💘फिक्र👀 जीवन चिंतन मुक्तक कविता✍️कमल भंसाली

बची जिंदगी की क्या फिक्र
बीत गई अब उसका क्या जिक्र
कमजोर सांसों के धागे में बंधा
अद्भुत जीवन का चलता चक्र
🕴🚶🏃️
चमड़ी की काया में
क्या क्या नहीं समाया
हसरतों ने कितना कहर ढाया
रुकती साँसों ने ही समझाया
💆💇🚶
जिस जिस्म पर इतराया
अपना नहीं, था पराया
जितना भाड़ा चुकाया
उतना ही उसमें रह पाया
👨‍❤️‍💋‍👨💏👩‍❤️‍💋‍👩
जरा यह समझ लेता इंसान
कुछ उधार के क्षणों का वो मेहमान
समय सीमा का ख्याल रखता
हर मेहरवां, हर मेजबान
कुछ भी तुम उसे कह लो
मै तो यही कहता,यही विधि का विधान
👯👯👯🕴️
अब भी सच नितझर बहता कहता
कर्म के सिवाय कुछ नहीं रहता
जिनको हम अपना कहते
वो जग की अंतिम सीमा तक साथ रहते
💃💃💃💃
जिस्म पर न गौर करे
किसी को दुःख न हो
उसी धर्म का पालन करे
जीवन की सार्थकता का सम्मान करें
🕺🕺👯👯
इसे पैगाम नहीं कहना
सफर है जीवन, मंजिल है मरना
ये सोच है, तो सही है हमारा चलना
सच है, अपनी नश्वरता को समझना
🙏🙏🙏🙏🙏
रचियता✍️कमल भंसाली

💖योंही मेरे साथ चल💖 कमल भंसाली

15 फरवरी 1976 को जीवन का नया सफर शायर के साथ शुरु हुआ और नये नये आयामों से गुजर कर आज यही अहसास दे रहा कि सच्चा प्यार जीवन की वो अनमोल धरोहर व दौलत है, जिसे सच के साथ सदा संभाल कर रखा जा सकता है। शायर के सच्चे प्यार बिना सही जीवन की कल्पना बेमानी लगती। ये कविता उसको और उसके सच्चे प्यार को मेरी तरफ से दिल की कलम से लिखा “उपहार”। हालांकि सच्चा प्यार किसी भी अभिव्यक्ति का मोहताज नहीं होता फिर भी प्यार बिन इजहार कैसे खुश रहे “मेरे यार “।

मितवा रे
तूं मधुर चांदनी
तो मेरे तेरे नभ का चांद
यह तेरा मेरा प्यार
रहे सदा बन ‘बहार’
💓💓💓💓
तेरा मेरा साथ
युगो युगो की याद
मैं तेरा जीवन साथी
तूं ही मेरी ‘फरियाद’
यह तेरा मेरा प्यार
💝💝💝💖
हाथ में तेरा हाथ
नयनों में सपनों का साथ
जीने से ज्यादा
तेरे प्यार की चाह
ये ही है हमारी कसमें
यही है ‘वादा’
यह तेरा मेरा प्यार
❤️❤️❤️❤️
कल चमन में
और भी
प्यार के फूल खिलेंगे
हम भी
उसी सूरज की किरणों
संग खिलेंगे
जग में मर कर भी
‘जिंदा’ रहेंगे
यह है तेरा प्यार
🌷🌷🌷🌷
✍️कमल भंसाली

👨‍👩‍👧‍👧रिश्तों का बाजार ✍️कमल भंसाली

“रिश्तो” के बाजार मे
दुनिया के “व्यवहार” मे
तलाश है अपने प्यार के अस्तित्व की
जीवन में उनके होने के महत्व की

माना, इस बाजार की महिमा निराली
अनोखी होती इसकी कार्य प्रणाली
यहां सब कुछ बिकता
पर सही कुछ भी नहीं दीखता
जो दीखता वो तो एकदम
“सस्ता” भी नहीं मिलता
जो नहीं पसंद किसी को आता
वो दुकान की धरोहर बन
” पुरानी पहचान ” कहलाता

