💑नाशाद प्यार💑 कमल भंसाली

नाशाद हुए थे कभी तेरे प्यार में हमदम
इस राज को दिल मे छुपाएं हुए थे हम
वक्त की मजबूर लहरों में बह गये थे हम
इजहारे मौहब्बत न कर पाये कभी हम

कहते है प्यार की खुशबू जज्बाती होती
दामन चाहत के फूलों का छोड़ बह जाती
नूर का मोती बन पाक इबादत बन जाती
एक दिन महबूब की मैहंदी बन रच जाती

फिजाओं के रंग जब बदरंग हो नैनों में छा जाये
माशूक के सपनो में जब प्रेम दृश्य राह भूल जाये
मत पूछना क्यों सच्ची मौहब्बत मंजिल नहीं पाये
दस्तूर है वफ़ा पर जरूरी नहीं हर कोई सही निभाये

आज गैर की अमानत हो हम कुछ नहीं कहते
सरे राह चलते देख तुम्हें अपने नयन भी झुकाते
पर इश्क वो बला है हम लाख छुपाए न छुपा पाते घबराते तुम्हारे लब देख हमें जब निशब्द थरथराते

अपनी चाहते जब किसी गैर की अमानत हो जाये
बैचेन हुए अरमानों को तुम्ही बताओ कैसे छुपाये
जग की ये कैसी रीत कि बीते प्यार को भूल जाये
न पूछो हाल प्यार का जब गैर की बांहों में खो जाए

प्यार तो प्यार ही होता जो दिल मे ही बसा रहता
जिन्दगीं की धूप छांव में दर्द के सैलाब से राहत देता
प्रथम प्यार की प्रथम कहानी न समझो कभी बेगानी
अजनबी यादों की मासूमियत स्मृतियां ही ज़िंदगानी
रचियता: कमल भंसाली

🎯 जिंदगी 🎣 कमल भंसाली

जिंदगी कुछ साँसों की विरासत है
कुछ भी कह लो, ये कोई अमानत है
मालिक नहीं इसके, हम खिदमगार है
साबित करना हमें, कि हम वफादार है

कल की यह परिभाषा आज ही बनाती
अभी के सब रंग को ही सिर्फ पहचानती
गांठ बांधलों बात, ये कभी नही बखस्ती
गलत हुए तो सिर्फ सजा ही देना जानती

कहते है, आसमान से ये आती
पाताल तक की यह यात्रा करती
जन्मों की खींची रेखा पर चलती
हर पड़ाव का ये अवलोकन करती

ऊपर से मीठी, भीतर से होती सख्त
संशय, भ्रम ही इसके ताज और तख्त
अभिमान की पोशाक में जब सजती
अपने वजूद को सदाबहार ही समझती

समझ इसकी सब को सही नहीं आती
पटी लालच की सबको गंधारी बना जाती
समझ इतनी ही होगी इसकी बहुत कीमती
एकबार की जिंदगी पता नहीं फिर कब मिलती !
😵 रचियता 🏀 कमल भंसाली

आखिर..मैं हूं… तुम्हारा पिता…. कमल भंसाली


तुम्हारी आँखों की
तिजोरी में
मैंने कुछ अपने, “सपने”
धरोहर, समझ
भविष्य, के लिए
सुरक्षित रखे थे
मुझे आज भी है, याद
उन में थी, मेरी कुछ
आशा की बुँदे
अमानत थी, वो मेरी
तुम कहीं रख कर, भूल गए
ये, कह कर मुक्त हो गए
मैं कुछ नहीं कह सकता
आखिर…मैं हूं….. तुम्हारा पिता…..

तुम्हारे प्रथम “स्पर्श” से
जिंदगी मेरी, हुई आश्वस्त
बुनी, मैंने
भविष्य की डोर
दिया, उसका एक छोर
तुम्हारे हाथ में
दूसरे को पकड़े रहा
तुम खेलते रहे
बड़े होते रहे
खेलते,खेलते, तुम सब भूल गए
मैं पकड़े रहा, तुम छोड़ गए
तुम खड़े रहे, मैं गिर गया
गिर कर
उठना आसान, नहीं
गिरे को उठाले,
इतना वक्त तुम्हारे पास नहीं
मेरा पहला स्पर्श
आज भी उधार रहा
मांग नहीं सकता
आखिर…मैं हूं… तुम्हारा पिता….

गोद में, मेरी
कितने निश्चिन्त
तुम हो जाते
नयनों में उबासी भर
चैन से, सो जाते
वक्त बीत गया
आज मजबूर, “मेरी कराहट”
तुम को देती, झुंझलाहट
तुम कुछ नहीं, बोलते
बिन बोले, मैं समझ जाता
पर जानते हो, तुम
ऊपरवाले से बुलावा
जल्दी नहीं आता
तुम्हारी झूठी मुस्कान
से, मैं सहम जाता,
तय यही है,
दी हुई धरोहर
तुमसे, इस जन्म में
वापस, पा नहीं सकता,
क्योंकि, मैं मांग नही सकता,
आखिर …मैं हूं,..तुम्हारा पिता…. “कमल भंसाली”

कमल भंसाली