेंगे, चाहे वो सन्तान ही क्यों न हो |
हमारा व्यवहार ओर हमारा स्वास्थ्य इस योजना की बुनियाद है, यह एक मात्र संकल्प ही तनाव से बचा सकता है |
हमारा विस्तृत ज्ञान जो हमे अध्ययन करने से मिलेगा उसे हमें, अपनी इस योजना के साथ जोड़ते रहना है
अंतिम और खरी बात ऋण से बचके रहना जरूरी है यह आर्थिक कैंसर होने की चेतावनी है |
किसी लेखिका ने कहां ” A financial genius is someone who manages to earn more than his family can spend.”..Liza
चलते चलते…..
मंगलकामनायें, शुभकामनायें
आपकी और हमारी आनेवाली दीपावली शुभ हों….. “जय माँ लक्ष्मी”

कमल भंसाली