👉अनचाही हताशा👈 कमल भंसाली

जिंदगी को चाहा था कभी जिन नजरों से
अब वो नजर आती नहीं बात जिंदगी में
कभी सजाना चाहा इसे प्यार के जज्बातों से
अब प्यार दिखता नहीं इसकी महफ़िल में

कशिश भरी प्यार से लबालब जिंदगी
अब तन्हां और मजबूर रहती जिंदगी
कभी पल्लवित होती बहुरंग के फूलों में
आज ढूंढ रहीं स्वयं को टूटे फूटे उशूलों में

क्या दिन थे जिंदगी के, आज हो रहे मोहताज
सजीव होकर भी बजा रही निर्जीव बेसुरे साज
करना था राज दासी हो गई अर्थ तंत्र की आज
समय की मारी, चुपचाप सह रही तनाव सहज

अति साधनों का जहर इसके शरीर में फ़ैल रहा
समय से पहले यौवन बुढापे को स्वीकार कर रहा
बचपन की नादानियों को नशे में मदमय नचा रहा
विषित स्वाद भरे व्यंजनों से उम्र को तरसा रहा

आज की कारगुजारियां कल न हो जाये भारी
संशय में हूं कैसे याद दिलाऊ उसे समझदारी
जरूरतों की चाह में दिनों दिन हो रही यह भारी
जीने की मजबूरी से भटक रही इधर उधर बेचारी
रचियता✍ 🌷कमल भंसाली🌷✍

🐙मंगलमय सहयोग 🐙 जीवन सूत्र भाग 2 अंश 1 🐙 🌺कमल भंसाली🌺

इंसानी जीवन की सबसे खूबसूरत जरुरत होती है, “सहयोग”, इस शब्द को अगर परिभाषित किया जाय तो शब्द की सार्थकता अपने आप झलकने लगती है। हकीकत यह है, कि इसके बिना जीवन का कोई भी सूक्ष्म सा सूत्र नहीं तैयार किया जा सकता। सहयोग एक वो तत्व है, जो सहारे को तलाशता है, पर, इसकी मजबूरियां भी बड़ी विलक्षण होती है, सबसे पहले इसकी जरुरत को ही लीजिये, इसको किसी का साथ जरुर चाहिए, अकेले से इसका वजूद तैयार नहीं होता। जीवन के लिये सहयोग प्राणदायक तत्व है, भावनाओं से ही इस का निर्माण होता है।

यह सच है, हर प्राणी अकेला संसार आता है, पर उसके आने में भी सहयोग की जबरदस्त भूमिका होती है। प्राणी मात्र का जन्मबीज पांच तत्वों ( क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा यानी धरती, पानी, अग्नि, आकाश एवं वायु ) के आपसी सहयोग से ही तैयार होता है, यानी, सहयोग का धरातल आपसी सम्बंध होते है, सम्बंधों की सहजता से सहयोग की बुनियाद बनती है।

चूँकि हम मानव जीवन के सूत्र तलाश रहे है, अतः हम यहां सिर्फ उन्हीं बिंदुओं पर चर्चा करना पसन्द करेंगे, जिनको जानने से मानव जीवन का उपकार हो सकता है। यह तय है, असंख्य मानव का सभी के साथ सम्बंध नहीं हो सकता परन्तु सहयोग आपस में किया जा सकता है, इसे हम सामूहिक सहयोग कह कर प्राप्त करते है, या खुद दे सकते है। ऐसे सहयोग पवित्र और सुंदर कामों में अब तक ज्यादा दिखाई दे सकते है, परन्तु विधि और वक्त का कमाल समझिये गलत कामों में भी आजकल सामूहिक सहयोग का उपयोग लोग कर लेते है। इसका कारण कमजोर मानसिकता तो है ही, पर गलत लोलुपता के कारण सामूहिक हिंसा में इसका प्रयोग बढ़ना निसन्देह चिंता की बात है। कहते है, बिना स्वार्थ का सहयोग मिलना कठिन है, ऐसा चिंतन करने से पहले इस तथ्य पर भी गौर करना लाजमी होगा, जैसे बिना कारण कोई काम नहीं होता, वैसे ही बिना कोई आकांक्षा का सहयोग आदान प्रदान करने लायक नहीं होता। संक्षिप्त में यह ही कहा जा सकता है, इस सूत्र के बिना जीवन सहस्त्र मुखी नहीं बनाया जा सकता क्योंकि हमारा जीवन सजीव, निर्जीव दोनों तत्वों के सहयोग पर पूर्णतयः निर्भर रहकर कर ही गतिशील बना रह सकता है। सहयोग के बारे में हमें यह जरुर ध्यान रखना होगा की इसके लिए अपने दैनिक रवैये में इस तत्व से हम विमुख नहीं रहे, कहा भी गया है, ” Self help is best help.” जब हमें अपने आपका सहयोग जरुरी है, तो फिर दूसरों द्वारा चाहे सहयोग पर उचित शंका ही रहनी चाहिए।

