प्रेम और वासना.. बेहतर जीवन शैली भाग….९ अंश ३….कमल भंसाली

प्रेम की सबसे बड़ी विशेषता, अगर कोई है, तो यह कि यह भावनाओं के सभी रंगों से परिपूर्ण रहकर भी सदा सफेद और स्वच्छ सत्य के अंदर ही अपना परमोत्कृष्ट ढूंढता है, पर ऐसा तत्व भक्ति स्वरुप के अलावा कहींऔर मिलना असंभव ही लगता है। प्रायः, यह ही दृष्टिगोचर होता है, कि मानव अपनी गलत आदतों की दास्तवता से स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहता है, पर अति लगाव या असंयत प्रेम के कारण ऐसा नहीं कर पाता, इसे मन की कमजोरी भी कह सकते है। बेहतर जीवन शैली प्रेम का तीन प्रकार से विशलेषण करना चाहेगी.

1. शारीरक प्रेम
2. मन का प्रेम
3. आत्मा का प्रेम

शारीरिक प्रेम…………

संसार में मानव शरीर को अपनी अनुपम सरंचना के कारण एक वरदान के रुप में देखा जाता है। बनानेवाले ने बड़ी कुशलता दिखाई और उसने शक्ति और कमजोरी का अनुपम मिश्रण का सन्तुलन बरकरार रखने के लिए बीमारी और मृत्यु का सहारा लिया। मानव मन में कमजोरी के रुप में कई अवगुण एक साथ निवास करते हैं। और वे काफी स्थान पर अपना वर्चस्व रखने की कोशिश करते है। जोअच्छे गुण होते है, उन्हें कम जगह प्राप्त होती है । जो,मानव सयंम और धैर्य को आत्मा में पूर्ण स्थान देते है, उनके जीवन में प्रेम की कमी शायद ही रहती है। आवेश, क्रोध, लालच, स्वार्थ प्रेम के सबसे बड़े दुश्मन है, उनसे आत्मा जितनी दूरी रखेगी, उसे प्रेम की कमी कभी नहीं महसूस होगी।

यह बात ध्यान में रखने की है, कि अति शारीरिक प्रेम को वासना के रुप में जाना जाता है, बिना प्रेम का यह मिलन शरीर की अतिरेक इच्छाओं की पूर्ति जरुर कर देता है।परन्तु, हर शुद्ध आत्मा इस शर्मिन्दिगी को सहज नहीं लेती, क्योंकि जो पवित्र विचारों के निर्मल जल से जो रोज नहाती, उसके लिए क्षणिक गन्दगी सहन करना सहज नहीं होता।आज नैतिकता के आँचल में अनैतिकता शरण लेकर् जो उत्पात कर रही है, वो प्रेम के रिश्तों को अविश्वासनिय बना कर जीवन को असहजता की आग में झोंकने की चेष्टा कर रही हैं। यह तय है, प्रेम की अनुभति चाह से शुरु होकर मिलन की गंगा में विलीन होती है। जब दो शरीर आत्मिक एक होकर मिलते तो उनका सुमधुर मिलन प्रकृति का विकास करते है, जिसमे कोई ख़ौफ़ नहीं होता, कहना न होगा, यह मिलन दाम्पत्य जीवन में हीं हो सकता है। हालांकि आजका आधुनिक जीवन शरीर मिलन ज्यादा चाहता हैं, चाहे आंतरिक प्रेम उसमे नहीं के बराबर हो। आज का परिवार स्वतंत्रता के नाम पर कई समस्याओं से इसी लिए ज्यादा जूझ रहा है।

