😃मुस्कराहटों का गुलशन जीवन “हमारा”😃कमल भंसाली

अगर चाहत हमारी जिंदगी में खुशियों की है, तो निसन्देह हमें मुस्कराहटों की खेती करनी होगी, सवाल स्वयं ही उभरता है क्या मुस्कराहटों की भी पैदावार होती है ? उत्तर में हमें रॉबर्ट लुइस स्टीवेन्सन के उस कथन में तलाशते है, जिन्होंने बड़ी दर्दीली और मार्मिक परिस्थितयों से गुजरते हुए लिखा ” There is no duty that we so much understand as the duty of being happy”। हमारी विडम्बना है हम मुस्कराहट का मूल्यांकन सिर्फ दूसरों के चेहरे पर देखकर करते है जबकि हकीकत यह है हमारे चेहरे की जमीन भी उतनी या उनसे ज्यादा उपजाऊ है। व्यकितत्व का विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञ मानते है, जीवन की निराशा को आंशिक सफलता की मुस्कराहट भी कम करती है जिससे शरीर और मन दोनों को अनावयशक तनाव की कमी महसूस हो सकती है, और उत्साह का आगमन जीवन में वापस होना शुरु हो जाता है। प्रसन्नता भरी मुस्कराहट विपरीत परिस्थितयों को अनुकूल होने में संजीवनी का काम कर सकती है।

जिंदगी का सबसे बड़ा तनाव यही है कि हम उसे स्वयं नहीं जीने की कोशिश करते अपितु दूसरों में उसके सही जीने के तरीके ढूंढते रहते है। जबकि हकीकत यही है, जिंदगी बड़ी संजीदगी से रहना चाहती, हर समय उसे मुस्कराना सही नहीं लगता पर कुछ ख़ास लम्हों में वो खुश होकर मुस्कराना जरूर चाहती, हमें इस संक्षिप्त सत्य को समझ लिया तो समझिये मुस्कराहटों की खेती करना भी हमें आ जाएगा।

जीवन क्यों दुखी होता है ? समस्याओं से, जी ‘नहीं’, जीवन हमारी अक्षमताओं से ही घबराता है, जिन्हें हम कभी अपनी सक्षमताओं से नहीं मिलाते। हमारी नैतिक और मानसिक कमजोरियों के कारण हम स्वयं से ही दुःखी होते है। अलबत्ता यह बात जरूर है, हम उसके कारणों का खासकर वो जो प्रायः नहीं होते उनका ही जिक्र करते रहते है। हमारी स्वभाविक चेतना में कई तरह की कमिया होती है, जिन्हें हम नजरअंदाज करते रहते है और यही हमारे व्यकितत्व को शायद मुस्कराने से रोकती है।

कहते है, जीवन के भविष्य को जो खुशनुमा माहौल की सैर कराते है, वो कभी भी निराश का दामन नहीं थामते। सवाल करना भी उचित हो सकता है कि हम किस तरह से जीवन को भविष्य की सैर करा सकते है ? भविष्य के सुनहरे और सक्षमता से ओतप्रोत सपने देखने वाले इंसान में यह क्षमता होती है बनिष्प्त जो अपने उद्देश्यों को हरदम सवालों के घेरे में बंधे रखते है। Marcus Aurellius के इस कथन पर हमें सदा गौर करना सही होगा ” The true worth of a man is to be measured by the objects he pursues” । हमारी सच के दामन से बन्धी मुस्कान हमें हमारे भविष्य के प्रति आशवस्त करती है।

मुस्कराना जीवन की मजबूरी नहीं है, अपितु जीवन को यह निस्फिक्री का सन्देश देती है। हमें दो बातों पर सुखी और प्रसन्न जीवन को जीने के लिए गौर करना चाहिए, एक सत्यता भरा नैतिक जीवन की चाहत दूसरा विध्वंसकारी तत्व चाहतों के दरबार की जी हजुरी से बचना यानी संयमित जीवन की ख्वाईस। विश्वास करना जायज होगा, जीवन में मुस्कराने की वजह नहीं तलाशनी होगी। अपनी किताब ‘The Magic of Thinking Big में Dr David J. Schwartz लिखते है “एक सच्ची और सही मुस्कान दुश्मनी को पिघला देती है, जिससे दैनिक जीवन में आनेवाली कई तकलीफो और कुंठाओं का सहज, सरल समाधान हो सकता है”। सही भी है, हमारी मुस्कान कठिन परिस्थितियों को निर्मल बनाने का काम करती है और हमें निराशा से बचाती है।