“सहयोग” जीवन का महत्व पूर्ण सूत्र तत्व होते हुए भी इसकी सही समझ तब तक मानव को समझ में नहीं आती, जब तक वो सम्बंधों का महत्व नहीं समझता। इसलिए गुणी लोगों ने सम्बंधों की परिभाषा को विस्तृत आयाम देते हुए, मानव को सामाजिक प्राणी की पदवी दी, तथा समाज में उसके सहयोग को उसकी जिम्मेदारी बताई गयी। सच भी है, अकेला इंसान आखिर क्या करता ? चूँकि समाज शब्द में विस्तृता ज्यादा थी, अतः उसको मुख्य अंश से बाँध कर परिवार, जातियों , रिश्तों आदि का निर्माण किया गया, जिससे मानव अपनी भूमिका में प्रभावकारी बन जाए। गौर कीजिये, आज तक की हमारी उपलब्धियों पर तो स्वयं ही समझ में आ जाएगा, सहयोग से हमनें कितनी सक्षमता हासिल की। परन्तु सहयोग को जब लज्जित होना पड़ता है, तब कुछ गलत प्राणी अपनी तुच्छ महत्वकांक्षाओं के लिए इसका दुरुपयोग करने लगते है। ध्यान यही रखना है, कि हमें हमारा विवेक कभी गलत सहयोग के लिए विवश न करे।

हम अपनी ही दिनचर्या पर जरा सी नजर डाले तो समझ में आ जाएगा, हमारा अस्तित्व को कायम रखने के लिए हमें हर कदम पर एक दूजे का सहयोग जरुरी होता है, परन्तु इंसानी फितरत है, कब मन बदल जाए, इस चंचलता को भी लगाम देने के लिए हर सहयोग को मूल्य आधारित करना जरुरी हो गया तो अर्थ को अपनाना लाजमी था, और बहुत सारे शारीरिक सहयोग के लिए अर्थ समर्थित व्यव्यस्था का निर्माण किया गया, जिसे हम अर्थ व्यवस्था के नाम से पहचान लेते है। हॉलंकि आत्मिक और नैतिक सहयोग में अर्थ को सीमित दायरे में जरुरत के अनुसार आज भी रखा जाता है। सहयोग को कई तरह से वर्गीकृत किया जा सकता है जैसे शारीरिक, मानसिक, और आत्मिक, शारीरिक सहयोग की भूमिका का अवलोकन किया जा सकता है, बाकी दो सहयोग का अनुभव वंदन किया जाता है। सहयोग को कभी कभी वापस लेकर भी कुछ परिणामों को बदलने की चेष्टा भी की जाती है, उसे हम “असहयोग” के नाम से जानते है। इसका सही और सटीक उदाहरण महात्मा गांधी का असहयोग आंदोलन के रुप से जग जाहिर है, उनका यह परीक्षण हमारे सर्व हित में था, अतः सफल रहा और विश्व में नेल्शन मण्डेला जैसे नेताओं ने अपने देश की स्वतन्त्रता के लिए अपनाया। चूँकि काफी भावुकता से सम्बंधित होता है इस प्रकार का सहयोग भरा असहयोग अतः मानव कल्याण सम्बंधित उद्देश्यों में ही इसका प्रयोग उचित लगता है।

सहयोग की खासियत इस बात से भी समझनी सही होगी की इसमे त्याग की भूमिका अहम रहती है, चाहे वो शारीरिक, मानसिक परिश्रम, समय या फिर अर्थ और वस्तु या फिर कोई और, देने वाले को अपना हिस्सा इसमे लगाना ही पड़ता है, अतः गुणवत्ता के आधार पर इसका लेन देन किया जाय, तभी सहयोग की सार्थकता सफल हो सकती है। जीवन को चमत्कारिक बनाने के लिए यह जीवन सूत्र काफी सक्षमता प्रदान करता है, इस पर हमें सूक्ष्मता और गंभीरता से समझना चाहिये।