प्रेम के हजारों पवित्र रुप होने के बावजूद मानव वासना के चंगुल में जल्दी फंस जाता है, यह कमजोर मानसिकता का संकेत है। आइये, जानते है प्रेम और वासना अलग क्यों है। सबसे पहले वासना को परिभाषित करने की चेष्टा करते है।
ये तो तय है, वासना प्रेम का ही एक रुप है, परन्तु प्रेम में यह रुप कई सीढ़ियों चढ़ने के बाद आता है। वासना शरीर और मन की जुड़ी मिलिभगति से कभी भी किसी रुप में तन में आ सकती है, इसका आत्मा से कोई लेना देना नहीं होता।
जबकि प्रेम भावनात्मक सम्बंधों के साथ शुरु होता है, काम और वासना शारीरिक स्पर्श से। कवि दिनकरजी ने “उर्वशी” में लिखा है,” कामजन्य प्रेरणाओं की व्यापित्यां सभ्यता और संस्कृति के भीतर बहुत दूर तक पहुंची है। यदि कोई युवक किसी युवती को प्रशंसा की आँखों से देख ले, तो दूसरे ही दिन से उस युवती का हाव-भाव बदलने लगते है”। दिनकर जी के कथन की सच्चाई पर कोई सवाल नहीं किया जाना चाहिए। अततः यह तो सच ही है कि स्त्री और पुरुष का प्रथम आकर्षण ही प्रेम का प्रारभ्भ हैं। यह अलग बात है, भारतीय दर्शन में प्रेम को शारीरक और मानसिक दो अलग तत्वों में बाँट दिया। अवांछित शारीरिक सम्बंधों को वासना की परिधि में रखा गया और आपसी रिश्तों में पत्नी के अलावा सभी रिश्तों में शारीरिक प्रेम को निषेध किया गया। कई मायनों में यह व्यस्था स्वस्थ और सही लगती है। हम शायद यह तो स्वीकार करेंगे की अंतरंग प्रेम लेने में नहीं देने में विश्वास करता है, जब की वासना सब कुछ लेना चाहती है। प्रेम की उम्र लम्बी होती है, वासना की कोई उम्र नहीं होती।

आचार्य रजनीश ने संसार को ही वासना माना है। वो कहते है “संसार का अर्थ है, भीतर फैली वासनाओं का जाल। संसार का अर्थ है, मैं जैसा हूं, वैसे से ही तृप्ति नहीं, कुछ और होऊं, तब तृप्ति होगी। जितना धन है,उससे ज्यादा हो। कितना सौंदर्य है, उससे ज्यादा हो, जितनी प्रतिष्ठा है, उससे ज्यादा हो। जो भी मेरे पास है,वो कम है। ऐसा कांटा गड़ रहा है, वही संसार है। और ज्यादा हो जाए, तो मैं सुखी हो सकूँगा। जो मैं हूँ, उससे अन्यथा होने की आकांक्षा संसार है”। यानी अति ही वासना है।

यह गौर करने की बात है, कि जीवन में नवरंग ,नवरस, या नव भाव प्रमुख है, उनसे उपेक्षित सन्यासी का जीवन भी नहीं रहता, परन्तु आत्मिक सयंम से हर भाव पर उनका शरीर से, मन से और आत्मा पर सयंमित शासन रहता है। जानने के लिए जरुरी है, नव रस के यह नौ प्रकार भरत मुनि के अनुसार क्या है? उनके अनुसार…

“रतिहासश्च शोकश्चक्रोधत्साहौ भय तथा ।
जुगुप्सा विस्मयश्चैति स्थायिभावा: पर्कीर्तिता:” ।

(अर्थात रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा,विस्मय तथा निर्वेद, ये नौ स्थायी भाव माने गये है।)

बेहतर जीवन शैली प्रेम को ही आधार मानती है, यह भी मानती कि वासना से जीवन कभी अपनी श्रेष्ठता नहीं पा सकता। आज के आधुनिक युग में मन की कमजोरियों के कारण बिना उचित कारण, अनुचित शारीरिक सम्बन्ध कई तरह की बीमारियां और समस्याओं का निर्माण करता रहता हैं। वासना का निदान धर्म शास्त्रों में सयंम और आत्मिक चिंतन ही बताया गया है। जीवन में अगर कभी ऐसी परिस्थिति का निर्माण हो, तो उससे बचना ही उचित होगा। …..क्रमश….कमल भंसाली

कमल भंसाली

मन की हार…कभी नहीं, स्वीकार.. बेहतर जीवन शैली भाग १० ..प्रथम अंश..कमल भंसाली

माना, संसार सुख-दुःख की अनुपम मिसाल है, पर ज्यादातर जीवन पर दुःख ही शासन करता नजर आता है। सुख की चाह ही पहला दुःख हैं, इस चाह में आदमी कितने ही अविवेकपूर्ण निर्णय लेता हैं,पर अंत तक शायद ही सही सुख पाता हो। जन्मतें ही रोना शुरु करने वाला इंसान अपने जीवन में शायद हंसने के अनुपात में ज्यादा रोता ही नजर आता है। बिरले ही कुछ होते हैं, जो सुख की क्षणिकता से परिचित होते और हर परिस्थिति में सामान्य नजर आते है। बेहतर जीवन शैली ऐसे ही इंसानों को तैयार करने में विश्वास करती है। आइये,आज हम इसी चिंतन पर विचार करें कि हम हर स्थिति में सामान्य कैसे रह सकते है।

