क्षमा याचना पत्र समत्सवरी जैन पर्व पर उन सभी को जो हमारे जीवन से किसी ने किसी रुप में किसी अवधि तक जुड़े है। ✍कमल 💝 शायर भंसाली

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💔नीयत💔मेरी ✍कमल भंसाली

“यकीन कीजिये
‘नीयत’ नहीं बदली मेरी
वक्त का मिजाज बदल गया
सच यह भी समझीये
जिसको भी अपना समझा
वो खाली सपने दिखाकर चला गया
मुझे दुनिया के बाजार में
बिन उसूलों के बेहतर तरीके सीखा गया

प्यार को अब बुखार ही समझता
सच कहूं तो सहूलियत का औजार समझता
काम कितना ही हो टेढ़ा
उसका सीधा सा है रास्ता
वफ़ा का दामन नहीं
दे सिर्फ वादों का वास्ता
धोका ही अब बचा
यही रह गई अब जग की दास्तां
करामात अपनों की
बिन दर्पण के मेरा चेहरा
स्वयं मुझे ही दिख गया

दया की मेरे में कितनी भावना !
बताऊंगा जब होगा कभी सामना
पर जान लीजिये इसके आधुनिक गुण
दया कुछ कीजिये पर ज्यादा लीजिये
बिन लाभ किसी को कुछ मत दीजिये
अपने बिगड़े कामों को कुछ सुधारने का
यह अंतिम प्रयास जरुर कीजिये
सही जाना यह ज्ञान उन्ही से पाया
कुछ भ्रम के बदले ये दृष्टान्त समझ में आया
शुक्रिया उनका
जिन्हें मैं आज भी गैर न कह पाया

अब यकीन कीजिये
मैं आज जैसा भी हूँ
सब छद्म जग की मेहरवानी
इस जग से ही चलता अपना दानापानी
इस तरह ही चलती जिंदगानी
पर मन कभी जब पी लेता पवित्र पानी
तो बोल देता
“सब ऊपर वाले की मेहरवानी”
अपनों का सच्चा प्यार बीते युग की कहानी”
रचियता: कमल भंसाली

♨खुदगर्ज नहीं ♨खुद्दार बनिये भाग 1 ✍कमल भंसाली

आधुनिक युग जिसमें हम अपनी जिंदगी का सफर कर रहे वो समय समय पर हमें इस अहसास की अनुभूति कहीं न कहीं करा ही देता है कि क्या हमारा इस युग का जीवन सफर हमें आनन्दमय और सुखी होने से कहीं वंचित तो नहीं कर रहा है ? सवाल ऊपर से जितना सरल दीखता उतना ही अंदर से सही उत्तर खोजने में सरल नहीं लगता। फिर भी हमारी कोशिश है, हम आज कम से कम इस सन्दर्भ में स्वयं को अवलोकन करने की चेष्टा करे। माना जा सकता है संसार वक्त के अनुसार बदलता है । बदलाव से कोई भी अछूता नहीं रहता चाहे हो प्रकृति ही क्यों न हो ? यह तय है, आधुनिक साधनों की भरमार के बावजूद हम आज भी अंदर से खुश नहीं है, क्षीण सी प्रसन्ता भी हमारे चेहरे से दूर हो रही है। तनाव पूर्ण होकर मानते है कि आज के जीवन में मधुरता और मीठापन का अभाव हो रहा हैें। बात अगर सुख की करे तो लगता है हमारा सुख जाने अंजाने कई मानसिक बीमारीयों से आहत है, जिनका निकट समय में कोई संशोधन भी नजर नहीं आ रहा। उन्हीं में से एक विलासिता के साधनों की मुख्य उपज है, वो है “खुदगर्जी”, यानी “Selfishness” की। ये रोग आपसी रिश्तों के अलावा भी जीवन के हर क्षेत्र को तहस नहस कर रहा है। आज के व्यस्त वातावरण में दूसरों के भलार्थ सोचने का समय ही कहां है, यह कहकर लोग अपने आप को सांतवित करना सही समझते है। नीति शास्त्र के अनुसार दूसरों की भलाई से ही खुद का भला होने वाले तत्व जीवन से दूर हो रहे है। नजदीक के रिश्ते जो कभी जीवन सहायक होते वो आज अर्थ तन्त्र के प्रभाव से संकुचित होकर नगण्य होनें का सफर शुरु कर चुके है, नतीजा इंसान सबके रहते, सबकुछ पास रहते अकेला हो रहा है।

