💖प्रेम 💔 जीवन निर्माणिक प्रथम तत्व 👉 जीवेश जीवनानंद👈 भाग 2✍ 🍂कमल भंसाली 🍂✍

” जीवन के आनन्द “को परिभाषित करना सहज और सरल नहीं है, इसको महसूस करना ही ज्यादा महत्व पूर्ण है । अगर हम इसकी अनुभूति को ही इसकी परिभाषा मान ले तो शायद कोई अतिशयोक्ति भी नहीं होनी चाहिए क्यों कि सबसे पहली अनुबन्धिता जीवन की शायद हमारे शरीर के अंदर वास करने वाली आत्मा से है। चूँकि जीवन शरीर की उपलब्धि है, अतः शरीर उस पर अपना सर्वेश अधिकार समझता है। शरीर और आत्मा वैसे एक दूसरे के पूरक होते है, परन्तु जैविक अनुसन्धान कहता है, दोनों की भूमिका कभी कभी एक दूसरे के विरुद्ध काम करती है, इसका शायद एक ही कारण हो सकता है, शरीर भोग द्वारा ज्यादा आनन्द कि प्राप्ति चाहता है और अदृश्य आत्मा ज्यादातर त्याग व संयम द्वारा अपना उत्थान चाहती है। फिर भी, दोनों का उद्धेश्य सुख और दुःख का भविष्यत अनुसन्धान ही लगता है। कर्म की धूरी से प्रभावित जीवन ज्यों ज्यों विचरण करता है, तब वो बहुत सारे जैविक तत्वों के सम्पर्क में आता है, जिनको वो अपनी विस्तृतता के सफर का साथी मान लेता है। जन्म से पूर्व और बाद में हर जीवन एक तत्व से सबसे ज्यादा प्रभावित होता है, और उससे जन्म पूर्व ही अपनी अवधि तक साथ निभाने का वादा भी ले लेता है, वो है “प्यार” जिसे हम प्रेम भी कहते है और इसकी अभिव्यक्ति को एक इंग्लिश शब्द और भी आकर्षक नाम देता है, ” लव” (Love)। प्यार जीवन का सिर्फ दोस्त ही नहीं उसका एक हथियार भी कहा जा सकता है, जिसमें हजारों तरह की शक्तियों के अलावा एक विशिष्ठ शक्ति भी होती है, जिससे हिंदी में “भावना” और इंग्लिश में “इमोशन” ( Emotion) नाम से हमारा परिचय है। परन्तु कहते है ना इस जग में किसे भी पूर्णता प्राप्त नहीं हो सकती, कुछ कमियों का उनमें धरोहित होना जरुरी होता है, क्योंकि प्रकृति विकास की माँ है, और सन्तान की कमियों को छुपाना हर माँ अच्छी तरह जानती है। चूँकि हम हिंदी भाषा में अपनी चर्चा को अंजाम दे रहे है, अतः सही होगा हम इसी भाषा में प्रयुक्त होने वाले शब्द ही ज्यादा प्रयोग करे फिर भी चर्चा की उत्तमता के लिए किसी भाषा से परेहज करना भी उचित नहीं लगता, अतः यहां हम 1880 में विलियम जेम्स के उस सिद्धांत पर भी एक नजर डालना चाहेंगे जिसके अनुसार भावना को सिर्फ मानसिक अवस्था का उत्पादन नहीं मान सकते क्योंकि उसका सम्बंध कहीं न कहीं शरीर कि अवस्था से भी होता है। भावनाओं का “दैहिक सिद्धांत” भी होता है, हालांकि इस सिद्धांत को बीसवी सदी तक कोई समर्थन नहीं मिला पर नई सदी के मनोविश्लेषणकर्ता कच्चिओप्पो, जोसफ ई लिटु और रॉबर्ट ई. जेजाक -कोशिकाविज्ञानी ( न्यूरोलिजकल ) ने विलियम जेम्स के लेख ‘व्हाट इज एन इमोशन’ के द्वारा इस तर्क पर बल दिया गया कि ज्यादातर भावनत्मक विचार का कारण शरीर कि बदलती अवस्थाये होती है। लगभग इसी समय डैनिश मनोवैज्ञानिक कार्ल लेग ने मिलता जुलता सिद्धांत पेश किया इसलिए मनोविज्ञान कि दुनिया में ‘जेम्स- लेग’ के सिद्धांत के नाम से प्रसिद्ध है। इस सिद्धांत और इसके तथ्यों के अनुसार परिस्थितियों के बदलने से काया उत्पीड़ित भावना शारीरिक स्वभाव के कारण सद्द: समय की सीमित अवधि का परिणाम है। ध्यान से गौर करे तो बात हमारे समझ में आ सकती है, क्यों कि हमारे आपसी व्यवहार निर्माण में कुछ इस तरह की स्थितियों से हमारा स्वयं का भी सामना होता है। तथ्यपूर्ण हकीकत समझाती है, जीवन की कार्य प्रणाली को सिद्धान्तों से समझना मुश्किल काम है, क्योंकि जीवन स्वयं एक सिद्धांत यात्रा तय करता है।

