परिवार……बिखरता दर्द……भाग 3………..कमल भंसाली

image

आज जो संसार का स्वरुप है, उसकी उन्नति में परिवार की भूमिका को नकारना सहज नहीं है। यह विडम्बना आज के स्वरुप की होगी कि आनेवाले समय में सबकुछ होते हुए भी परिवार में, अटूट स्नेह और प्रेम नहीं होगा, अगर हालात इसी गलत दिशा की तरफ मुड़ रहे है, तो निसन्देह मानवता को अपने अस्तित्व के प्रति गंभीर चिंतन की जरुरत है । समय के तीन भाग होते है, यह हम सभी जानते है, वर्तमान, भूतकाल और भविष्य और शायद इनका निर्माण भी बड़ी शालीनता से इंसान को अपनी गलतियों को सुधारने और उसके अनुरुप जीवन को बेहतर और शांत बनाने के लिए किया गया है। समय के मामले में हर इंसान को अपनी भूमिका स्वयं समझनी होती है, अनिश्चित भविष्य उसे बुद्धिमान बनाना चाहता है, बिता हुआ समय उसे समझदार बनाना चाहता है। पर हकीकत कुछ और ही आभाष देती है, समय के प्रति लापरवाही इंसानी फितरत नजर आती है। परिवार शब्द की अगर कोई विशेषताओं पर आत्मिक ज्ञान से अनुसंधान करें तो उसे अपने जीवन की सफलताओं में परिवार की समयानुसार भूमिका में उसके समय की बचत का अनुभव किया जा सकता है। दैनिक जीवन की कई आवश्यकताओं की पूर्ति जब परिवार करता है, तो सोचिये आपकी सफलताओं और आपकी प्रसिद्धि में परिवार कितना उपयोगी है ? आज उसी परिवार की अनदेखी अपनी स्वार्थपूर्ण महत्वकांक्षाओं के कारण जब कोई करता है, तो तय है, उसका सफलता का सफर थोड़े दिनों बाद गुमनामी और स्त्रांश का शिकार होनेवाला है।

आखिर, आज परिवार जो सदियों से अपनी भूमिका सही ढंग से निभा रहा था, उसे किसने बीमार किया और कौन कौन से विषैले कीटाणुओं से त्रस्त वो हुआ ? इसी सन्दर्भ में हम अपना चिंतन गतिमय करे तो यथार्थ यही कहेगा, आपसी अपनत्व और प्रेम जो परिवार की रीढ़ की हड्डी का काम करते थे, वो स्वार्थ और अंहकार के कीटाणुओं से ग्रसित हो गए, और परिवार लकवे की गंभीर बीमारी का शिकार हो निष्क्रिय जीवन निभा रहा है। आइये, एक नजर से, आज के सन्दर्भ में परिवार को बीमार करने वाली हमारी सोच पर कुछ शुद्ध आत्मिक चिंतन कर, अपने आप को शिक्षित बनाने की चेष्टा करे।

अंहकार और अभिमान…..

किसी भी परिवार की शालीनता इन दोनों की मात्रा और आकृति पर निर्भर करती है। ये दोनों तत्व अपना अस्तित्व बोध हर कर्म में कराना चाहते है, मात्रा की अधिकता बिना इनका ज्यादा असर परिवार की शालीनता पर नगण्य ही होता है। पर किसी कारण किसी भी सदस्य में जब इसका अनुपात बढ़ जाता है, तो शालीनता में कमी आ जाना स्वभाविक ही होता है। आजतक परिवारों में इसका इलाज नम्रता के उपदेश से किया जाता था। घर का धार्मिक वातावरण में नम्रता की कभी कमी नहीं होती थी। आधुनिक युग ने घर से धर्म को उठाकर सार्वजनिक जगह पर एक कार्निवल का रुप दे दिया। आज धर्म की चर्चा और उपासना दैनिक जीवन में परिवार के भीतर कम नजर आने लगी, उसकी जगह आपसी तनाव का वातावरण नजर आने लगा। शिक्षा में नैतिक अंश की कमी का होना भी परिवार के लिए भारी पड़ रहा है। घर का स्वामी अनुशासनहीनता को संयमित करने में अक्षम हो रहा है, उसकी विचार धाराओं को सब समय नकारा जाता है। उसकी मजबूरी यही होती है, कि वो परिवार को सिर्फ आर्थिक सम्पन्नता से ही नहीं संस्कारों और आपसी प्रेम से सक्षम करना चाहता है। यह सही है, की उसका चिंतन आज की जीवन शैली के कुछ विपरीत हों पर असली जीवन का मूल्यांकन सदस्यों को भी नहीं भूलना चाहिए।

