🌷सच और प्यार🌷मुक्तक युक्त कविता✍ कमल भंसाली

सदिया बीती प्यार रहा अमर
पथिक चलना ऐसी ही डगर
प्यार ही हो तेरी असली मंजिल
खुशियों के फूल खिलेंगे हर पल

💖

खूबसुरती जिस्म की बदलती रहती
अवधि सांसों की भी कम हो जाती
पर प्यार की रंगत एक जैसी रहती
प्यार से रहो, धड़कने भी ये चाहती

💝

पल का प्यार, स्वाति बन कर चमकता जाता
सच्चाई की धवलता से पलमें कीमती हो जाता
रंग बदलता इजहार आरजूये ही करता जाता
इससे प्यार का अहसास कभी नहीं कर पाता

💕

हर रिश्ते में प्यार का ही बन्धन होता
खून से तो सिर्फ इसका सम्पर्क रहता
आपसी समझ बन जाता है जब प्यार
तो जीवन अपनी मंजिल करता तैयार

💑

कहते है जब तक प्यार और सच साथ साथ रहते
जीवन की बगिया में खुशियों के फूल खिलते रहते
झूठ की शराब में जो प्यार को ओतप्रोत कर रखते
एक दिन प्यार की चाहत में तिल तिल कर तरसते

👄

प्यार को जग में भगवान से कभी कम नहीं समझना
जीवन के नभ का इसे सूर्य और चन्द्रमा ही समझना
प्यार को उजियारा,सत्य को आत्म ज्ञान हीसमझना
सच्चे प्रेम को अटूट अनमोल जीवन बन्धन समझना

💟

सभी तपस्याओं का सार है, सत्य, प्यार भरा जीवन
अति चाहत की लालसा में जब भटक जाता इंसान
उसे इस लोक से उस लोक तक नहीं मिलते भगवान
कर्म बन्धन से परेशां कैसे करेगा आत्मा का निर्वाण

🙏🙏🙏 रचियता👉 कमल भंसाली👈

💓परीक्षा💓कमल भंसाली

कल की करनी
आज भरनी
आज की कब ?
अनजानी
इस जन्म के
कष्टों की कहानी
न पड़े कभी फिर दोहरानी
तो न बन
आत्मा
अज्ञानी अभिमानी
तेरी व्यथा
तूने अभी तक ?
क्यों न पहचानी
जग मुआ कैसा ही हो
पर तेरा व्यवहार तो अच्छा हो
कहते ज्ञानी
जीवन कुछ भी नहीं
सिवाय पानी का एक बुलबुला
एक दिन फुसफ्सा जाएगा
अस्तित्व
इसी मिट्टी में मिल जाएगा
👇
तेरा रूप ही
परीक्षाफल
हर कर्म
प्रश्न बन
एक दिन सामने आएगा
तब सर तेरा झुक जाएगा
संसार की इतनी फिक्र क्यों ?
दूसरे के गलत कर्मों का जिक्र क्यों
पहचान कर अपनी
ये तेरी परीक्षा स्थली
सब प्रश्नों के उत्तर लिख
समय संक्षिप्त
नकल की चेष्टा न करना
सब खाली स्थानों को
सच्चे कर्मो से है,भरना
अच्छे कर्मों को याद कर
न आये, तो मेरे दोस्त
अब सिर्फ प्रभु को ही याद कर
प्रश्न पहला है,जरूरी
सत्य क्यों बना तेरी मजबूरी ?
क्यों बनाई उससे दूरी
उतर आसान नहीं
तो फिर
साथी
भूल जा ये दुनियादारी
भूल जा रिश्तों की दुकानदारी
पवित्र विचारों को दे जिम्मेदारी
स्वादि सांसारिक चाहते
जब तक दिल मे रहेगी
प्रश्नों की जटिलता बढ़ती जाएगी
मोक्ष की परीक्षा
तूं जन्मों जन्मों तक
पास न कर पायेगी
बता
आखिर कब तक
तूं यह जलालत
सहन कर पायेगी…..