सबसे पहले यह स्वीकार करने में संकोच नहीं करना चाहिए की आज के आर्थिक संसार में सुख की परिभाषा भोगवादी संस्कृति से लिपटी हुई है, तथा जीवन उपयोगी साधनों का समुचित प्रयोग करना हर आम आदमी की चाहत है। इसके बाद ही वो नैसर्गिकी भावनाओं की तरफ अग्रसर होकर जीवन के नये आयामों को गूंथने की सतत चेष्टा करता है।

मानव मन की इन्हीं भावनाओं का सहारा लेकर अपने जीवन को सुखी और स्वस्थ बनाता है। यहां यह जान लेना जरुरी है, कि हमारा सारा चिंतन एक साधारण मानव से असाधारण मानव का सफर हैं। साधू, सन्यासी या महापुरुष और ज्ञान-गुरू हमारे दायरे से बहुत ऊपर होते है, क्योकिं वे स्वयं अपना ही नहीं, हम सब का भी जीवन उत्तम करने का प्रयास करते है ।

किसी ने कहा ” जीवन फूलों की सेज नहीं है”, सही भी और हकीकत भी यहीं है, परन्तु यह बात भी सही है, ” जीवन “खाली काँटों” का भी सफर नहीं है। हम अगर जीवन को समझना चाहते है, तो पहले हमें अपने शरीर के महत्व को ही समझना होगा। भारतीय दर्शन में शरीर का भौतिक मूल्य ज्यादा तर जगह नकारा गया है, आध्यात्मिक परिवेश में पले, हम इसको कुछ साँसों का मोहताज समझते है। पर हकीकत यही कहती है, जब तक जीयें, इस चिंतन से थोड़ी दूरी रखनी जरुरी है, और अपने अंतिम पड़ाव का असर निरन्तर जीने वाले जीवन पर इतना ही रहे कि हर अति से बच कर रहे।

आखिर शरीर है, क्या ? एक ऐसा सवाल जिसके हजारों जबाब हो सकते हैं। परन्तु, जीने वाले के लिए यह उसका साक्षात अस्तित्व बोध है, कि वह इस संसार में किसी के द्वारा भेजा गया है, किसी महान उद्धेश्य की पूर्ति हेतु, और उसकी भूमिका काफी संक्षिप्त होते हुए भी बहुत महत्वपुर्ण हो सकती है। शरीर की सरंचना पर गौर करने से हम एक बात दावे के साथ कह सकते है, कि बनानेवाले ने किसी भी तरह से हमे अपूर्ण नहीं बनाया। हमारा एक एक अंग अपना काम समयनुसार सहीं ढंग से संपन्न करना चाहता है, और करता भी है। शरीर के स्थूलता में भी उसने गति प्रदान करने के अंगों को सशक्त और मजबूत बनाया, तथा जीवन के कार्यक्रम जाननें के लिए हमें एक आधुनिक और निरन्तर विकसित दिमाग भी दिया। इन सबसे ऊपर जो बात है, वो हमें सदा याद रखने वाला जीवन दिया है। जिसके अंत का एहसास और उसकी समय सीमा की परिधि बोध की सच्चाई को स्वीकार करने की हिम्मत दी तथा हमें जीनें की लालसा दी।

शरीर की ऊपरी सतह पर चमड़ी का सुंदर आवरण देकर उसने इन्सान को संसार में सबसे महत्वपूर्ण और विशिष्ठ बनाया। दुनिया बनानेवाले ने हर सजीव जीव, जन्तु और प्राणी को एक सीमितता दी, परन्तु ‘मानव’ को एक असीमित दायरा दिया, स्वभाविक है, कि जिम्मेदारी का बोध भी उसे दिया। इंसान को अपनी कसौटी पर जांचने के लिए बनानेवाले ने उसके शरीर में एक द्वार बनाया जिसका बोध इन्सान को कम रहता है, और उसे हम “आत्म-द्वार” कह सकते है, संक्षिप्त में हम इसे आत्मा के नाम से भी पुकारते है। कहते है, ना, आत्मा ही “परमात्मा”।