अंग्रेजी शिक्षा- संसार का भारतीय परिवेश में प्रवेश करने के बाद हमारी सोच संस्कारिता से धीरे धीरे विमुख होने लगी, इस सत्य को नकारना कहीं भी सही नहीं है। पर वक्त के साथ चलना भी जीवन की शायद अलिखित मजबूरी है, अतः इस लेख को जीवन प्रेरणा के तहत समझा जाय, तो शायद हम कुछ खुशियों की प्राप्ति में सफल हो जाये। सर्वप्रथम हमें एक स्वयं से प्रश्न करना सही होगा क्या हम आधुनिक साधनों की प्राप्ति से शारीरिक सुख के अलावा किसी आत्मिक सुख से आनन्दित हो रहे है ? संभावना तो नहीं उत्तर की है, बाकी जो अति साधनों के प्रयोगों से सुखी समझते है, निश्चिन्त ही वो बधाई के पात्र है।

हकीकत यही कहती है, जो जीवन आधुनिक युग का सफर कर रहा है, वो अंदर से बिखरा है। ज्यादा बाहरी सहायक साधनों का ज्यादा प्रयोग करने वाले अपनी क्षमताओं पर उतना विश्वास नहीं रख पाते, जितना उन्हें मानसिक रुप से रखना जरुरी होता है। आज अगर हम ईमानदारी से अपनी जीवन शैली पर अनुसन्धान करे तो एक बात समझ में जरूर आ जायेगी कि हम हर दिन खुदगर्ज होकर ही बिताते है, वो भी खुदगर्जी के बढ़ते अंशों के साथ। विश्व को ही लीजिये हर देश अपनी खुदगर्जी के अनुसार दूसरे देश के साथ अपने सम्बंधों को महत्व देते नजर आता है। इसी अनुसार संसार में नई नई गुटबाजी तैयार हो रही है। हर देश मानव कल्याणकारी आंकड़े की बात नहीं करता बल्कि अपने देश के शक्ति सम्पन्नता के आंकड़ों को प्रमुखता देता है।

बात जब हम देश, समाज, परिवार और जीवन धर्म की करते है, तो हमारी प्रवृत्ति काफी हद तक आलोचनामय हो जाती है। हम कमजोरियों को सामने रखकर असफलता के कारण ढूंढते है और दोषापरण से आपसी सम्बंधों में तनाव होने वाली सारी साम्रगी परोस देते है। अगर इसी तथ्य का समाधान की दृष्टि से चिंतन करे तो हमें जांचना होगा हमारी सारी मजबूतियों में किस बात का योगदान नहीं रहा जिससे समुचित सफलता नहीं मिली। इस तरह के चिंतन युक्त दृष्टिकोण से आपसी रंजिश को बढ़ावा नहीं मिलता और प्रयासों को मजबूती भी मिलती है।

हम यहां दो शब्द “खुदगर्ज” और “खुदार” पर विशेष चर्चा करेंगे क्योंकि हमारे दैनिक जीवन में दोनों स्थितियों का हर दिन प्रयोग होता है। देखने में दोनों शब्दों में अंह का अस्तित्व नजर आता है, पर ऐसा है नहीं क्योंकि एक कमजोरी का दुसरा मजबूती का प्राणदाता है। विवेचना को आगे प्रस्तर करे उससे पहले इन शब्दों से परिचय करना जरूरी है।

खुदगर्ज एक हिंदी शब्द है, जिसका तार इंसान के स्वार्थी स्वभाव से बंधा है। शब्द को दो भागों में विभक्त करने से खुद का अर्थ स्वयं और गर्ज का मतलबी या स्वार्थी निकलता है। अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करने वाले ज्यादातर “selfish” का प्रयोग करते है। ऐसे स्वभाव और प्रवृत्ती वाले लोग खुद भी कमजोर होते है और परिवार, समाज और देश को चिंताग्रस्त और कमजोर बनाने में भी उनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। उनका भय उनकी इस क्षमता को हर रोज बढ़ाता रहता है। कायरता खुदगर्जी की आंतरिक थैली होती जो सिर्फ द्वेष का जहर इकट्ठा करती है। सवाल किया जाना उचित है क्या खुदगर्ज होना पूर्ण गलत है, उत्तर में इतना ही सहजता से कहा जा सकता है, अति किसी भी तरह की हो और कैसी भी हो दुष्परिणामों का कारण होती है। इस सन्दर्भ में हम हम एडवर्ड अल्बर्ट के इस कथन पर भी गौर करना पड़ेगा ” Sometimes you have to be selfish to be selfless” ।