…..रचियता…कमल भंसाली

👚सुख का निर्माण👚भाग 1✍ कमल भंसाली

मानव जीवन एक मूल्यवान उपहार है, जिसमें खुशियों की कोई सीमा नहीं पर हम अपने ही व्यक्तित्व कि जानी अनजानी गलतियों के कारण उन्हें दुःख के आवरण में ही तलाश करते नजर आते है। सच्चाई हर जीवन का आधार है, यहां तक की हमारा शरीर भी अपनें अंगों पर पूर्ण विश्वास इसलिए करता क्योंकि उनकी कार्य प्रणाली में सच का तत्व समाया है। उसी की बदौलत हम शरीर की स्वस्थता पर निर्भर होकर अपने जीवन क्षेत्र की विस्तृता को नये नये आयामों से सजाने की कोशिश करते रहते है। सभी खुशियां भाग्य और वक्त की सौगात नहीं होती, हकीकत में ज्यादातर खुशिया हमारे दैनिक जीवन के कार्य क्लापों में ही निहित रहती है। यानी यह कहा जा सकता है, कि खुशियों का निर्माण भी किया जा सकता है। दो सवाल यहां स्वयं से करना उचित होगा, पहला फिर करते क्यों नहीं ? दूसरा क्या करना कठिन है ? शायद, पहले सवाल का जबाब हर एक के पास है, खुशियों को भी सच्चाई और ईमानदारी चाहिए, और इंसान का पूर्ण सच्चा होना बहुत कठिन है, क्योंकि एक सामाजिक व्यवस्था में रहने की उसकी मजबूरी है। जहां तक कठिनता का सवाल है, उसमें यही कहा जा सकता है, जीवन अगर अपनी संक्षिप्त उपलब्धियों से सन्तुष्ट होता है, और अति भोगवादी प्रवृत्तियों के आकर्षण से ग्रसित नहीं होता तो सुख के क्षणों का अनुभव विपरीत परिस्थितयों में महसूस करता रहेगा। हमारी कई आत्मिक और मानसिक कमजोरियां ही हमें कठिनता का अनुभव ज्यादा कराती है और हम हर दुःख को भाग्य की देन मान लेते है। इस सन्दर्भ में पुरानी फ़िल्म “दोस्ती” का एक गाना काफी हद तक इस बात का समर्थन करते नजर आता है, कि जीवन में सुख और दुःख एक सिक्के के दो पहलू है, अतः उनके बदलते पहलू पर न गौर करे तो भी सिक्के की वही कीमत रहेगी। गाने के बोल कुछ इस तरह से इस स्थिति का अनुभव कराते है, ” राही मनवा दुःख की चिंता क्यों सताती है, दुःख तो अपना साथी है, सुख है एक छांव ढलती आती है जाती है” ।

प्रायः सभी धर्म विशेषज्ञ यही कहते संसार दुःख का सागर है फिर वो इसके विपरीत यह भी कहते है, मानव जीवन अनमोल है। यहां तथ्य कुछ दूसरा है, जो शायद हम नहीं समझ पा रहें है, सृष्टि की मेहरवानी ही मानव जीवन है, दूसरे श्रेणी के जीव जन्तु जिनमे भी सजीवता है, काफी हद तक बेबस और लाचार होकर जी ते है। अतः स्पष्ट है, मानव जन्म पाना ही जीवन की पहली और मृत्यु अंतिम खुशी है। यहां प्रश्न उभर सकता है, मौत ख़ुशी क्यों है ? इस सवाल के उत्तर को सही ढंग से समझने से पहले हमें ख़ुशी को परिभाषित करना होगा, हमें समझना होगा आखिर कौन सा अनुभव और अहसास हमें सुख दुःख का अहसास देता है। संक्षिप्त में हम यों भी समझ सकते है कि सुख और दुःख का संबध अनुकूलता और प्रतिकूलता से होता है। जीवन- दर्शन के जानकारों के अनुसार सृष्टि का निर्माणिक तत्व ‘सृजन’ विसर्जन की देन है, उनके अनुसार विसर्जन होने से ही सृजन हो सकता है। वो तो ये भी कहते है, मानव भी विसर्जन की देन है।
सुख का निर्माण कोई अगर करना चाहता है, तो उसे इस सिद्धान्त को अपने अंदर तक तलाशना होगा। उदाहरण के तौर पर जब कोई आदमी किसी भी वस्तु का दूसरों के हित में विसर्जन करता है, तो निश्चित ही सुख की कुछ बूंदों की अनुभूति का आत्मा में सृजन जरुर महसूस करेगा, चाहे उसकी अवधि संक्षिप्त ही क्यों न हो।

