💔नाजायज जुदाई 💔 कमल भंसाली

तुम्हारी चुप्पी और मेरी खामोशी कुछ समझाती
दरम्यां जो भी हो, जुदाई के चंद फूल तो उगाती

ये जुदाई, तन्हां, भीगी ओस की बूंद की तरह है
दर्द के सैलाब में बहते किसी “कमल” की तरह है

वजह क्या है, दुनियादारी के कुछ हिस्से है
जिनमें कुछ तुम्हारे तो कुछ मेरे ही किस्से है

पैबंद लगी कई सोच, हमदोनों को कितना इठलाती है
कठपुतली है, किसी गैर की अंगुली से नाच दिखाती है

हक के झूठे जंगल में, हम कितना कुछ खोज लेते है
सच तो ये है, पाने के बाद उसे लावारिस ही कर देते है

खामोशी हो या चुप्पी, है तो, ये दिल की कोई जलन है
बैठे है पास, पर जो तरस रहा है, वो शब्दों का मिलन है

आओ दावेदारी की महफ़िल से अब निकल चलते है
दो तेरा हाथ मेरे हाथ में, फिर खामोशी से गले मिलते है
✍️ कमल भंसाली

फ़लसफ़ा, जुदाई का

रात है, तन्हाई है, ऐ दोस्त, जुदाई भी है
तारों भरी रात में, ये कैसी हमारी विदाई है

चाँद भी आज थका सा नजर आ रहा
बिछड़ा तन, इंतजार से पनाह मांग रहा

तुम थे, बाहों में खुशबुओं का अहसास था
कल भी साथ रहोगी, ये सिर्फ विश्वास ही था

जुगनुओं की तरह चहकते, तुम्हारे नैन संदेश देते
तन्हां दिल को, मिलन की हसरतों से फिर बहका देते

कल तुम न होंगे पास, ये सोच, दिल है, उदास
दर्द बन गई, अधरों पर छिपी हुई अधूरी सी प्यास

जानम, जिंदगी का इतना ही फलसफा समझना
प्यार जो गहरे दिल से करे, उसे ही अपना समझना
✍️ कमल भंसाली

🦀करो, ना, करोना🦀 कमल भंसाली

विषय:  करो, ना, *करोना*

सहज नहीं रहा, साँसों का आना जाना
रंग ढंग बदल रोज, ये नाजायज “करोना”

करो, ना, से तो हमने सदा प्यार ही किया
इनके संगम से क्या करोना ईजाद हुआ ?

गहराई कहती, आंखे जो सदा खुली न रहती
वहीं से विपताओं की जड़े, हरी होकर ही उगती

देश हमारा, हमने ऐसा शायद ही दिल से माना
हद कोई पार करे, स्वभाव हमारा, तभी जागना

देश- चिंतन, जबानी लेखा- जोखा में ही रह जाता
समय के अनुसार, नेताओं की आंखों से बह जाता

खुद्दारी क्या होती ?  अब तो ये भी हम भूल रहे
गरीब इतने हो गये, अपनी ही रोटी मांग कर खा रहे

अंत मे सच ही कह देते, करोना हमें नहीं मार रहा
देश भक्षी नेताओं का कहर, करोना को भी शर्मा रहा

सवाल बिना उत्तर का रहा, इतने साल क्या किया ?
देश स्वतंत्र हुआ, तब का गरीब,अब गरीब कैसे रहा ?
✍️ कमल भंसाली