💑अधूरी चाहते💑 शायरी युक्त कविता✍ कमल भंसाली

दोस्तों,
आज के युग में “प्रेम” की स्थिति बड़ी दयनीय सी महसूस हो रही है। अर्थ और आधुनिक साधनों के महत्व के विस्तार के साथ दिमागी तेजी ने प्रेम पोषक सरल तत्व को स्वीकार करना छोड़ दिया है। प्रेम की राह के हमसफर बनकर भी लोग अपनी निजी सुविधाओं का ज्यादा ख्याल रखते है। “त्याग” और “संयम” की जगह लोग इल्जाम और बदनामी का सहारा लेकर “प्यार” की पवित्रता को नष्ट कर रहे है। आप इसे उर्दू और हिंदी शब्दों के संगम से बनीे शायरी युक्त कविता कह सकते है। प्रयास यही है कि हम समझे कि”प्रेम” आज भी इंसान की नहीं खत्म होने वाली “चाहत” है। लेखक व रचियता : कमल भंसाली

मेहरबानी ही थी उनकी जो कभी प्यार किया
हमें बेवफाई का सौदाई कहा स्वीकार किया
हमने माना खुद को हमने ही बदनाम किया
इल्जाम उनका दिल से हम ने स्वीकार किया

पर उन्हें न कभी मायूसी का आलम दिया
जहर जुदाई का चुपचाप सहा और पिया
आरजू हमारी उनके कदमों की पायल रही
जब मन किया उनका पहन कर उतार दिया

बेवफा हमें वो कहे इस रस्म का निर्वाह करना होगा
दिल किसी का टूटे ये “प्यार” का कोई दस्तूर होगा
पर ख्यालात हमारी मौहब्बत का तो है कुछ और
महसूस कर लो “समझ मौहब्बत” की होती कुछ और

सुरमई रोशन हो जाती कभी कोई शाम
दिल की महफिल सजती उनके ही नाम
अब तो अँधेरों की ही तलाश सदा रहती
अधूरी प्रेम कहानी सब कुछ छिपा जाती

उनकी तस्वीर को सदा भीगी पलकों से छुआ
खुद को खोकर उन्हें अपनी धड़कनों में पाया
प्रेमित हुए फूलों के हर रंग से चेहरा चित्रित किया
तस्वीर अधूरी रही फिर भी इसे “प्रेम” नाम ही दिया

कुछ बैचेनिया आज भी उदासियां दे देती
जब उनमें किसी पलकों की झुकावट होती
बिंदिया उनकी जब भी पसीने से बिखर जाती
आंसूं की बूंद बन मेरे तसव्वुर से निखर जाती

बड़ी बेबाक होती जिंदगी की अजीब राहें
पता नहीं ये किसे कब चाहे कब भूल जाये
प्रीतम से सितमगर तक का दस्तूर निभाये
इनायत की राह में कांटो की चुभन सह जाये

नहीं कहता प्यार में सदा हमारा इकरार रहे
पर इजहार से हर मौसम में सदा बहार रहे
आरजू इतनी समझें कि वफा सदा बेकरार रहे
आलमे तसब्बुर हो जहां की निगाहों में वजूद रहे

✍💖 रचियता 💕कमल भंसाली

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👿रिश्ते👿कमल भंसाली

जिन रिश्तों में दिल नहीं दिमाग नजर आये
उनमें अपनेपन की छावं कम ही नजर आये
अति पास होकर भी दूर की आवाज बन जाये
रिश्तों का ये स्वरुप देखकर मन घबरा जाये

माना स्वयं स्वार्थ में रचा बंधा है जग सारा
पर प्यार के सैलाब में ही बहता जग सारा
टूट जाता जब दिल तो कोई अपना नहीं लगता
रिश्तों की दुनिया मे आदमी अकेला सब सहता

