💖अपना भारत महान💟कमल भंसाली

जहां सहज सरल जीवन अपना
जहां सुंदर मधुर रिश्तों में अपनापन
जहां जन्म लेकर भाग्य को भी हो गर्व
जहां उल्लास और उन्नति के हो कई पर्व
जहां धर्म संस्कार नैतिकता को हो सम्मान
दोस्तों.. वह देश है अपना भारत महान

जहां सदियों पुरानी सुदृढ़ संस्कृति
जहां अपना पूरा वैभव लुटाती प्रकृति
जहां सूर्य की प्रथम किरण से आती जागृति
जहां अंहिसा की जाती खेती
जहां सर्वधर्म की होती उन्नति
दोस्तों.. वह देश है अपना भारत महान

जहां राम रहीम ईसा सभी का वास
जहां गंगा यमुना के संगम का निवास
जहां हल्दीघाटी जैसी वीरता का साहस
जहां बुद्ध, नानक, महावीर वाणी का सूवास
जहां हर घर में धार्मिक संस्कारों का प्रवास
दोस्तों… वह देश है अपना भारत महान

जहां नारी हों पूर्ण संस्कारी
जहां रहते दानी और परोपकारी
जहां रामायण,गीता, बाईबल और कुरान
जहां का संविधान कहता हर धर्म समान
जहां हर भाषा और जाति का पूर्ण सम्मान
दोस्तों.. वो देश है अपना भारत महान

जहां धर्म अनेक पर तत्व सर्व एक
जहां जियो और जीने दो का विचार
जहांआस्थओं को होता पूरा अधिकार
जहां गाय को माता जैसा मिलता प्यार
जहां धरती को मिलता माँ का अधिकार
दोस्तों.. वो देश है अपना भारत महान

जहां हर नागरिक को समान अधिकार
जहां सीमा पर हर कोई मरने को तैयार
जहां तिरंगा लहराये हर आत्मा पर
जहां जन गन मन से करते सब प्यार
जहां देश को हो जरूरत सब बोले बंदे मातरम्
दोस्तों ..वो देश है अपना भारत महान

रचियता ✍कमल भंसाली✍

बुढ़ापा की दस्तक…….कमल भंसाली

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“बुढ़ापा” दे रहा, दस्तक
खोल, उम्र का दरवाजा
सामने हूं, उसके नतमस्तक
यौवन, दगा दे गया
सारी करतूतों का साथी
पता नहीं, कहां भाग गया
मृत्यु का दूत, बुढापा
ऊपर वाले का, फरमान
पढ़ कर, सुना रहा
बचे काम, पूरे करने की
हिदायत दे रहा
जिंदगी में, जो न समझा
अब समझ में आ रहा
बुढ़ापा खड़ा, मुस्करा गया

कल की चिंता, सदा की
आज, रहा सदा अपरिचित
दर्पण ने कितना भरमाया ?
देह का ही सदा दर्शन कराया
साज सिंगार ने किया गर्वित
भूल गया, जीवन तो है, भर्मित
जो जीया, वो वापस नहीं आया
बचपन ने, नादान बनाया
जवानी ने, मदहोश किया
लोभी गली में, घर बसाया
कंचन, कामिनी से दिल बहलाया
पवित्रता ने,कई बार सन्देश भिजवाया
पिया, मोहे, क्यों भूल रहे
मदहोशी में, सब ठुकराया
होश आया, लूटा पाया
सब गलत पाठ पढ़ गया
होने वाली परीक्षा से
आत्मा में, भय जाग गया
“बुढ़ापा” खड़ा, मुस्करा गया

कौन अपना, कौन पराया ?
किसी को छोड़ा,
किसी को अपनाया
वक्त का सरमाया
अब ध्यान में आया
अस्तित्व का था, खेल
भूल गया, तन भाड़े पर पाया
समय सीमा का ध्यान,
पहले, क्यों नहीं आया
मेरे इस चिंतन पर
“बुढ़ापा” खड़ा, मुस्करा गया…….कमल भंसाली