ऊपरी मान समान अनोखे उत्पादन
ऊंची दुकान फीके पकवान
चलती मुद्रा है ‘झूठी शान’
ठग कर भी लोग नहीं होते यहां परेशान
‘रिश्ते’ ही होते आखिर धरती के भगवान

देखो देखो कितने है यहां महान
गले मिलने से लगता
हो जायेगे अभी हम पर कुर्बान
मानों सब लुटा देंगे ये मेहरबान
शब्दों में होगा प्रेम का इजहार
समय पर नहीं होते दर्शन यार
हां, कुछ ऐसा ही होता
रिश्तों का लुभावना प्यार

खास जरूरत न होगी
जब किसी रिश्ते कि
तो बदल जायेगा इनका व्यवहार
तुम इसे कुछ भी कहलो
दुकानदर तो होता ही ईमानदार
फिर भी
मै तो इतना ही कहूंगा
“रिश्ते ” निभानी की “जिम्मेदारी”
इस दुनिया के बाजार में
सही होती सिर्फ
खरीददार की “समझदारी”
रचयिता ✍️” कमल ” भंसाली

😜पर्यावरण🤑 कमल भंसाली

वक्त बेवक्त
बड़ी बेवजह
जिंदगी मुझसे
अपने होने की वजह पूछती
मेरे अंदर के
कलुषित रक्त को
तंग करती
तमतमा कर
उससे यही कहता
मेरी होकर
वो ये सब क्यों पूछती ?
मुझमे अपने होने की
विश्वास की कमी
अक्सर
क्यों ढूंढती ?

सहम सी जाती
थोड़ी धीमी हो जाती
पर बुदबुदाती
अपने ही गैरों जैसे होते
नाजुक रिश्तों को भूल जाते
वजूद मेरा भी
तिलमिला जाता
जिंदगी मेरी ही है
ये मैं भी भूल जाता

पर जब कभी
बाद में शांति से सोचता
सन्दर्भ जब रिश्तों का आता
तो सही से मन में
उनका अस्तित्व क्यों धुंधला जाता
प्यार में
कभी कभी
शक के धुंए का
फूल कैसे उग जाता !

तब यही समझ में आता
हक और अधिकार की रफ्तार में
दिल का पर्यावरण बिगड़ जाता
मैल कहीं तरह से
दिल पर शक की घनेरी कालिख छोड़ जाता
जिंदगी का सवाल
उत्तर की वजह दे जाता
अपने अस्तित्व को
एक नया आयाम दे जाता

रचियता कमल भंसाली

💃क्षण भर🕴️✍️कमल भंसाली

बदली सी तेरी सूरत बहुत कुछ कहती
इन आँखों में अब छवि दूसरे की सजती
तेरे गुमशुदा ख्यालों में अब बेवफाई रहती

मुखरित हुआ जब भी छुपा हुआ प्यार तुम्हारा
सच कहता ह्रदय विश्वास से कहता ये नहीं मेरा
उसांस भर न कहना ये सिर्फ अहसास ही मेरा

माना स्वल्प जीवन बहुत सारे अरमान रखता
पर बेरुखी की कंपकंपी से जिगर ठहर जाता
एक अदृष्यत स्वप्न पलकों तले छिप सा जाता

सबकुछ समझ कर ही मै सदा मुस्कराता
असहज न हो प्रिय प्यार में ऐसा भी होता
क्षण के लिए मन का समर्पण भटक जाता

प्यार का प्यार ही रहने दो अब इसका इम्तहां न दो
तुम न समझो कसक प्यार की सिर्फ मुझे विश्वास दो
तौहफा है प्यार बिन कसम का जुनून इसमें बहने दो

कदम भटके दिल कहीं और तेरा भटके
दिलवर बेगानी हसरतों के न लगे झटके
लौट आ कई तूफानों में कश्ती न अटके

प्रिय सांझ सवेरे में कितना कुछ घट बढ़ जाता
उम्मीद नाउम्मीद से वर्तमान का पन्ना भर जाता
शुकून ही मिलता प्रियतम लौट कर घर आ जाता
क्षण भर का भटका प्यार आलिंगन में समा जाता