कुछ रिश्तों की अपनी ही होती मजबूरिया
नजदीक के होकर भी उनकी अपनी दूरियां
दस्तूर निभाता जीवन ये सब कुछ सह लेता
पर अपनों के दिये दर्द से कभी उभर न पाता

नये युग का एक ही फलसफा है मेरे भैया
इस युग में प्यार से बड़ा है ठनठनाता रुपया
बुद्धि और भाग्य से जिसने भी इसे जब पाया
वो रिश्तों के प्रति संकुचित होते नजर आया

पर कुछ भी कह लो रिश्तों का पेड़ अब भी हरा
शरीर जब जबाब दे तब रिश्तों से मिलता सहारा
सम्बन्ध होते बुनियादी हर अस्तित्व के ये प्रहरी
रिश्तों बिना संभव नहीं होती है दस्तूरी दुनियादारी

“फूल से भी नाजुक से होते रिश्ते
व्यवहार की खाद से पोषित होते
अपनेपन के जल से सींचे जाते
त्यागी धूप से सदा फूल बन खिलते
“महक है जीवन की” हम, कहते हर “रिश्ते”

रचियता✍💝कमल भंसाली

💙 क्षमा 💚 कमल भंसाली

” क्षमा” को सरल व शांत जीवन के लिए सारगर्भित शब्द ही नहीं अपितु जीवन को सही निर्देश प्रदाता समझना सही होगा। इंसान कितनी ही ऊंचाइयों तक का सफर कर ले, उसकी जीवन अवधि तो सीमित ही रहती है। गलतियां दैनिक जीवन के व्यवहारों मे होने वाली एक सहज प्रक्रिया है, उन गलतियों को सुधारने में क्षमा के योगदान को हम पूर्ण रुप से नकार नहीं सकते। जैन धर्म व जैन शास्त्रों ने क्षमा को सिर्फ ह्रदय से जोड़ा ही नहीं अपितु आत्मशुद्धि का एक बेजोड़ साधन बताया है। इसके पीछे इसकी सात्विकता की सुंदरता को जानना जरूरी है। “समत्सवरी” के पावन अवसर का हर कोई सही उपयोग अगर करने की चाह रखता है तो “क्षमा याचना दिवस” कभी नहीं भूलना चाहिए। सभी व्यवहारिक सम्बन्धों के साथ हर रिश्तें को भी क्षमा द्वारा मधुरता प्रदान करनी चाहिए। क्षमा को कभी कायरता नहीं समझनी चाहिए, सच में तो ये तो वीरो का आभूषण है। आप सभी से मेरी भी क्षमा याचना मन, वचन और कर्म से किसी भी रुप मे अगर आप मुझसे आहत हुए । आशा है, आप “क्षमा” पर रचित इस मुक्क्तक रुप मे कविता का महत्व समझेंगे।
“क्षमा याचना” सहित
प्रस्तुति✍💖 कमल भंसाली 💟
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क्षमा सिर्फ जीवन का सार ही नहीं उसका यह आधार
लेने वाले का देने वाले पर कर्मो का दिया है अधिकार
क्षमा से ही तय होता जीवन का सहज सरल सा प्रकार
सच है यही तय करता जीवन का हर गंभीर आकार
💕
युग परिवर्तन से जीवन बहुत सी नकारत्मकता ले लेता
अहिंसा की चाहत पर हिंसा का बोलबाला बढ़ जाता
संयम का वजन बढ़ जाने से व्यवहार मधुरता खो देता
क्षमा की भावना फिर से जीवन को स्नेहभूत कर देता
💞
“क्षमा” का संदेश हर धर्म के गुरुओं की ज्ञानित भाषा
काम, क्रोध, मोह और लालच है हिंसा की परिभाषा
सहज जीवन जीना है तो न करे कभी कोई भी हिंसा
गलती हुई तो क्षमा मांगने व देने की रहे सदाअभिलाषा
💔
क्षमा स्वर्णिम सवेरा, दूर करता शत्रुता गहनतम अंधेरा
शंकित मन को करता निडर, ये है मित्रता की प्रेम डगर
इंसान कुछ भी हुआ भूल जाता अमृत का भंडार गहरा
सहनशीलता जीव का आधार क्षमा उसका एक प्रकार
💓
क्षमित हो न रखे कुछ भी वैमनस्य आत्मा के भीतर
क्षमा तहे दिल से जो करे देवत्व रहता है उसके अंदर
क्षमा जीवन आकाश का चंद्रमा शीतलता है बेशुमार
“क्षमा वीरस्य भूषणम”न समझे इसे कायरता का श्रृंगार
💘
रचियता: कमल भंसाली