कभी हमारा देश अपनी सेवाभावी संस्कृति और आपसी स्नेह के लिए आत्मिक आनन्द स्थल था। संसार के विशिष्ठ व्यक्तित्व वाले महापुरुषों ने इस को स्वीकारा और भारत को आध्यात्मिक गुरु कहलाने का सोभाग्य भी प्राप्त हुआ। स्वामी विवेकानन्द जैसे कई दार्शनिक गुरुओं का जन्म स्थल हमारा देश है। इतिहास, साहित्य, धर्म की पुस्तको को टटोलने से इससे आप इंकार भी नहीं कर सकते कि हमारी सांस्कारिक विरासत साधनों के अभाव में जितनी भव्यवता की ऊंचाइयों को छुआ आज अर्थ व आधुनिक साधनों के बढ़ते प्रभाव से संदेहात्मकता की तरफ अग्रसर हो रही है।
बड़ी विडम्बना है जो मार्गदर्शक होनें का दावा करते वो खुदगर्जी की बदतर मिसाल बन रहे है। सेवा तो बिक रही है जो कभी सुखों की गिनती में शामिल होती आज वो अपना अस्तित्व नहीं संभाल पा रही, अर्थ उसे हर रोज बदनाम कर रहा है।

चर्चा जब हम यहां खुदगर्जी पर कर रहे तो यह कहना सही होगा कि भले ही खुदगर्ज हो इंसान अपनी जरूरतों की पूर्ति करे पर उसे समझना होगा यही स्वभाव की वो क्रिया है, जिससे वो अपने निम्नतम व्यक्तित्व का प्रदर्शन करता है। अतः जिंदगी की इससे एक उचित दुरी आवश्यक है, सिर्फ इसे समझने की बात ही नहीं अपने आंतरिक चिंतन में उचित जगह देनी भी जरूरी है। “खुदगर्जी” का अगर मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से तत्व अनुसन्धान करे सहज ही समझ में आ सकता है की यह अंह यानी अंहकार का निम्नतम स्वरुप वाला अवगुण है, जिसका प्रयोग हम अपने स्वार्थ के लिये बिना प्रभाव की जानकारी उपयोग कर रहे है, स्वयं को सन्तुष्ट करने के लिए। सवाल उठता है, आखिर क्यों ? उत्तर समझने के लिए एक मनोवैज्ञानिक के विचारों पर अवलोकन करते है, ” “The desire to always be on top and appear with your best face forward takes a toll. To be the centre of attention becomes a necessity, and this forces us to overlook our own emotional threshold. We begin to move away from our comfort zones to become popular, “liked” and than fail to realise when we have moved too far away from our own nature. By then, we are trapped in this false identity we have created for ourselves. It leads to huge conflict between our external and internal identities.And that creates an imbalance in our brain which leaves us at our vulnerable best.” Bhawna Monga psychologist.

उपरोक्त विश्लेषण को समझने से इस बात पर भी गौर करना उचित लगता है कि आखिर किस तरह की चाहते या इच्छाओं के कारण इंसान खुदगर्ज कहलाता है। सरसरी तौर पर जो प्रमुख कारण हो सकते है, उन पर एक नजर डालते है।
1. अति सुख और उसके साधनों की
2. देखा देखी, प्रतिस्पर्धा
3. देखे हुए सपनों की पूर्ति
4. नासमझी
5. भोग विलास लिप्त जीवन
6. सामाजिक और राजनैतिक प्रभाव हासिल करने की चाहत
7. प्रसिद्धि,
8. जीवन और नैतिक सिद्धान्तों की अज्ञानता