एक अंग्रेज संत फैड्रिक लेविस डोनाल्डसन् ने सन् 2015 में अपने प्रवचन में एक प्रश्न के उत्तर में बताया कुछ हमारे किये सामजिक पाप ( Sins )भी होते है, जिनके कारण मानवता को दुःख झेलने पड़ते है।उनके अनुसार वो है:

1.बिना कर्म किये पाया धन
2.बिना विवेक की हुई अय्यासी
3. बिना चरित्र के पाया ज्ञान
4. बिना नैतिकता का व्यापार
5. बिना मानवता का विज्ञान
6. बिना त्याग की पूजा
7. बिना सिद्धांतों की राजनीति

आज की जीवन पद्धति के संदर्भ में उपरोक्त बातों को काफी सीमा तक सही ही माना जाएगा। क्योंकि आज हम रोज अनजाने भय के अंतर्गत ही अपना दैनिक जीवन जीते है। आज कहनें को शिक्षा का प्रसार उच्चतम स्तर पर हों रहा है, पर संस्कारों का होता क्षय शरीर को अति भोगवादी बना कर मानव को इतना कमजोर बना देगा कि शरीर कोई भी हिस्सा मानसिक और आत्मिक सुख के लायक ही नहीं रहेगा। प्रकृति और समय को समझ अगर इंसान संयमित रहें तो वो कई छोटे छोटे सुख के बिंदु अपने दैनिक जीवन में महसूस करता रहेगा। चूंकि हमारे देश में सदा आध्यात्मिक समझ रही है, अतः प्रेम का विस्तार यहां प्रत्येक दिल तक होता आया है। हालांकि हम आज समय का खेल कहकर हर दुःख का निवारण करनें की कोशिश जरुर करते है, पर दिल में तो गम का धुंआ हमारे दिल में प्रेमित शिराओं में सुख की जगह दुःख का ही निर्माण कर रही है। समझने की बात है, सही समय पर रोग की पहचान और उसका सही निदान की कोशिश करना सुख निर्माण की तरफ पहला कदम है। शरीर, मन, आत्मा के प्रति हमारी सचेतना ही सुखी जीवन का आधार है। अतः स्वयं की सक्षमता को ही पहला सुख कहा जा सकता है।

सर्व परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् ।
एतद विद्यातस्मासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ।।

दूसरे पर आधार रखना पड़े वो दुःख, स्वयं के आधीन हो वो सुख; यही सुख दुःख की संक्षिप्त परिभाषा है।