सहयोग की भावना में पवित्रता जितनी होगी उतना ही इसे प्रभावकारी बनाया जा सकता है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार “संदेह करने वाले व्यक्ति के लिए प्रसन्नता ना इस लोक में है, ना ही कहीं और, अतः हैलन केलर का कथन ” Alone we can do so little ; together we can do so much.” हमारे व्यक्तित्व विकास के लिए, काफी प्रेरक हो सकता है, ध्यान रखना सही होगा।… क्रमश….

लेखक**कमल भंसाली**

₹₹** पहचान**₹₹ कमल भंसाली

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वक्त न बदला, मैं ही बदल गया
कल तक सब के साथ ही चला
आज अकेला ही राही रह गया
पथ मेरा, कितना खुदगर्ज हो गया

कल तक जो अपनेपन का दंभ भरते
मेरे साथ ही अपने हर कदम बढ़ाते
नाज था उन्हें मुझपर , हमराही कहते
आज वही चेहरे, मुझे भीड़ समझते

छोटी सी “अर्थ” की एक हल्की बून्द
रिश्तों की परिभाषा का सच समझाती
भ्रमित नीर से निपजी सम्बंधों की खेती
क्यों जिंदगी, बेवजह अपनी पीठ पर ढ़ोती

कल के लिए, नभ् को मैंने कितना संवारा
फिर भी आज, डूब गया मेरा हर सितारा
देखो, भाग्य का खेल होता कितना गहरा
अपनों से ही मन को नहीं मिलता सहारा

कहने को सब है, आज भी मेरे अपने
पर दिल नहीं देखता, अब उनके सपने
उनकी निगाहों में शक ही झिलमिलाता
प्यार तो अब उनके बहानों में बह जाता

सच तो यह है, कोई किसी का नहीं होता
कपड़े उतारों, तो हर इंसान नंगा ही होता
जीवन एक रंग का सदाबहार सपना नहीं
दूसरों की मजबूरी पर हंसना गुनाह नहीं

मेरी यह कविता, नहीं एक स्वस्थ सन्देश ही समझो
जीवन में अर्थ के अनर्थ की जहरीली संभावना समझो
कल तक जिस “कमल” के फूल ने सबको महकाया
आज, मुरझा गया, तो उसका उपयोग कम नहीं समझो

रिश्तों की कमजोर दीवारे जब गिरती
जीवन के प्रांगण में जगह बढ़ जाती
शिकायत नहीं, अब ख़ुशी ही मिलती
खुद को पहचान, अब, खुद से ही मिलती……..कमल भंसाली

★★झूठ को सहारा, सत्य बेचारा ■■■एक चिंतन■■■ कमल भंसाली

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सत्य और झूठ जीवन के झूले में दो छोर का काम करते है, आजकल, इस कथन को हम चाहकर भी झुठला नहीं सकते। सच की जरुरत सभी को रहती है, पर उसका सब समय साथ निभाना आसान नहीं है, यह हमें स्वीकार कर लेने कोई शर्म नहीं होनी चाहिए, क्योंकि निश्चित है, कलयुग में आसमान नहीं गिरेगा न ही किसी के लिए धरती फटेगी। सच की कीमत अनमोल होती है, उसे प्राप्त करना आसान नहीं होता। सच और झूठ दोनों का सम्बंध आत्मा से है, सच आखिर सच है, कभी कडुआ भी लगता है, परन्तु परिणाम सटीक और सही ही बताता, अतः आजकी लोभ भरी जीवन शैली इससे दूर ही रहना चाहती है। झूठ मीठा जहर जरुर है, पर गुनाह की दुनिया में रहने वाले इसका भरपूर उपयोग करते है। आधुनिक युग की जीवन शैली भी इससे अछूती नहीं है, दैनिक जीवन की छोटी छोटी समस्याओं को इससे ही निपटने की कोशिश जरुर करती है। झूठ आधुनिक युग का लाइलाज मानसिक रोग बन गया है, न चाहते हुए भी आदतन इन्सान इसका प्रयोग कर लेता है। सबसे बड़े आश्चर्य की बात यही है, की झूठ बोलते आजकल कोई आत्मिक दुःख का भाव नहीं बनता, उलटा चिंतन यह हो रहा है, कि सत्य को कभी उजगार कर दिया तो शायद मेरी सामाजिक सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। आइये, थोड़ा विश्लेषण सच और झूठ का आज के युगानुसार करने की चेष्टा करते है, जानने की यह भी कोशिश करते है, क्या वाकई दैनिक जीवन में हम इन दोनों से कैसे प्रभावित हो रहे है ! ,फिर इसको रोकने में अपनी असमर्थता का भी जिक्र कर लेते है। क्योंकि, हम जानते है, इस प्रयास में आगे हम जा नहीं सकते, आखिर निजी स्वार्थ बिना साधनों भरी जिंदगी हमें कैसे भोग सकेंगे।