कभी कभी विपरीत परिस्थितियों से जूझता आदमी मजबूरी से खुदगर्ज बन जाता है, ये कुछ समय की बात होनी चाहिए जब तक संघर्ष की अवधि रहे, इससे स्वभाव पर प्रभाव न आये, ये ध्यान रहे तो सही होगा।
चिंतन को विराम देने से पहले ये हमें लगातार समझना होगा जीवन वही कहलाता जो अपने शरीर सुख के लिए कम पर आत्मा-परमात्मा के लिए ज्यादा समर्पित रहता है।

*” यही पशु प्रवृति है कि आप आप ही चरे।
मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे। ” (मैथली शरण जी गुप्त की एक कविता का सार)
**”सुखिनः भंवतु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः,
सर्व भद्राणि पश्यंतु मा काश्चित दुःख भाग भवेत।।” ( सार: दूसरों के परोपकार में ही सुख का अनुभव हो सकता है।

लेखक: *कमल भंसाली*

💕जिंदगी का मन💕 ✍कमल भंसाली

एक किताब है “जिंदगी”
लबालब आस्थाओं से भरी
पर अपने ही मन से
रहती सहमी और डरी
कर्म पथ की जब भी करती अवलोकन
सामने आकर खड़ा हो जाता मन
मंजिल की चाहत में
सब कुछ दाव पर लगाती
पर मन की करतूतों से हार जाती
पर अपनी हार पर जिंदगी कभी अफ़सोस नहीं करती
मन ही थक हार जाता
वो तो सदा प्रयास ही करती
ऐ जिंदगी तुझे सलाम

कब रुकी वो कब झुकी कभी
वो याद नहीं करती
राह है कैसी भी हो
सदा उसी पर ही चलती
किस पर कैसे चलना
यह मन तय करता
इसलिए वो जीने मरने से भय करता
ऐ जिंदगी…

किसने प्यार किया !
किसने इंकार किया !
किसने दिल को दर्द दिया
किसने गहरा घाव दिया !
किसने दिल को प्रेम दिया!
फर्क कभी वो नहीं करती
सब कुछ सहन करती
विद्रोह तो मन ही करता
ऐ जिंदगी ….

आश निराश दोनों के जल को पीती
फर्क नहीं अपने आंसुओं का करती
ख़ुशी और गम दोनों से ही
अपनी पलके सींचती
सुख दुःख दोनों धूपछांव में जीती
सत्य के दायरे में रहकर
कभी कभी झूठ को भी गले लगाती
अस्वीकार की राजनीति तो मन करता
ऐ जिंदगी…

भली भांति
वो सब कुछ जानती
जीना है इस जहां के दस्तूरों में
रहना है अतृप्ति भरे अंधेरो में
मुस्कराहट अधरों पर रहे
प्राणों भरी देह सदा संस्कारित रहे
जिंदगी, अपने जीने के हर अंदाज पर गर्व करती
समय आने पर मृत्यु का भी स्वागत करती
मन ही हार कर
अपने अफ़सोस को समृद्धि समझता
अपने ही बनाये अतृप्त सरोवर में डूब जाता
फलसफा इतना ही समझ में आता
जिंदगी को तो सदा जीना ही आता
मन ही विचलित हो राह भूल जाता
ऐ जिंदगी…

रचियता✍ कमल भंसाली

क्षमता समर्थित जीवन🐴एक तथ्य🐄 नैतिकता भरा प्रेम✍कमल भंसाली

विडम्बना ही कहिये जब कुछ लोग कठिन समय में स्वयं की क्षमताओं से अनजान होकर अपने बिना चिंतन के व्यवहारों और कार्यों से परिस्थितियों को और कठिन कर लेते है। सारी दुनिया की बुराइयों के विशेषज्ञ बन, नुक्ताचीनी को अपना कर अपने समय को और कठिनता प्रदान करते रहते है। दुनिया में दो तरह के इंसान की आज बहुत कीमत आंकी जाती है, एक जो पैसे से धनवान होता है, दूसरा जिसके पास राजनैतिक और हिंसक शक्ति होती है। पर हकीकत में दोनों ही समय की मेहरवानी के मोहताज होते है। भविष्य को दृष्टिगत कर हम चिंतन करे तो एक बात साफ़ हो सकती है कि मानवीय मूल्यों से ज्यादा कीमत किसी की नहीं होती क्योंकि उनका वितरण होता है। प्रकृति को ही लीजिये, उसका महत्व हमारे जीवन में कितना है ? आंकिये, प्रकृति से कोई ज्यादा धनवान और सक्षम शायद ही इस धरा पर होगा, परन्तु उसने अपनी हर सम्पदा के वितरण पर कभी प्रतिबन्ध नहीं लगाया और कभी भी खाली नहीं हुई और शायद खाली होगी भी नहीं। पर मानव स्वभाव प्रकृति की तरह पूर्ण वितरण को स्वीकार नहीं कर सकता यह तो तय है, इसका कारण उसका स्वयं का चिंतन ही होता है और डर यही है कि कहीं ऐसा न हो उसका बिगड़ता चिंतन उसे इस धरा से अस्तित्व हिन् नहीं कर दे।