भावना की जब हम बात छेड़ चुके है तो यह हमें स्वीकृत हो जाना चाहिए कि हम भी अपने दैनिक जीवन का ज्यादा से ज्यादा समय भावना द्वारा उत्पादित कर्मों को ही देते है। कहते है प्रेम के पंख नहीं होते पर यह उड़ता ही रहता है
यह धरातल से उड़ता हुआ अनन्त की ऊंचाई पर जाने वाला उपग्रह बनना चाहता है। इस तरह कि स्थिति मानव जीवन क्या देवताओं तक को नसीब नहीं हो सकती, इसके अनेक कारणों में एक कारण है, जीवन में कुछ नकारत्मक तत्वों का सहज प्रवेश कर जाना, उनमें एक तत्व “स्वार्थ” जो आत्मिक आनन्द की उच्चता सहन नहीं कर सकता। हम अपने जीवन का अगर धीमी गति से अवलोकन करे तो यह सहज समझ में आनेवाला कारण हमारे प्रेममय जीवन का असाध्य रोग के
स्वरुप में नजर भी आ जाता है, जो आत्मा को स्वस्थ सांस नहीं लेने देता। इंसानी लाचारिया इतनी कमजोर होती है, वो अपनी महत्वकांक्षाओं के कारण काया का साथ जल्दी छोड़ नहीं पाती। गौर करे, हम अपने जीवन पर तो तथ्य झुठलाना सहज नहीं होगा कि “त्याग” रुपी इसकी औषधी का हमनें बहुत कम बार प्रयोग किया है, पर जिसने भी अपनी जीवन शैली में इसका प्रयोग किया उसने निश्चित ही अपनी आत्मा को जीवानन्द का अमृत रस पिलाने का आभास हुआ है। ‘प्यार’और ‘आनन्द’ दोनों ही आत्मिक और शारीरिक ऊर्जाओं के सार्थक उच्चतम परिणाम है, और सार्थक जीवन का सही अनुभव है, जिसने भी जितने क्षण इस स्थिति का अनुभव किया है, निसन्देह उसे अपना जीवन अमृत तुल्य, मूल्यवान और कीमती होने का अहसास जरुर हुआ है।

एक क्षण का चिंतन अगर सहजता से किया जाय तो हम नहीं नकार सकते कि प्रेम बिना जीवन अस्तित्व विहीन होता है और आनन्द से दूर हो जाता है। अगर जीवन की आंतरिकता के बारे में हम बात करे तो ये स्वीकार करनें में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए कि हमारे अस्तित्व की बुनियाद में भी कुछ दुर्लभ प्यार भरे क्षण ही थे, जिनसे हम कभी कभी महत्वपूर्ण हुए है। हम प्रायः कहते है, हमें भगवान (God) या सर्वेशर ने बनाया जो स्वयं भक्ति प्रेम का भूखा होता है, यानी प्रेम ही भगवान है । धर्म, जाति, और रीती -रिवाज आदि जन्म के बाद के तथ्य है, ये जीवन को जन्म लेने के बाद ही अपने अंकुश में रख सकते है। उस से पहले प्रेम ही एक मात्र सक्षम क्रिया है, जो जीव निर्माण में अपना अस्तित्व जन्म से लेकर मृत्यु तक कायम रख सकती है, इसी प्रेम का सहायक तत्व “स्नेह” है, जिससे भावुकता का काफी अंश समाया रहता है, पर इसकी विशेषता भी विचित्र है यह कमजोर होते हुए भी नकारत्मक चिंतन नहीं रखता परन्तु भावुकता का अंश जब ज्यादा ग्रहण कर लेता है, तो अंचाहें दुःख भरे परिणाम जीवन को आपसी रिश्तों के अंतर्गत दे ही देता है।

प्रश्न कभी भी हमारे जेहन में आ सकता है या आता होगा जब जीव निर्माण प्रेममय तत्वों से होता है, तो नकारत्मक विचारो और गलत आदतों से क्यों प्रभावित होकर मानव स्वयं को दुःख की गंदी और तकलीफ भरी पगडंडियों की यात्रा कराता है ? उचित प्रश्न का उचित उत्तर तलाशने के लिए हमें भी कुछ तत्वों के आंतरिक स्वभाव का सही और सार्थक अध्ययन करना उचित समझना होगा। हम इस विषय पर शीघ्र ही फिर आयेंगे, तब तक नीचे लिखे वाक्यों पर जरुर चिंतन कीजियेगा जिनमे जिंदगी के कुछ सूक्ष्म प्रश्नो का उत्तर हम तलाश कर सकते है।
” Love is an Emotion experienced by the many and enjoyed by few” या फिर “एक मुस्कराहट हजारों रोमांचित करने आनेवाले क्षणों की आहट” दोनों वाक्य में जिंदगी की आस्था तलाशिये, आपको “जीवेश जीवानन्द ” की सार्थकता शायद समझ में आ जाये और आप इस विषय की चर्चा में लगातार अपना सहयोग देते रहे। क्रमश…..लेखक ✍कमल भंसाली