नंगापन

वो “तुम्ही” तो थी
कोई “अनामिका”
“अनजान”
मिली थी,रास्ते के उस पार
खड़ी थी, किसी नुक्कड़ की
एक तंग गली में
मै, गुजर कर
जा रहा था, दूसरी ओर
छोटी तंग गली
कितना अजीब सा, शोर
मुझे तो जाना
मन्दिर की ओर
उसी के पास
तुम खड़ी
तक रही चारों ओर
मै, आगे बढ़ता
मन्दिर में जाता
उससे पहले
तुम ने अपनी ही
भाषा में कुछ बुदबुदाया
समझ में मेरे
सच कहता, कुछ नहींआया
फिर निकला,तुम्हारे नयनों
से अद्ध्बुजा सा,कोई इशारा
समझ में खेल
धीरे धीरे
आ रहा था, सारा
अनजान बन कर
यहां से निकल जाना
तुम्हारी तरफ न देखना
में ही फायदा
नजर आया

मैं रुकता नहीं
पर अचानक
तुम, सामने आ गई
तुम्हारी आँखों में
गहन उदासी
अक्षम थी छुपाने में
सस्ते पाउडर की
सस्ती खुशबू
आ रही थी
हल्की खांसी

छोटी सी
मेरी बेटी की उम्र सी
पतली काया
मै भरमाया
सोच रहा था
क्या है, यह किस्सा ?
तुमने कहा “चलोगे”
मैं कुछ बोला नहीं
तुमने मेरी नाजबाबी को
स्वीकृति का रूप समझा
बोली ‘ आज कोई मिला नही’
कुछ कम दे देना
मन की कमजोरी पर
तुम करती दूसरा वार
उससे पहले मैने
किया अपना बचाव
बेटी, बाप जैसा हूँ
बता क्या बात ?

तुम, मुस्कराई
बोली क्यों ढोंग करते
सब पहले यही कहते
मैरे अपने विश्वास को
सरे आम तुमने,
नंगा कर दिया
तुम कहां रुकी
बोली, बाबू
अभी रात है
जो तुम कह रहे हों
यह कहकर ही
उसने मुझे इस
धंधे में लगाया
तुमसे ज्यादा उम्र
वाले “दिन” में
मुझे बेटी ही कहते
रात को जिस्म के
सौदागर बन जाते
रिश्तो की पवित्रता का
मजाक उड़ाते
पर पता नही क्यों
तुम में कुछ
फर्क नजर आता
चेहरा तुम्हारा
तुम्हे सच्चा बताता
पर “बाप”का
दावा नही कर सकते
“बाप” शब्द
मेरे लिये जहर है
वो जहर ही पीकर
में मर कर जी रही
अब वही उगल रही
सत्य को नंगा
नहीं देख सकते
हर किसी को
बेटी कह सकते
समय आने पर
खुद नंगे हो जाते
मैं क्या कहता
बिना उधर देखे
मुड़ गया
जल्दी से निकल गया
एक क्षण लगा
भीतर से नंगा हो गया….

कमल भंसाली