प्रकृति के बाद मानव ही सबसे सक्षम प्राणी है, परन्तु आंतरिक कमजोरी भय के रोग से ग्रस्त है, अतः हर क्षेत्र की सक्षमता का उपयोग वो एक जन्म में नहीं कर पाता। मानव की सबसे बड़ी कमजोरी है स्वार्थ भरी खुशियों की तलाश और उसकी सोच में इसको प्राप्त करने में वो शंकित और स्वार्थी हो जाता है, यह ही वो एक भूल उसे कभी सक्षम नहीं बनने देती। हकीकत में आज भी संसार को सक्षम, बुद्धिमान और नैतिक इंसानों की जरुरत है। हमारे देश में भी सही नेताओं की जरूरत सदा ही रहेगी, परन्तु अफ़सोस ही होता है आज जब आस पास नजर करते है, तो नैतिकता समर्पित सक्षमता से भरपूर कोई भी नजर नहीं आता। विडम्बना ही है, तकनीक युग में नैतिकता अपना प्रभाव नहीं जमा पा रही और उसका आकर्षण भी कम होता जा रहा है।

सवाल यही है क्या नैतिकता विरोधी कार्य कर सुख की प्राप्ति को सही माना जाय और क्या दौलत की चाह में जीवन की अनिश्चता को न समझा जाय और उसी अनुसार जीवन मूल्यांकित कर्मो को दैनिक जीवन में जगह देकर स्वयं की खुशियों के साथ दूसरों की खुशियों की कामना नहीं किया जाय ? हम यहां जिंदगी के कुछ महत्वपूर्ण मर्म स्थल की कमजोरी को जानने की कोशिश करते है, और अपने जीवन के छिपे हुए आत्मिक सुख शान्ति प्रदान जीवन को महसूस करने की कोशिश करते है। शायद अनजाने में ही इस कोशिश से हमें अपने जीवन मूल्यों की पहचान हो जाए। आज हम अपने देश की वर्तमान स्थिति पर अगर क्षण भर के लिए गौर करे तो एकबात अंदर से जरुर स्वीकार करेंगे कि पूर्ण देशभक्ति से हम बहुत दूर बैठे है। देश की व्यवस्थाओं पर हमारी नकारत्मक्ता हर समय हमारे सामने ही खड़ी रहती है। यह बात और है, अनजान बनकर जीना हमारी आदत बन चुकी है। कभी कभी नाटककार Euripides के इस इस कथन पर गौर भी करना पड़ता है कि ” Man’s most valuable trait is judicious sense of what not to believe.” । कुछ हिंसक तरह का माहौल अपराध् बनकर देश की स्वतन्त्रता को कमजोर बनाता है, तो एक प्रश्न स्वयं से ही पूछना पड़ता कि वाकई मैं अपने देश से सही प्यार करता हूं ! सवाल के जबाब में इतना ही उत्तर उभर रहा है, आजकल के माहौल को देखकर तय है, भारतीय संस्कारों में अहिंसा की खुशबू आज भी झलकती, हालांकि आपसी विश्वास डांवाडोल हो रहा है। हालांकि अस्थाई स्थितियों से देश के प्रति आस्था कभी कम नहीं हो सकती पर जन्म लेने वाली धरा पर मृत्यू तक कुछ कर्तव्य तो निभाने की सोच होनी जरुरी है। इस सत्य को कोई भी नकार नहीं सकता कि देश अगर सुरक्षित रहेगा तो हम और हमारी सन्तानें अपना तनावरहित जीवन जी सकेंगे। इस सूत्र के कथ्य पर अगर आप विश्वास नहीं कर पा रहे है, तो Jim Morrison ने व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर क्या कहा है, उस पर एक नजर डालना उचित ही लगता है।
” The most important kind of freedom is to be what you really are. There can’t be any large-scale revolution until there’s a personal revoulation, on an individual level.”