💑प्रेम यात्रा👨‍❤️‍👨✍️कमल भंसाली

जलन जब सीने में हो
आंखों में बहता हो
जब निशब्द पानी
बता !
महबूब मेरे
जिंदगी
कैसे तुझे भूल जाएगी
जब याद तेरी आयेगी
तो लहराती तेरी तस्वीर
कैसे मेरा दिल बहलायेगी
💌
आज तूं नहीं
कल मैं नहीं
कोई बात नहीं
तेरे जज्बात ही सही
इस जन्म में मुलाकात
फिर नहीं
तो भी
कोइ बात नहीं
पर
तेरे बिना
जिन्दगी से डर लगता
मौत से तो कभी नहीं
बिन तेरे जीना सहज नहीं
मौत से कोई परहेज नहीं
💟
मानता
प्रेम की परकाष्ठाता
एक विश्वास
एक आस्था
जो
मिलन में कदापी नहीं
घावों की गहनता
जलन में कभी नहीं
पर जानले
मेरे सनम
जुदाई मेरे लिये
दर्द की
कोई सौगात नहीं
है,
ये तो सिर्फ
एक मकसद
एक प्रेममय यात्रा
जिसका कोई
आदि न कोई अंत
क्योंकि
मैं ठहरा
प्रेम पथ का राही

रचियता ✍️…..कमल भंसाली

🙌संवेदन पूर्ण सत्य🕸️कमल भंसाली

“दुनिया में अगर कोई सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है वह है “दूसरों के द्वारा बोलेजाने वाला सत्य”, यह एक तथ्य है, इससे इंकार करना शायद ही आसान होगा। “सत्य” बोलने वाले लोगो की तादाद नगण्य के आसपास ही अब रहती परन्तु किसी समय झूठ बोलने वालो की गिनती हुआ करती थी, इस बात को आज का आधुनिक युग शायद ही स्वीकार करेगा। आज सत्य को एक हारा हुआ खिलाड़ी या नेता भी स्वीकार करने से झिझकता है। शाश्वत चिंतन करे तो ये बात समझ में आ सकती है कि दुनिया का अस्तित्व पूर्ण सत्य में आज भी समाया है, हम चाहे या नहीं प्रकृति अपने आप को सत्य से अलग नहीं कर सकती। हम कितना ही झूठ का दैनिक जीवन में प्रयोग कर ले पर आत्मा उसे अंदर तक नहीं ले पाती, हमारे बोले हुए किसी भी झूठ पर उसका कराहना महसूस किया जा सकता है।

“हम जी रहे है यह सत्य हो सकता है” परन्तु हम ‘सही’ जी रहे ये संदेहपूर्ण है। सवाल किया जा सकता है, क्या सत्य पूर्ण जीवन जीया सकता है ? उत्तर आज के युग में आसान नहीं लग रहा कारण जीवन की गतिविधिया आजकल झूठ के इर्द गिर्द ही ज्यादा समय बिता रही है। कभी सत्य को जीवन की धुरी समझा जाता था, आज उसकी जगह झूठ ले रहा है, इसे जीवन की विडम्बना ही कहे क्योंकि जीवन आज इसी कारण शायद टूट कर बिखर रहा है। जीवन को आज सब सांसारिक सुविधायें बहुत तेजी से प्राप्त हो रही है और बताना भी जायज नहीं होगा जीवन अपना सास्वत मूल्य खो चूका है, और स्वयं ही किसी त्रासदी का शिकार होकर दुनिया को अलविदा कह देता है। सही भी है, झूठ का भारीभरकम वजन कब तक ढोयेगा।

चाणक्य राजनीति के गुरु थे उन्होंने राजधर्म के लिए कई तरह की चालाकियों का सहारा लिया परन्तु झूठ को दूर रहकर। उनके इस कथन पर गौर करते है ” सत्य मेरी माता है। आध्यात्मिक ज्ञान मेरा पिता है। धर्माचरण मेरा बंधु है। दया मेरा मित्र है। भीतर की शांति मेरी पत्नी है। क्षमा मेरा पुत्र है। मेरे परिवार में ये छह लोग है।” काश आज के राजनेताओं में इस तरह के विचार अपनाये हुए होते तो निश्चित ही भारत आंतरिक रुप से कमजोर और गरीब राष्ट्र की गिनती में न होता।