शरीर में विधाता ने कितने ही ऐसे तत्वों को हमारे बहने वाले खून में डाले जिन्हें हम गुण-अवगुण के रुप में परिभाषित करते है, और इनका प्रभाव हमारे शरीर के साथ हमारी संचालक “आत्मा” पर भी पड़ता है। आत्मा की सकल अनुभूति ही जीवन का सार है, उसकी सार्थकता है। मानव चेतना का एक स्वरुप् “मन” है,जो मसितष्क का हि एक प्रकार्य है। यही मसितष्क की उन क्षमताओं का विकास करता है, जिनका चिंतन कर मानव अपने जीवन स्वरुप को गति प्रदान कर सकता है।

आइये, हम हमारे विषय “मन की हार, कभी नहीं” के मूल तत्वों पर गौर करते है।

ओशो, कहतें है कि “हम जो भी करते है, वह मन का पोषण है। मन को हम बढ़ाते है, मजबूत करते है। हमारे सारे अनुभव, हमारा ज्ञान, हमारा संग्रह, सब हमारे मन को मजबूत और शक्तिशाली करने के लिए है”। उनका तो यही मानना है, कि सिर्फ पूर्ण सन्यासी अ-मन की ओर चलता है, बाकी सब मन से शासित होकर चलते है, और यही सुख-दुःख की वजह है। कबीर दास जी मन को गंगाजल की तरह निर्मल मानते है, जिसे आत्मा संचालित करती है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार मन दो भागों में विभक्त है, एक चेतन दूसरा अचेतन।फ्रायड का मानना था कि मन का सबसे बड़ा भाग अचेतन होता है। उनके अनुसार अचेतन मन व्यक्तिगत होता है और इसका सम्बन्ध मानव के अपने व्यक्तिगत जीवन से होता हैं। उसके अचेतन मन में वही सारी इच्छायें या विचार होते है, जो पहले उसके चेतन मन में थे। हम सभी जानते है की इच्छाएं नैतिक और अनैतिक दोनों प्रकार की होती है। मानव को सिर्फ नैतिक साधनों का उपयोग कर जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि उसकी सफलता जितनी निष्कलंक होगी, उतनी ही पवित्र और याद करने योग्य होगी।…..क्रमश……

कमल भंसाली

मंथन का दर्पण ……..कमल भंसाली…..

वक्त कहां मिलता
जीने के लिए
दौड़ ही रहा हूँ, अभीतक
अस्तित्व, बचाने के लिए

मंथन था, कभी
जीवन नवरंग
रस बरसायेगा
मधु, जैसे
दिन रात का
मधुपान करायेगा
मदहोश होकर
रंगीनी के
राग सुनाएगा
दिल थोड़ा
बहल जाएगा
शायद वक्त का
नजरिया बदल जाएगा

वक्त कहां बदलता
मैं ही बदल गया
दौड़ते दौड़ते
थक गया
सर्वात का सत्य
मिल गया
सर्वेशवर ने
वक्त को यमदूत
पहले ही
बनाकर भेज दिया

सौलक्षण्य जीवन
का हुआ लक्ष्य एक
मानसरोवर का हंस
कब तक तैरेगा
आज नहीं तो कल
जीवन से भी डरेगा
मोह के बन्धन
की खोली डोरी
समझ गया, धरा नहीं, मेरी
जाना है, अनन्त की ओर
अधूरी इच्छायें
अतृप्त आत्मा
असत्य की
अंतिम बुलन्दी
चाहे, कितना ही
मचाये शोर

चित्ताकर्षक, संसारिक दीवारें
धुंधली, धुंए की लकीरें
चित्रणी की त्रिवेणी
असहज संगिनी
न स्वर्ण, न सुनहरी धूप
न शीतल चांदनी
पर होगी
गंगा की लहरें
वक्त को समर्पण
कर देगी
अतृप्त रुह मेरी

दूर खड़ा
निहारुंगा, अपना सत्य
बेजान, काया का
नंगा, अस्तित्व
क्षीर सागर की माया
“कर्म गागर”
विसर्जन, करेगी
विषाक्त, तत्व
एक बूंद, चन्दन की
तलाश बन जायेगी, आत्मा की
फिर कोई प्रश्न, गहरायेगा
अनुत्तरित उत्तर
आत्मभिव्यंजन होकर
फिर एक नई
दिशा तरफ, मुड़ जाएगा
वक्त का करिश्मा
शायद ही कोई “इन्सान”
समझ पायेगा……..

कमल भंसाली