अंहकार, कभी भी इंसानी भावनाओं पर आक्रमण कर सकता है, उसकी फितरत भी यहीं है, किसी एक सफलता पर यह इंसानी मस्तिष्क में प्रवेश करने की चेष्टा करता है, और परिवार में विद्रोह की भूमिका बनाना शुरु कर देता है। नम्रता की भावना अगर परिपूर्ण है, तो निश्चित है, यह कुछ भी नुकसान नहीं कर पाता। इसलिए परिवार में नम्रता का वातावरण बना रहना चाहिए, जो काफी मुश्किल है। परिवार की बदलती स्थिति जहां सदस्य अलग अलग जगह रहते है, उन का सन्तुलन सही रहना, वर्तमान में परिवारों के सामने चुनौती ही है, इस से इंकार करना असंभव लग रहा है। कहते है, जिस परिवार में हंसी का वातावरण होता है, वहां अंहकार अदृश्य रहता है, तथा कम नुकसान दायक होता है।

अंहकार की लाचारी यही है, वो कभी अदृश्य नहीं रह सकता, अत: उसका प्रभाव परिवार के सदस्यों पर पड़ना लाजमी है। परिवार का हर रिश्ता परिवार की गरिमा होता है, उसे कभी जब इस पीड़ा से गुजरना पड़ता है, तो नकारत्मक ऊर्जा परिवार को बीमार करने में सफलता हासिल कर सकती है, और परिवार का मानसिक विघटन यहीं से शुरू हो जाता है। इस बीमारी का इलाज सहज और सरल है, अगर परिवार बिना तर्क के सभी सदस्यों के सुझाव को उचित स्थान दे और आपसी चिंतन में अगर प्रत्येक सदस्य बेखोप सम्मलित होता है, तो समझ लीजिये आप एक सही परिवार के सदस्य है।

अभिमान एक ऐसा तत्व है, जिसका महत्व दैनिक जीवन में नकारना गलत होगा, इसकी सिर्फ अधिकता से खतरा है। “हमें अपने देश पर अभिमान है”, “हमेंअपने परिवार पर अभिमान है” या, “हमें हमारे परिवार के अमुक सदस्य की सफलता पर अभिमान है” । कितने अच्छे लगते है, ह्रदय की गहराई से निकलते है, लाजमी है, प्रभाव भी चमत्कारी होते है। यहां संगठन की मजबूती तो सामने आती है, परन्तु अपनी सक्षमता का अहसास भी दूनिया की नजर से देखा जा सकता है, चाहे वो देश हो, समाज हो या फिर हमारा अपना परिवार। यह भी एक साक्ष्य है, बिना किसी एक विशिष्ठता के अभिमान करना हास्यपूर्ण ही होगा। गौर कीजिये, ” सन्तानो से परिवार बनता, परिवार से समाज और कई रूपांतरों के समावेश से देश बनता तो फिर परिवार अपने योगदान पर गर्व कैसे नहीं करेगा”। एक सही मजबूत परिवार ही देश को सच्चा सैनिक दे सकता है, जिससे हम सुरक्षित रहते है। जरा गौर कीजिये, परिवार के लिए अपने योगदान पर। हमारा सही दृष्टिकोण जीवन में यही हो, हम अंहकार को परिवार के वातावरण से दूर रखकर एक सक्षम परिवार के सदस्य होने का गौरव प्राप्त करने की चेष्टा करेंगे, जिससे हम अपने परिवार, समाज और देश पर सही अभिमान कर सके।…..क्रमश

लालच और अंहकार… एक चिन्तन

मेरा मानना है, लालच और अंहकार दोनों ही जरूरी और अति खतरनाक आत्मीय गुण और अवगुण के रूप में देखे जा सकते है |यहाँ उचित होगा, यह याद रखना की अवगुण तो वैसे सभी खतरनाक होते है और स्वाभाविक है, प्राय: सभी मानव में इनका अंश मिलता है |सच ही कहा गया मानव के पास गुण और अवगुण दोनों की खान होती है, सिर्फ उसे ही यह तय करने का दायित्व भी दिया गया, कि किसका उपयोग कैसे, किस तरह से करना है !