इंसान का व्यक्तित्व प्रकृति ने बड़ी सूझबूझ वाला बनाया है, सर्वगुण और अवगुण वाले संसार में उसको अपना व्यक्तित्व स्वयं निर्धारण करने का अधिकार भी उसे दिया। सक्षम व्यक्तित्व वाले व्यक्ति के जीवन दर्शन पर सरसरी नजर डालने से इस बात से इंकार नहीं करना पड़ेगा कि बिना असत्य का सहारा लिए वो इस मंजिल तक पंहुचे है।

असहाय सी स्थिति है आज जीवन की, भाग्य से प्राप्त खुशहाली अति अर्थ के दीमक से हर दिन जीवन को छीजत प्रदान कर रही है। पल की मोहताज जिंदगी अर्थ के कारण कटुता भरे वातावरण में कई तरह की शारीरिक और मानसिक बीमारियों के विषालु कीटाणुओं से ग्रस्त हो रही है। इस का प्रमुख कारण हम सब समझकर भी नहीं समझते वो है “अति दौलत की भूख”।
हर रोज हमारे आसपास ही क्या हमारे स्वयं के जीवन मे उसकी कमी या अति, जीवन को संकुचित होने का अनुभव कराती है। जब की जानते है, जब तक जीवन है, तब तक मालिक होने का दावा कर सकते है पर उसके बाद उसका मालिक कोई और स्वतः ही हो जाता। अतः इस सत्य को स्वीकार कर लेना ही सही होता है अर्थ के कारण किसी भी सम्बन्ध को कटुता का अनुभव न दिया जाय। कठिन समय मे आपसी प्रेम काफी फलदायक होता है।

कहते है जीवन की शुरुआत प्रेम से हुई और प्रेम सदा सत्य से संपन्न रहना पसन्द करता है, झूठ से वो सदा नफरत करता है। किसी शारीरिक बंधन के चलते वो झूठ को मजबूरी से सहन करता है। इस तथ्य को रिश्तों की दुनिया में सदृश्य समझा जा सकता है। रिश्तों के बनते बिगड़ते तेवर जीवन को कई तरह से प्रभावित करते है। रिश्तों की मधुरता जीवन को सकारात्मक चिंतन प्रदान कर उसे मजबूत कर सकती है। गलत भावनाओं के बस में होकर रिश्तों में कटुता का संकेत देना मात्र जीवन के पथ को कठोरता प्रदान कर सकता है, अतः रिश्तों के प्रति हमारी संवेदनशीलता में सत्य का अंश सही मात्रा में रखना उचित लगता है। जीव विज्ञानी डेविड जार्ज हस्कल का यह कथन आज के युग अनुसार अक्षरस सत्य लगता है कि ” The forest is not a collection of entities (but) a place entirely made from strands of relationship”.

आलोचना से पीड़ित प्रेम कभी भी जीवन को सुख नहीं देता परन्तु समझने की बात है बिना आलोचना का प्रेम चापलूसी की या गुलामी की श्रेणी में आता है, प्रेम का निम्नतम पतन भी यहीं होता है, इस सत्य को कितना ही कड़वा कह लीजिए पर ह्रदय इसे स्वीकार कर सन्तुलित रहता है। आधुनिक अर्थतन्त्र की इस दुनिया की विडंबना ही कहिये इंसान के पास हजारों साधनों का भरपूर भंडार हर दिन तैयार हो रहा है, शरीर नाच रहा सब कुछ भोग रहा पर मन तो खालीपन का शिकार हो रहा। सबके रहते इंसान जब उम्र या किसी कारण से लाचार होता है तो टूट कर बिखर जाता है और दिल के अरमान दिल मे ही रह जाते, कोई सुनने वाला, कोई मन से सेवा करने वाला नहीं रहता उसके आस पास। इसका एकमात्र सत्य उतर यही हो सकता:

“जो दिया नहीं वो मिला नही
झूठ से सत्य कभी दबा नहीं
प्रेम को साधन नहीं संवेदना चाहिए
सही जीने के लिये इस सत्य की समझ चाहिए”

लेखक: कमल भंसाली ।