क्रमश….लेखक कमल भंसाली

🌾पथ हार🌾 एक आत्मिक सुधार 👌 “प्रार्थना” 👃 कमल भंसाली👃

पथ हार
बैठ गया
एक नहीं कई बार
नजर न आया
एक भी सवेरा
नहीं जानता, सर्वेश्वर
कब दूर होगा जीवन अंधियारा
बचा सिर्फ
एक ही सहारा
लब पे रहता
अब सिर्फ नाम तुम्हारा
***
माफ़ कर देना
मनःस्थिति समझ लेना
हताश होकर
कर बैठा पुकार
“प्रभु” आओं
मेरे मन द्वार
इस जीवन के पालनहार
सिर्फ इतना बता दों
कब आओगे
कशमकश के
इस भँवर से निकाल दोगे
जन्म मरण मेरा
सार्थक कर दोगे
मुझे अपने में समेट
इस अस्तित्व बोध को कब
सम्पूर्णता दोगे
***
अंतर्मन हुआ गदगद
कहीं से आई जब
आत्म स्वीकृति की झंकार
छवि एक अदृश्य नयनों में उतरी
बिन किसी आकार
बोली इस प्रकार
“मैं” वहां ही हूँ कहां ?
जहां तुम नही
जब तुम स्वयं में नहीं
तब मैं वहां नही
विश्वास तुम्हारा
जब जग जाएगा
तब तुम्हें
मेरे अस्तित्व का पता लग जायेगा
हर अँधेरा
अपना सन्दर्भ तलाशने चला जाएगा
स्वर्णिम सवेरा
तुम्हारे कदम चूम ने आएगा
विकल्प चुनता जीवन
नई आस्था में समा जाएगा
तब सब कुछ् तुम्हारा
मुझ में समा जाएगा
एक निर्वाणित पथ
तुम्हारे सामने बिछ जाएगा
तब तुम नहीं भी पुकारोगे
स्वयं तुम्हें लेने आऊंगा
हर बन्धन से मुक्त कराऊंगा
जिस पथ के तुम दावेदार
उसी पथ पर साथ ले जाऊँगा
***
सागर की उदित लहरों को देखों
उसकी चंचलता में नजर आऊंगा
खिलती हुई कलियों की मासूमियत परखों
उनके खिलने में नजर आऊंगा
***
उगते भास्कर की रशिम निहारो
उसकी किरणन में नजर आऊंगा
अपने मन की रिक्तता तलाशों
सच की किसी शून्यता में मिल जाऊँगा

***
पथ हार न बेठना
कर्म के मर्म को समझना
आत्म धर्म की चेतना में
जीवन अर्पण का महत्व समझना
संसारी कल्याणी बन
अपने यहां होने के
सत्य की प्रस्तुति को समझना
गुनाह है “पथ हारना”
इसमें अदृश्यत् हमारे आपसी बन्धन को समझना
मानव जीवन को दी
मेरी इस साधना की अमृतता को समझना ……रचियता***कमल भंसाली

रचियता **कमल भंसाली

झूठ को सहारा◆◆सत्य बेचारा***कमल भंसाली***

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कोई भी झूठ से कितनी ही दौलत, शौहरत या नाम कमा ले, परन्तु जीवन पथ में उसे सत्य की जरूरत हर पल रहती है । उसका अंतर्मन सदा अपनी कमजोरी का व्याख्यान करता नजर आएगा, और उसके व्यवहार में इसकी झलक वह स्वयं भी करता है। माना जा सकता है, जीवन में बहुत सी ऐसी स्थितियों से इंसान गुजरता है, जब सत्य बोलने की कमजोरी के कारण वो असत्य का सहारा लेकर, आपसी सम्बंधों का निर्वाह कर, दुनियादारी निभाना उसकी मजबूरी हो जाती है। ये बात भी समझने की हो सकती है, कि सत्य अप्रिय होता है, और सब उसे सहीं ढंग से स्वीकार कर भी नहीं पाते। तभी जीवन ज्ञानी विशेषज्ञ कहते है, ऐसी परिस्थितियों में अल्पमात्रा झूठ भी स्वीकार्य है, क्योंकि यहां उसकी भूमिका आटे में नमक जितनी होती है, और आटे को पाच्य बनाना शरीर के लिए जरुरी होता है। संसार में अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए भी झूठ की भूमिका को आज की दैनिक जिन्दगी से बाहर करना मुश्किल होता है। तो क्या संसार आज झूठ की धुरी पर घूम रहा ! आंशिक सत्य भी यही है। परन्तु समझने की बात है, धुरी का अस्तित्व सत्य पर ही टिका है, क्योंकि सत्य हर कर्म से जुड़ा है। झूठ को स्थापित करने के लिए कर्म तो करना ही पड़ता है, चाहे वो गलत ही क्यों न हो।

झूठ कभी कभी सत्य के ऊपर भारी पड़ता है, परन्तु कुछ समय के लिए, अंदर से अपनी ही कमजोरियों से हार जाता है। जीवन सबको कितनी बार मिलता है, कहा नहीं जा सकता परन्तु शायद यह जरुर निश्चित होगा, कि वर्तमान का जीवन ही उसकी अगला स्वरुप और भूमिका तय करता होगा। वर्तमान जीवन बहुत सारी घटना क्रम से गुजरता है, और हर घटना में सत्य की भूमिका होती है, यह निर्विवाद तथ्य है, इसे नकारा नहीं जा सकता। मानव मन अस्थिर होता है, कभी कभी वो इन घटनाओं का असली मकसद समझ नहीं पाता और झूठ का सहारा लेकर इनको अपने सही लक्ष्य से दूर ले जाता है।