शुरुआत आत्मा के साथ करते है, क्योंकि जीवन के सफर में अंतिम पड़ाव पर इनका मूल्यांकन हर तन को करना पड़ता है, गौर करने से यह बात कई बार स्थापित भी की जा सकती है। एक प्राण जाते इंसान के चेहरे पर गौर करने से हमें कभी नजर आता है, कि उसके चेहरे पर पसीना और शरीर में दर्द की प्रकाष्ठता तड़पाती है। कहते है, इसी समय इंसान को सत्यता के दरवाजे से गुजर कर अपनी अगली यात्रा का वीजा लेना पड़ता है और हम जानते है, कि दूसरे अच्छे देश के लिए वीजा प्राप्त करना कितना दुःखदायी होता है। ख़ैर, जब आत्मा की बात कर रहे है, तो थोड़ा पीछे के युग का वो दर्शन आगे लाते है।

रामायण या महाभारत की अगर बात करे तो ग्रन्थ यही बताते है, सत्य जीवन शैली में छाया हुआ था, असत्य को जल्दी गले लगाने से डरते थे। भूल से भी इसका प्रयोग हो जाता, तो लोग प्रायश्चित करने की सोचते। रावण में कई अवगुणों का जिक्र होता है, पर उसमें एक गुण सत्य का था, उसके चलते वो भगवान शिव का परम् भक्त कहलाने लगा और असीम शक्तियों का मालिक बना। परन्तु, जब उसने झूठ का सहारा लेकर माँ सीता का अपहरण किया तो उसे भगवान राम को नष्ट करना पड़ा। कुछ इस तरह महाभारत के युद्ध में हुआ जब सत्यनिष्ठ युधिष्ठरजी को गुरु द्रोणाचार्य का वध करने अश्वथामा हाथी का वध कर सत्य को स्थापित करना पड़ा, हालांकि यह छल के अंतर्गत था, परन्तु इससे उनको भी प्रायश्चित के साथ द्रोणाचार्य के श्राप को भोगना पड़ा। दोनों ही उदाहरण से साबित हो सकता है, जीवन तत्व सच ही है।

साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।
जाके हिरदै साँच है, ताके हिरदै आप।।

सत्य के सन्दर्भ में संत कवि कबीरदासजी का अनमोल और जीवन उपयोगी यह दोहा प्रायः हम लोग सभी समय समय पर गुनगुनाते रहते है, पर आत्मा इससे बेअसर रहती है, क्योंकि इसके व्यवहारिक पहलू पर ही सिर्फ नजर भर रहती है, जीवन आदर्श में आज इसका महत्व नजर कभी कभार ही आ सकता है। दुनिया को देखने और समझने के लिये दो दर्पण हम सदा प्रयोग करते है, एक खुद को निहारने के लिए, दुसरा दुनिया के कार्य कलापों की समीक्षा के लिए। कहने की बात नहीं होनी चाहिए कि हम अपने झूठ को संवार कर सत्य के रुप में ही निहारते है।