💑नाशाद प्यार💑 कमल भंसाली

नाशाद हुए थे कभी तेरे प्यार में हमदम
इस राज को दिल मे छुपाएं हुए थे हम
वक्त की मजबूर लहरों में बह गये थे हम
इजहारे मौहब्बत न कर पाये कभी हम

कहते है प्यार की खुशबू जज्बाती होती
दामन चाहत के फूलों का छोड़ बह जाती
नूर का मोती बन पाक इबादत बन जाती
एक दिन महबूब की मैहंदी बन रच जाती

फिजाओं के रंग जब बदरंग हो नैनों में छा जाये
माशूक के सपनो में जब प्रेम दृश्य राह भूल जाये
मत पूछना क्यों सच्ची मौहब्बत मंजिल नहीं पाये
दस्तूर है वफ़ा पर जरूरी नहीं हर कोई सही निभाये

आज गैर की अमानत हो हम कुछ नहीं कहते
सरे राह चलते देख तुम्हें अपने नयन भी झुकाते
पर इश्क वो बला है हम लाख छुपाए न छुपा पाते घबराते तुम्हारे लब देख हमें जब निशब्द थरथराते

अपनी चाहते जब किसी गैर की अमानत हो जाये
बैचेन हुए अरमानों को तुम्ही बताओ कैसे छुपाये
जग की ये कैसी रीत कि बीते प्यार को भूल जाये
न पूछो हाल प्यार का जब गैर की बांहों में खो जाए

प्यार तो प्यार ही होता जो दिल मे ही बसा रहता
जिन्दगीं की धूप छांव में दर्द के सैलाब से राहत देता
प्रथम प्यार की प्रथम कहानी न समझो कभी बेगानी
अजनबी यादों की मासूमियत स्मृतियां ही ज़िंदगानी
रचियता: कमल भंसाली

😇अंतर्मन की चोट😇✍कमल भंसाली

कल तुमने अंगुली पकड़ी
तो मैने तुम्हे चलना सिखाया
आज कंधे तक क्या आये
मेरे चलने पर एतराज जताया
भूल न जाना उन राहों को
जिन पर मैने तुम्हारे लिए
न्यौछावर कर दिया अपना हर सपना
उन सपनों की कीमत अब भी तुम चुका नहीं सकते
आज अपने सपनों की कीमत मुझसे ज्यादा आंकते
तय सच अधूरा नहीं रहता झूठ कभी पूरा नहीं होता
किसी के बिना किसी का जीवन कभी नहीं रुकता
कोई भी पिता कभी भी मजबूरियों में नहीं झुकता

माना हवाओं का रुख बदल गया
प्यार का चमन भी शायद सो गया
पर तुम मुझे एक बार अपना कह देते
मुझे छू कर ही तुम्हारा होने का अहसास दे देते
बची सांसो को जरा ये अंतिम विश्वास दे देते
आंतरिक सम्बन्ध की क्षमता को स्पष्ट कर देते
सन्तान के सुख का छोटा सा आभास ही दे देते
तो तुम्हें मैं आज भी अपना हिस्सा समझता
माना वक्त है तुम्हारा पर मैं इससे झुक नहीं सकता