झूठ का मनोवैज्ञानिक अध्ययन सबसे कठिन होता है, क्योंकि इसका अध्ययन पूर्ण सत्य को अपनाने वाला ही कर सकता है, जो आज के जीवन में सबसे मुश्किल काम है। इसका सात्विक पक्ष गहरा अन्धकारित होने के कारण इसका सही मूल्यांकन आध्यात्मिक सच्चे सन्त ही कर सकते है। झूठ की सबसे बड़ी खासियत यही है, कि कोई भी इंसान अपनी अंतरात्मा से इसे बोलना पसन्द नहीं करता परन्तु गलत परिणामों से बचने के लिए बोल देता है। विश्लेषण की बात है, जिसकी जड़े अंदर तक न हो, उसका अस्तित्व कब तक ठहरेगा। अतः झूठ आखिर में पकड़ा जाता है, और मानव के व्यक्तित्व को खण्डित कर देता है। जो जीवन को समझते है, वो अपनी वाणी का संयमित प्रयोग इसलिए करते है।

झूठ बोलने के जो सम्भावित कारण हो सकते है, उनमें डर, आत्मछवि और दूसरों को नुकसान पहुंचाने की भावना, और लोभ। झूठ की संक्षिप्त् परिभाषा इतनी सी है, कि सत्य को विकृत करने की कोशिश झूठ है। पर सवाल यह भी है, आखिर सत्य क्या है ? सत्य की परिभाषा अगर आसान होती तो उसकी खोज में इंसान को भटकना नहीं पड़ता, इसलिए व्यवहारिकता के तत्वों में सत्य को स्थापित किया जाता है। इसलिए वस्तुगत चेतना की अवस्था में ही सत्य की पहचान की जा सकती है। सत्य कैसा भी हो, वो सूर्य और चन्द्रमा की तरह ज्यादा नहीं छुप सकता, भगवान बुद्ध ने यहीं संकेत व्यक्तित्व की प्रखरता के लिए दिया था।

सत्य अहिंसाकारी होता है, अगर झूठ में हिंसा नहीं सम्मलित हो, तो उसका नुकसान ज्यादा हानिकारक नहीं होता। परन्तु आज अर्थ की बहुतायत वाला युग है, इन्सान ने सत्य का कम प्रयोग करते करते निजी स्वार्थ के लिए झूठ को बेबाक अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिया है, इसलिए विचारों में विश्वाश की उष्णता कमजोर हो गई। सच यही है, जिंदगी आंतरिक ख़ुशी और प्रसन्नता की मोहताज हो रही है। पैसो के बलबूते पर हम आज भी कोई व्यक्तित्व निर्माण नहीं कर सकते, हाँ, थोड़े समय का ध्यान लोग हम पर केंद्रित जरुर कर सकते है, जब तक उनका आभाष उन्हें भ्रमित करता है, कि हमारा पैसा उनके कुछ काम आ सकता है। धर्म को आडम्बर बनाने वाले साधु जब भी सच के पहलू में झूठ का सहारा लेने की कोशिश करते है, तो उनका धार्मिक नजरिया अपना अस्तित्व खो देता है। इसलिए व्यवहारिक पक्ष जीवन का मजबूत रखने के लिए ऐसे झूठ का प्रयोग करना गलत नहीं होगा, जिससे किसी भी तरह का आघात एक मानव से दूसरे मानव को नहीं पहुंचाता क्योंकि ये आज के आधुनिक युग की मजबूरी है, जहां अति साधनों के कारण चिंतन के लिए समय कम मिलता है। अल्प आयु का चिंतन बिना सार्थकता का ही होता है।

आइये, सच और झूठ की महिमा और प्रभाव हम अपने दैनिक जीवन के सन्दर्भ में तलाश करने की कोशिश करते है पर उससे पहले यहां स्पष्टीकरण जरुरी हो जाता है कि विचार और सुझाव की कसौटी सच और झूठ दोनों से नहीं कर सिर्फ चिंतन की मर्यादा के अंतर्गत करेंगे तो जीवन को प्रभावकारी बनाने में हमें मदद मिल सकती है। नमूने के नजरिये से कुछ तत्वों की तलाश हम आज के युग अनुसार करने की कोशिश करे, तो हर्ज क्या है !