आज हम यही चर्चा करते है कि हम अपने दैनिक जीवन में उनका सकारत्मक उपयोग कैसे करे और उनकी अति से अपना बचाव कैसे कर सकते है !

सबसे पहले हम ” लालच को ही तोलते है, अगर यहां मै यह कहूँ, “लालच” लाल मिर्च के पावडर की तरह होता है, जिसकी जरूरत हर इन्सान को होती है, अपने खाने को स्वादिष्ट और हल्का तीखा बनाने के लिये | ठीक इसी तरह जिन्दगी को बेहतर और प्रभावशाली बनाने के लिए लालच का उपयोग करना जरूरी होता है, हालांकि उसकी मात्रा का अनुपात जितना कम होगा, जीवन उतना ही प्रभावशाली हो सकता है | वैसे भी अति हर तरह की खराब ही होती है | बिना लालच के जीवन को मकसद देना आसान कहां होता है ! शुरु आती दौर में किसी भी नई अच्छी आदत को सिखाने या सीखने से पहले यह चिन्तन किया जाता है, इससे मुझे”क्या” ?,मिलेगा | गौर करने से यह तय हो जाता है, कि ” क्या” यह ही वो लालच है , जिसकी हम यहाँ चर्चा कर रहे है | स्पष्ट है, लालच कोई काम शुरू करने से पहले सामने आकर खड़ा हो जाता है और अपने अनुपात के हिस्से की जानकारी उस काम को दे देता है, जिसे इन्सान की मनोदशा और ज्ञान तय कर देते है की, इससे क्या फायदा मिल सकता है ?

गांधीजी ने प्रसंगवश कहीं कहा “प्रकृति ने हर आदमी की इच्छाओं के अनुरूप सब दिया, परन्तु उसके लालच के लिए नहीं”| आज उनकी बात हम सभी करते, पर सही मायनों में उनका जीवन दर्शन हमसे सदा अछुता ही रहा | प्रकृति का हम पर बहुत विश्वास रहा, उसने देने में कभी कोई कंजूसी नहीं की परन्तु हमारी ही अति लालची प्रवृति ने उसे नाराज कर दिया | गौर कीजिये, विशाल जंगलों को काटकर क्या हम सुख का अनुभव कर रहे है ?

“The world says: ” You have needs- satisfy them, you have as much right as the rich and mighty. Don’t hesitate to satisfy your needs, indeed expand your needs and demand more.”
This is the worldly doctrine of today. And they that this is freedom. The result for the rich is isolation and sucide, for the poor, envy and murder.” Fyodor Dostoyevesky – The Brother Karmazow

अगर हम लेखक की भाषा और उसके लिखने पर जरा ध्यान दे, तो शायद यह जल्द ही समझ में आ जाना चाहिए कि अति लालच की स्वतन्त्रता कितनी घातक हो जाती है, आदमी अकेला और तन्हा हो जाता और जिन्दगी के प्रति उसका नजरिया भी गलत रूप ले लेता | भारतीय परिवेश में लालच को रोकने के लिए हजारों तरह के आध्यत्मिक प्रतिबन्ध लगाने की चेष्टा धर्म गुरु अपने ज्ञान और प्रभाव से लगाने की सतत चेष्टा करते रहते है |

अति लालच कभी कभी पूर्ण विनाश का कारण बन जाता है और उसका प्रभाव भी भूकम्प की तरह आसपास में
रहने वालों पर भी देखा जा सकता है |