जैसे जीवन को परिभाषित नहीं किया जाता, वैसे ही सत्य की सही परिभाषा खोजना आसान नहीं है। अगर मनोविज्ञान के जानकार की बात करे तो उनका सार यही आता है, कि जिसके बोलने बाद याद रखने की जरुरत नहीं हो, वो सत्य है या सत्य के आसपास है। उनके अनुसार बोले हुए झूठ को याद रखना पड़ता है। झूठ को स्थापित करने के लिए कई बार झूठ और बोलना पड़ता है, फिर भी वो सत्य नहीं बन सकता। इसे भी एक सही तथ्य मानना जरुरी है, कि सत्य लम्बी अवधि तक छुपाना मुश्किल से भी मुश्किल होता है। सत्य चैन देता है, झूठ परेशानी बनकर ऐसा मेहमान बन जाता है, जिसको सत्य के द्वारा ही आत्मा से निकाला जा सकता है।

सच शीतल होता है, निरन्तरता का अबाधित प्रवाह है, झूठ ठहरा हुआ, दलदल जिसमें फंसने वाला शायद ही तबतक निकले, जब तक वो सत्य का सहारा न ले। प्रश्न आज जो हमारे सामने खड़ा है ? उसका उत्तर शायद आसान नहीं है, पर जानना भी जरुरी है, जब सच इतना गुणमयी है, तब हम अपनी जीवनशैली में उसका उचित प्रयोग क्यों नहीं कर पाते ? क्यों हम छोटी छोटी गलतियों पर झूठ का दामन पकड़ लेते है ? उत्तर तो शायद ही कोई सही मिले, पर एक चिंतन जीवन को जरुर करना चाहिए कि झूठ का सहारा किसी भी समस्या का समाधान नहीं, सिर्फ कुछ समय के लिए एक सांत्वना भर है। आज आधुनिक उपकरणों का युग है, किसी भी बात की प्रत्यक्ष कीमत आंकनि जब मुश्किल होती है, तो झूठ अति उत्तमता लेकर सत्य का बोध कराने की चेष्टा करता है। मोबाइल का जब से प्रसार हुआ, झूठ व्यापार से परिवार तक फेल गया, विश्वास कमजोर हो रहा है, आदमी भय से आक्रान्त होकर सत्य का साथ निभाने से कतराने लगा है। धर्म कितना ही विरोध करता है, झूठ का, परन्तु अंततः वो भी कमजोर साबित हो रहा है। सवाल यह भी है, क्यों झूठ और सत्य का चिंतन आज के सन्दर्भ में ही किया जाय, जबकि यह तो सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया का एक तत्व रहा है ? इसका उत्तर इतना ही काफी है, कि सत्य
उस समय इतना कमजोर नहीं था, झूठ पर शर्मिंदगी का अहसास होता था, झूठ बोलनेवालों को स्वयं लज्जा का अनुभव होता था। आज की विडंम्बना यही है, की झूठ को दैनिक जीवन शैली में मान्यता मिल गई, और यह स्वीकार कर लिया गया कि झूठ बोलना कोई गुनाह नहीं एक सम्भाविक दैनिक क्रिया है। आज तभी तो यह कोई दावा नहीं कर सकता कि वो सत्यनिष्ठ है, सदा सच बोलने की कौशिश करने वाला इंसान है।

झूठ के कई प्रकार हो सकते है, परन्तु सत्य एक ही रकम का होता है। झूठ पकड़ा जा सकता है, सत्य निर्विक होता है, अतः उसे कोई परीक्षा अनुतीर्ण नहीं कर सकती । पता नहीं, हम जीवन के उस आत्मिक पहलू पर क्यों नहीं गौर कर रहे है, जिसकी पवित्रता के बिना हम अंदर से खुश, सुखी, और प्रसन्नता का अनुभव हमें नहीं हो पाता। हमारा चिंतन क्यों इस तथ्य पर गौर नहीं कर रहा कि एक दिन तो झूठ से अर्जित नाम, दौलत और शौहरत छोड़ कर जाना पड़ेगा और ईश्वर के सामने खड़ा होना होगा, निसन्देह वहां झूठ हमारा, कोई काम नहीं आयेगा। हो, सकता है, सत्य साधारण जीवन दे, पर वो स्वच्छ और सफल जीवन कहलायेगा। हमें भूलना नहीं चाहिए कि हमारे देश में ही पैदा हुए थे, सत्यनिष्ठ राजा हरिश्चंद्र ….आखिर थे, वो भी इन्सान, तो फिर हम क्यों सब जगह झूठ का सहारा ले ….क्या यह सही चिंतन नहीं है ? …..क्रमशः ….कमल भंसाली