1. सब जगह सत्य बोलना कोई जरुरी नही है, पर सब जगह झूठ बोलना भी जरुरी नहीं है।
2. झूठ का ज्यादातर प्रयोग कर उसे सत्य की तरह स्थापित नहीं किया जा सकता है, यह भी ध्यान रखने की जरुरत है।
3. सत्य का पूर्ण सहारा हो, तभी किसी की सार्थक और अहिंसक आलोचना उसके कर्म की करनी चाहिए, नहीं तो मौन बेहतर असमहति का अच्छा प्रभाव स्थापित कर सकता है।
4. रिश्तों की मर्यादा खून और दिल दोनों से होती है, अतः अनावयशक झूठ का इस्तेमाल खतरनाक हो सकता है।
5. कुछ रिश्ते पवित्र होते है, उनमे बेबाक सत्य ही प्रभावकारी होता है, मसलन माता-पिता, पति- पत्नी और जीवन मार्ग दर्शक – गुरु।
6. भगवान और शुद्ध दोस्ती का रिश्ता आत्मा से है, अतः पूर्ण सत्य ही यहां गुणकारी हो सकता है।
7. व्यपारिक, राजनैतिक, और सामाजिक रिश्ते में विश्वास की अधिक मात्रा की जरुरत जरुर होती है, पर स्वार्थ की प्रमुखता के कारण इसमें सच-झूठ का जरुरत के अनुसार प्रयोग करना गलत नहीं कहा जा सकता।
8. देश, प्रकृति, धर्म, दान और प्राणिय प्राण ये पूर्ण आस्था के आत्मिक मन्दिर की मूर्तियां है, अतः यहां सत्य से बेहतर झूठ कभी नहीं हो सकता, अतः इनके प्रति भावना, शुद्ध सच्ची ही कल्याण कारी होती है।
9. जीवन और मृत्यु दो क्षोर है, दोनों ही सांस की डोर से बंधे है, झूठ के अति आक्रमण से कमजोर होते रहते है, परन्तु सत्य की अल्प बुँदे ही इन्हें सही स्थिति में रखने की कोशिश करती रहती है।
10. सत्य को ईमानदारी का साथ देने से जीवन की अगली गति उत्तम हो सकती है।
11. इंसान की इज्जत सत्य कर्म से ही उज्ज्वल होती है।

जैसा की ऊपर हमने कहा, ये कुछ तत्व हो सकते है, जिनसे सच और झूठ को आज के जीवन के अनुसार हमारे जीवन को अपने चिंतन अनुसार हमारी कार्यशैली को प्रभावित कर सकते है, अतः इन्हें अंतिम सत्य की श्रेणी में नहीं रखे, तो उचित होगा। इनके अलावा भी कई तत्व की खोज हर प्राणी अपने सामर्थ्य और अनुभव से कर सकता है।

गौर से पढ़े….
* सत्यस्य वचन श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत् ।
यद्भूतहितमत्यन्तं एतत् सत्यं मतं मम् ।।

{ यद्दपि सत्य वचन बोलना श्रेयस्कर है तथापि उस सत्य को ही बोलना चाहिए जिससे सर्वजन का कल्याण हो। मेरे ( अर्थात श्लोककर्ता नारद के ) विचार से तो जो बात सभी का कल्याण करती है, वही सत्य है। } ★ ■■■■ कमल भंसाली ■■■■ ★

👌👌नमन👌👌 कमल भंसाली

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आशा उसी से कीजिये, जिसने हमको बनाया
वो ही देता, सहारा, दूर कितना चाहे, हो किनारा
डगमग हो जब जीवन नैया, क्यों इतने घबराये
जब हाथ पकड़ कर, वो, स्वयं किनारे ले जायें