सार संक्षेप में यही दोहराया जा सकता है, की लालच बिना जीवन की यात्रा को गति नहीं मिलती पर संयम का ब्रेक हर समय दिमाग में रखना जरूरी है | लालसा और लालच में ज्यादा अंतर नहीं है,अत: लालसा का कभी लालच में परिवर्तन न हो, इसका भी ध्यान रखना होगा|

इसी के समकक्ष ही रहता है इंसान में “अंहकार”, वो मिर्च के बीज की तरह खतरनाक होता है, ज्यादातर समझदार
और अच्छे इंसान इनको बाहर ही फेंक देते है | हम अभिमान और अंहकार को समान धरातल पर रख सकते है | किसी भी सफलता को दो तरह से लिया जा सकता है, एक अंहकार के रुप में दूसरे अभिमान के रुप में,परन्तु दोनों ही मानसिक विकार के तत्व है | अंहकार किसी भी सफलता का कमजोर मूल्याकंन करता है |

किसी भी महान आदमी या ज्ञानी ने नहीं कहा आप सफलता मत प्राप्त कीजिये, हां उन्होंने ये जरुर कहा लालची मत बनिये तथा अपनी सफलता को दर्प के गढ़े में मत डालियें | अगर हम ऐसा करते है, तो निश्चिन्त हो जाइये हमारी सारी
आनेवाली सफलतायें सहम कर अपना रास्ता बदल कर हमसे दूर हो जायेगी | हमारे अपने भी हमसे दूर हो जायेंगे फिर किस मकसद के लिए हम जियेंगे ?, इसलिए अंहकार के राक्षस को सोते ही रहना चाहिए | आज अर्थ का युग है, विज्ञान भी हमारा सहयोगी है फिर हम कैसे स्वयं अपने दुश्मन हो सकते है ! किसी भी महान आदमी की जीवनी लीजिये उनकी सफलताओं का उत्सव, उन्होंने कभी नही मनाया, दूनिया ने ही उनकी सफलताओं का गुणगान किया | तय हमें ही करना है, की हम लालच के कूएं में नहीं कूदेंगे, न ही दर्प की खाई में गिरेंगे, हम तो अपनी अर्जित सफलता को संयम और नम्रता के गुलदस्ते में संजोकर ही रखेगे | धर्म और मानव कल्याण दो ऐसे अमृत भरे प्याले हमारे पास है, अगर हम उनका पान करते रहे तो शायद हम लालच और अंहकार का जहर हमें कभी नहीं पीना पड़े |

ध्यान से गौर कीजिये, “एक मन्दिर में मोमबती और अगरबती साथ साथ जलते थे | मोमबती हर समय अगरबती को नीचा दिखाने की कौशिश करती | अगरबती कुछ नहीं बोलती, सिर्फ मुस्कराती | एक दिन पंडितजी दोनों को जगाकर पूजा करने के बाद खिड़की पर दोनों को छोड़ कर कहीं चले गये | अचानक हवा का झोंका आया और मोमबती बुझ गई, अगरबती जलती रही | अगरबती ने कहा बहन क्या हुआ “एक झोंके में ही समाप्त हो गई” ,मुझे देखो ये हवा के झोंके मुझे और तेजी से प्रज्वलित कर खुशबू को चारों तरफ फैला रहे है “|

सार यही है किसी भी अपनी सफलता से दूसरों की सफलताओं को नीचे नहीं रखना चाहिए | अपनाने के लिए हजारों खूबिया भी कम है, छोड़ने के लिए एक कमी ही काफी है | जिन्दगी समझाने से ज्यादा समझने के लिए होती है | शून्य को लीजिये हम एक सफलता प्राप्त कर उसके आगे इसको लगाये तो हमारी सफलतायें दस गुनी बढ़ती जायेगी | फिर लालच और अंहकार को हम क्यों जगह हमारे जीवन में दे |
चलते चलते, हमारे लिए क्यों जरूरी है ?, की हम संयमपूर्ण जीवन जीये, ध्यान से पढ़ने और चिन्तन की बात “एडवर्ड अबे” के शब्दों में……

” Growth for the sake of growth is ideology of cancer cell”

【कमल भंसाली 】

कमल भंसाली