फ्रेंकलिन रुजलवेट के अनुसार खुशियों को कतई धन से नहीं ढूंढा जा सकता, अपितु मानव हित आत्मिक कार्यो की सफलता में और मानव उपयोगी रचनात्मक कार्य से सहजता से पाया जा सकता है। परन्तु ये बात आज के सन्दर्भ कोई अपना अस्तित्व बोध कराने में असफल ही होगी क्योंकि दुनिया में साधनों का अद्भुत साम्राज्य स्थापित हो कर अपना विस्तार कर रहा है। रिश्तों की डोर अब अपनत्व के हाथों से निकल कर स्वार्थ के हाथों में चली गई और सिर्फ जरुरत योग्य दिखावटी प्रेम का अहसास तक ही अपनत्व बोध कराना ही पसन्द करती है। बाहरी सतह पर दौलत का प्रेम न चाहते हुए भी अंदर में छिपी हमारी इच्छाएं उजगार कर देती है। हकीकत यही है शरीर जरूर साधुता की चाह रखता होगा पर मन की अस्वीकार्ता से मजबूर हो विलासिता और भोग के दलदल में अपने हर असहज अस्तित्व का समर्पण कर देता है। हर इंसान जानता है, कि जितना भी उसने हर क्षद्म से प्राप्त किया उस पर भविष्य में किसी दूसरे का शासन हो जाता है। जीवन की निर्थक्ता की बात उसे कम पचती क्योंकि ऐसी बातों को धर्म गुरुओं ने आत्मा से जकड़ दिया इसलिए दैनिक जीवन में इसका उपयोग साधनों की तरह मुश्किल से ही हो पाता है। हम अगर दौलत को हमारे जीवन में प्रभावकारी तत्व की तरह से इस्तेमाल करने की इच्छा रखते है तो सबसे पहले हमें कुछ इस तरह से धन अर्जित करने की कोशिश करनी चाहिए जिसमें नैतिकता की कुछ शक्ति हो। कितनी ही दौलत इकठ्ठी कीजिये अनैतिकता से पर तय है आप उससे कभी क्षमता का बोध नहीं कर पाएंगे क्योंकि हकीकत में वो रोग उत्पादक दवा है, जिससे हर दिन आप कुछ क्षय होनें का बोध करते रहेंगे, पर बोल नही सकेंगे क्योंकि आपकी चिंतनमय क्षमताये घट रही है। कबीरदासजी जैसे संत जब यह कहते कि
” साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूं, साधु ना भूखा जाय ।।
तो निश्चित है, कभी इंसानी चिंतन में स्वयं के साथ नैतिकता ज्यादा रहती थी आज जमाना बिल गेट्स से भी आगे का है, और हमारा चिंतन भी आज ‘कबीर’ नहीं ढूंढता। परन्तु हकीकत भी यही कहती है कि अति दौलत से बिल गेट भी घबरा गए और उन्होंने उसे सही जगह वापस भेजने को ही सही चिंतन माना। ” Success is a lousy teacher. It seducess smart people into they can’t lose”। आगे बढ़े उससे पहले यह तय करना जरुरी है क्या हम अपने देश के प्रति समर्पित है, क्या हम अपने जीवन के प्रति सही समर्पित है तो निश्चित है, जीवन की समझ हम में है। हम अपने जीवन को सही नैतिक जीवन का राही बना दे तो यकीन कीजिये जिंदगी हमारे लिए मुस्कराहटों का गुलशन लगा देगी शर्त यही है हम दूसरों के मुस्कराहटों की कीमत जाने, उनके प्रति किसी भी तरह की नकारत्मक्ता से दूर रहे। जीवन की सारी सार्थकता मुस्कानों में ही छिपी रहती है, चाहे किसी की भी क्यों न हो। अतः सदा मुसकरते रहिये…..लेखक :कमल भंसाली