सुख दुःख होते है, सिक्के के दो पहलू
दोनों तरफ की एक ही होती है, पहचान
निराशा के पलो की सीमितता को ले जान
तो, फिर समझले, हम,जीवन मूल्य है, ज्ञान

दर्द हजारों मिलते, तो क्यों करे हम गम
दया धर्म से सब हो जाएंगे एक दिन कम
चार दिन की जिंदगी, कब तक रोये हम
लेंगे उसका नाम, दर्द सारे हो जाएंगे कम

उसके नाम हजारों, पर है, तो वो है,एक
पथ हजारो ही सही, मंजिल भी तो है, एक
आये है, जाना निश्चित, कर्म करना है, एक
सही कर्म हो, सत्य पूर्ण, प्रार्थना यही है एक

दुःख के भँवर में फसा जीवन, मांगे अपनी ख़ैर
इस दुनिया में न अपना, न गैर, फिर कैसा बैर
पल जो भी बचे, उसको ही, अब करने अर्पण
पवित्र हो जाये आत्मा, प्रभु, स्वीकार करो,नमन
👌👌कमल भंसाली👌👌

कमल भंसाली

अरण्य की ओर…… कमल भंसाली

वक्त की बेपरवाही से
मन हो गया, कमजोर
संसारिकता से होकर, असहज
चला, बेरुखी के अरण्य की ओर

सहजता की गंगा में
विकृत मानसिकता की नाव
कब किनारा ढूंढती
टूटी पतवार से
मंजिल नहीं मिलती
वक्त साथ न हो
तो, हवा भी रुख बदल लेती
जिंदगी बिन पंचभूत हो
जल समाधि चुन लेती

वास्तिवकता की धरा पर
प्रेम की फसल हुई, कमजोर
स्वार्थ के तानेबाने से बंधे बन्धन
कैसे करते, जीवन स्पंदन
निस्तेज काया का क्रंदन
कोई न समझे, सिवाय मन
देख काया को, कमजोर
चला बेरुखी के, अरण्य की ओर

आत्म सरंचना की निति
देख विविधता की गति
निहार कर जीवन क्षमता, भरपूर
मन की असहजता की मनुहार
निस्पृह होकर न जाओ, अरण्य की ओर
बीत जायेगी, निस्तब्ध रात्रि
जब छा जाये करुणामयी भोर
जीवन गगन के चारों ओर
तब तुम चले जाना अरण्य की ओर…….

कमल भंसाली

नासमझ तन….कमल भंसाली

तन रे, सुन रे
तूं है, तो सुंदर
पर है, बड़ा गरीब
अंदर तेरे, जो है, भरा
वो नहीं है, स्वर्ण शुद्ध
माटी में ही है, तू लिप्त
हो, जाएगा, एक दिन समाप्त
फिर भी, अकड़ कर चलता
सब कुछ, समझ कर भी
कुछ नहीं, समझता
यहीं है रे, भूल तेरी

मन से, तेरी दोस्ती
जग जाहिर
ज्यादा नहीं, अच्छी
बात यहीं, है सच्ची
फिर भी, तू कहता,
उससे, अच्छा दोस्त
तेरा कोई, और नहीं
इस जहां में बसता
यही है, रे, भूल तेरी

मन तो, चंचल ठहरा
वो, कब किसी की सुनता
कब तक साथ निभाता ?
कामनाओं का बेटा
कब नहीं, गरीब
को भटकाता ?
समय रहते संभलजा
तेरे होनें का
कुछ तो अहसास कर
अपनी, “माँ”, मिट्टी का
कुछ तो, लिहाज कर
अपनी धारणा, सुधार
यही है रे, भूल तेरी

सुना है,
तू अपने “पिता”
“आत्मा” की नहीं सुनता
कहता,फिरता
वो, करते तेरा पर्यवेक्षण
रोकते, तेरा पर्यसन
संयमन की देते, शिक्षा
इसलिये रहता, उनसे दूर
वो ही करते मजबूर
यहीं है रे भूल, तेरी