नन्हा सा वो स्पर्श तुम्हारा
तुतलाकर पापा पापा पुकारना
तुम्हारी आँखों में मेरे लिए वो स्नेह का कोना
जिदपूरी न होने पर तुम्हारा रोना
तुम्हारी हर ख़्वाईस को हंस कर पूरा करना
कितना कुछ आज खो गया
मैं वृद्ध आश्रम में आ गया
तुम्हारे हर अहसास को भूल गया
चिंता न करना
मुझे सब कुछ खोकर जीना आ गया
चोट खा कर स्वयं उसे सहलाना आ गया
रचियता: कमल भंसाली

💟रक्षा बंधन💗✍ कमल भंसाली

“रक्षा बंधन” त्योंहार है आस्था का
बहन भाई के आपसी विश्वास का
रिश्तों के संसार में प्रेम के सारांश का
बंधन ही कह लो इस जग से प्रभाष का

स्नेह है, दुलार है, इंतजार है
आत्मा से अंदर की पुकार है
कलाई के बंधन में एतवार है
राखी का यह पवित्र त्योहार है

निशब्द धागे में बन्धन प्यार का
मन प्रफुल्लित सम्बन्ध जन्म का
सितारों से ऊंचा कभी जहां चाहे न हो
पर स्नेह भरा विश्वास बहन का कम न हो

बहन जब राखी बांधे तो भाई को निहारे
दुआ एक ही तरह की दोनों के नयनों में सँवरे
भाई मेरा सदाबहार रहे जैसे नभ के चमकते सितारे
बहना मेरी आबाद रहे राखी बांधे आकर मेरे द्वारे

भैया का प्यार है, बहना का इंतजार है
सम्बन्धों की गरिमा में ही बसा संसार है
एक दूजे के स्नहे में ही जीवन का सार है
“बहना” इस सम्बंध पर पूरा जीवन न्यौछावर है

सूनी कलाई को राखी का इंतजार रहे
“बहन भाई” का यह प्यार सदा अमर रहे
अर्थ के युग में रक्षाबंधन स्नेहाशीष रहे
प्रेम के इस धागे में संसार का प्यार बना रहे
रचियता✍ कमल भंसाली

💔नीयत💔मेरी ✍कमल भंसाली

“यकीन कीजिये
‘नीयत’ नहीं बदली मेरी
वक्त का मिजाज बदल गया
सच यह भी समझीये
जिसको भी अपना समझा
वो खाली सपने दिखाकर चला गया
मुझे दुनिया के बाजार में
बिन उसूलों के बेहतर तरीके सीखा गया

प्यार को अब बुखार ही समझता
सच कहूं तो सहूलियत का औजार समझता
काम कितना ही हो टेढ़ा
उसका सीधा सा है रास्ता
वफ़ा का दामन नहीं
दे सिर्फ वादों का वास्ता
धोका ही अब बचा
यही रह गई अब जग की दास्तां
करामात अपनों की
बिन दर्पण के मेरा चेहरा
स्वयं मुझे ही दिख गया

दया की मेरे में कितनी भावना !
बताऊंगा जब होगा कभी सामना
पर जान लीजिये इसके आधुनिक गुण
दया कुछ कीजिये पर ज्यादा लीजिये
बिन लाभ किसी को कुछ मत दीजिये
अपने बिगड़े कामों को कुछ सुधारने का
यह अंतिम प्रयास जरुर कीजिये
सही जाना यह ज्ञान उन्ही से पाया
कुछ भ्रम के बदले ये दृष्टान्त समझ में आया
शुक्रिया उनका
जिन्हें मैं आज भी गैर न कह पाया

अब यकीन कीजिये
मैं आज जैसा भी हूँ
सब छद्म जग की मेहरवानी
इस जग से ही चलता अपना दानापानी
इस तरह ही चलती जिंदगानी
पर मन कभी जब पी लेता पवित्र पानी
तो बोल देता
“सब ऊपर वाले की मेहरवानी”
अपनों का सच्चा प्यार बीते युग की कहानी”
रचियता: कमल भंसाली