हर वस्तु के निर्माण में कुछ तत्वों का सहयोग सदा जरुरी होता है, सही और गुणकारी मुस्कान में दिल की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। “दिल खुश तो चेहरा भी खुश” और मुस्कराते चेहरा का आकर्षण हर कोई को सबसे अलग कर अपना प्रभाव छोड़ता है। दूसरों को सहजता का अनुभव हमारा व्यवहार और मधुरमय भाषा कराती है। भाषा और मुस्कान का चोली दामन का साथ होता है। शब्द और विचार हमारी शारीरिक भावभंगिमाओं को सहज करने में सहयोग देते है। जैसा की Vernon Howrad कहते है ” Happiness is the way you are, not the way things are”। इतने कम तत्वों से संग्रहित मुस्कान अंहिसक होकर भी अपनी सकरात्मक क्षमताओं से लबालब होती है।

इस लेख का कोई बड़ा चौड़ा दावा नहीं है कि इतना कुछ चिंतन करने के बाद हम जिंदगी में मुस्कराने की कला सीख जाएंगे क्योंकि हमारा चिंतन का तरीका ही हमारी जिंदगी जीने का मालिक है। परन्तु, विश्वास करना होगा H. D.Thoreau के इस कथन का ” The man is richest whose pleasures are the cheapest”। आइये संक्षिप्त में कुछ मुस्कान सम्बंधित जानकारीयों पर एक नजर डालते है, जिससे हमारी मुस्कानों की पैदावर सदा बढ़ती रहे।

1.मुस्कान की खेती में आत्मिक शांति एक अच्छी उर्वरक खाद का काम करती है।
2. आंतरिक प्रसन्नता उन अच्छे कार्यों से ही आ सकती है, जिनसे दूसरों के चेहरे खिलखिलाते नजर आते हो।
3. खुशियां देने वाले वातावरण का निर्माण कर हर इंसान एक मुस्कराहटों भरे गुलशन का बागवान बन सकता है।
4. उत्साह, उमंग, जोश से दिल को नित नई रागिनियों से बहलाते रहे।

5. ध्यान रहे हमें, जीवन में सच और संयम के अनुपात से ही ख़ुशी की उत्तम फसल तैयार की जा सकती है जिससे त्याग के फूल दूसरों के प्रसन्नता के देवी देवताओं पर अर्पण होते रहे, और खुशियों की न खत्म होने वाली मंगलमय पैदावर से हमारी जिंदगी सम्पन्न व स्वस्थ रहकर अपनी तय मंजिल पथ पर अविराम अग्रसर होती रहे। जीवन पथ के सजग राही बन गुनगुनाते रहे,

“खुशियां ही, खुशियां
ऐसी हो जिंदगी की डलिया
जिनमे हो मुस्कराहटों के फूल
और खिलखिल करती हजारो कलिया
महकती रहे हर जीवन की बगिया” ।
लेखक: कमल भंसाली

****असहजता के शिकार आपसी सम्बन्ध****भाग 1★★कमल भंसाली

आज संसार अपनी ही तैयार की हुई विषमताओं की खाई में बेठा हजारों तरह से बीमार सम्बंधों के कारण जीवन की मूल्यता का अफ़सोस न कर उन्हें ही आरोपित करने की गलती कर रहा है। अपनी चेतना और संवेदनाओं को शायद वो आज के आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक परिवेश में भूल गया है।

विषय को आगे बढ़ाये उससे पहले हमें दो प्रसिद्ध दार्शनिको के इन कथनो पर जरा गौर कर लेना उचित लगता है। “Epictetus” एक यूनानी स्ट्रोक दार्शनिक थे उन्होंने जीवन का गंभीरता से अध्ययन किया और सिखाया “दर्शन” से जीवन जीने का तरीका सैद्धान्तिक अनुशासन नहीं होता खासकर आपसी नजदीकी सम्बंधों में, जिन्हें आहत होने का खतरा हर समय बना रहता है।

“Clear thinking requires proper training so that we are able to properly direct our will, stick, with our true purpose and disover the conections we have to others and the duties that follow from those relationship”.