समझ जाता, उनका सानिध्य
चिंतन धारा बदल जाती, तेरी
यह हालत, नहीं होती
अपव्यय बन गई, आदत तेरी
तभी तो क्षुधा
शांत नहीं होती, तेरी
तू जग में रहेगा
सदा बनकर “भिखारी”
सोच रे जरा
यही है रे भूल, तेरी

यही कहता सत्य ज्ञान
जो अपनों की नहीँ सुनता
गैरों के पदचिन्ह पर चलता
वो भटक कर
आने का मकसद ही
नहीं समझता
सुख की चाह में
दुःख के ढेर पर
कराहता रहता
सुधबुध खो जाता
पुण्य का देवता
पाप की गठरी
ही, “ढोहता”
यह गति नहीं रे, तेरी
समझ मन की, मनुहारी
यही है रे भूल, तेरी….

कमल भंसाली

मानव मन जरा संभल…

गुरु कहते , जिन्दगी तो साफ सुथरी ही आती
कर्म की प्रतिरूपता सुंदर या कलुषित बनाती
भटकाव की प्रथम सीढ़ी,असंयत उम्र दिखाती
अज्ञानी को ही,सिर्फ यह बात समझ न आती
मानव मन जरा संभल, आगे तेरी अपनी नियति

यौवन रस भरी जिन्दगी, करे जब द्रवण
दौलत को आये जब मादक, अंगड़ाई
द्वैध हो जाए आत्मा, बिन स्वस्थ प्राण
चेतन मन की बढती जाये, आंतरिक रुलाई
मानव मन जरा संभल….

आस्था के नरगिसी प्रसून, बन जाते शूल
जीव क्यों हो गया, कामनाओं में मशगुल
अतृप्त का बोध बन गया, जहर का जंगल
ढह जायेगा जल्द,अनधिकृत देह का महल
मानव मन जरा संभल…

अनबुझ अनंग आत्मा कर, अब तो कर प्रतिकार
सोच समझ आगे बढ़, नहीं तो यह जन्म बेकार
ग्रसित तन को दे सदा स्वस्थ और स्वच्छ विचार
अर्थ का न हो अब अनर्थ, अपना ले, अमृतमय सदाचर
मानव मन जरा संभल……

यौवन के दिन चार, भोग इसे जरा हो कर समझदार
जीवन की कीमत तय करता, सत्कर्म का बाजार
पतन के सिंहासन पर बैठ, न कर शूली का इंतजार
बहु कोशिश के बाद ही मिलता,मानव जीवन एक बार
मानव मन जरा संभल…..

कमल भंसाली

उनकी गाड़ी…

“माटी”का तन
“मन”कांच का
“जीवन” सांस का
“आत्मा” “परमात्मा” की
सांस भी
समय की धरोहर
मेरे पास अपना
कुछ भी नहीं
हकीकत तो लगती
“यही”

पता नहीं,कभी लगता
जीवन एक है, गाड़ी
वो भी किसी और की
प्रेम का पेट्रोल खाती
संयम का गियर रखती
धैर्य के ब्रेक पर आधारित
सामने मोह के शीशे से
पीछे के संतुलन के दर्पण
निहारते हुए, मुझे चलानी
वापिस उसी को है, लौटानी

अनजान सफर,मंजिल दूर
नियम, कानून से मजबूर
गन्तव्य तक पहुंचना
“आत्मा”की सवारी को
“प्रभु” के दरवाजे तक
सही समय पहुंचाना

सफर आनन्द का
सफर रोमांच का
सफर अस्तित्व बोध का
सफर कर्म प्रभावक
सफर धर्म प्रभावित
सफर लालसाओं का
सफर करनी और भरनी का
सफर अनन्त प्रयासों का
सफर मिलन और बिछोह का
सफर आंसू और मुस्कराहट का
सफर मानवीय स्वभाव का
सफर सौभाग्य और दुर्भाग्य का

सफर ही, जिन्दगी
चलते रहना ही,आस्था
नियम पालन ही,धर्म
सर्व सम्मान ही, अबाधित गति
संस्कार ही, अवरोधक
बाकी सबकी,अपनी
शक्ति
और अपनी भक्ति
मै तो अब भी कहता
जीवन “उनकी”गाड़ी
“मै”
उनका सिर्फ ‘चालक’…..

कमल भंसाली