Confucius एक चीनी दार्शनिक थे, उन्होंने जीवन के सम्बन्ध में लगभग कुछ ऐसा ही कहा
कि जीवन तो सरल साधा ही होता है, हमारे आपसी सम्बन्ध ही इसे जटिल बनाता है। “Life is really simple, but we insist on making it complicated”

आज हम जिस धरा पर अपना जीवन व्यतीत कर रहे है, वो प्रकृति के नियमोनुसार आज भी हमें सही रास्ते चलाने की कोशिश करती है, जिससे हर प्राणी का अस्तित्व सुखपूर्ण बना रहे। पर हम इस पहलू पर गौर ही नहीं करते क्योंकि हम सच्चाई से हमारे जीवन को दूर ले जा रहे है। मानव मस्तिष्क का अगर तेजी से विकास नहीं होता तो शायद आज भी मानसिक सुख की मात्रा अपनी उत्तमता के साथ प्राप्त करता। महत्वकांक्षा उसके पास उतनी ही होती जितने की वो कामना करता परन्तु वस्तुस्थिति विपरीतता का संकेत दे रही है। आज कृत्रिम आधुनिक साधनों के बाजार से जीवन ऊपरी सतह पर चमत्कारिता भरा उत्साह पूर्ण और सुखी सम्पन्न लगता है, परन्तु भीतर से निरहि, निराशावादी और तन्हाईयों का शिकार हुआ ही है, अगर हम ईमानदारी से इस तथ्य पर गौर करे तो। मानवता का निर्माण कोई एक दिन में सम्पन्न नहीं हुआ न ही आज की सामाजिक व्यवस्था का। मानव विकास की प्रक्रिया और उसके सामाजिक विकास का इतिहास आज हमारा चिंतन का विषय नहीं पर उसके तहत जीवन के सुख दुःख के निर्माण में हमारी आपकी भूमिका की तलाश अब जरूरी हो रही है, क्योंकि जीवन को सुख की छांव देने वाले रिश्ते और सम्बन्ध कई लाईलाज आत्मिक और शारीरिक बीमारियों से ग्रसित हो रहे है। गंभीर चिंतन अगर करे तो भविष्य ऐसीअनहोनी होनें के संकेत दे रहा है कि सबके रहते इंसान अकेला हो रहा है और मानवता धीरे धीरे धरती से अपना नाता तोड़ रही है। इसके क्या परिणाम भविष्य के गर्भ में कहा नहीं जा सकता ? पर कुछ समझा जरूर जा सकता है। आइये, कोशिश करते है, सबसे पहले दाम्पन्त्य जीवन के बनते बिगड़ते स्वरूप का, आज के युग के वातावरण अनुमोदन अनुसार।

सन्दर्भ चर्चा :वर्तमान
देश : भारत
व्यवस्था :सामजिक
चिंतनीय सम्बन्ध : पति- पत्नी
जीवन क्षेत्र : दांम्पत्य जीवन
प्रभावित क्षेत्र : आज का जीवन भविष्य के अन्तर्गत

हालांकि हमारी चर्चा इस महत्वपूर्ण विषय पर है पर संसार निर्माणकारी यह सम्बन्ध आज नई नई चुनौतियों का सामना कर रहा है। हमारे देश में इस सम्बन्ध से गरिमामय जीवन की पहचान बनती है, ऐसा आज भी विश्वास किया जाता है। पर आज हकीकत कुछ और ही बयान कर रही कर्तव्यों और अधिकारों के चक्रव्यूह में इसका अस्तित्व आत्मिक न रहकर आधुनिक साधनों के अधीन हो गया है। आज के युग को आर्थिक युग का दर्जा देकर हमने कितनी बड़ी गलती की इसका उत्तर भविष्य के गर्भ में जरुर कहीं न कहीं समाया है। उसके दुष्परिमाणों से पता नहीं हम कब तक अपने आप को बचाने में सफल होंगे, अभी फिलहाल कहना भी कठिन है।

हमारा देश की सामाजिक व्यवस्थायें कई किस्म के रीती रिवाजों से अंलकृत है, अतः पति-पत्नी के बन्धन दिवस पर उत्साह से इस बन्धन को सामाजिक मान्यता दी जाती है और ऐसे सम्बन्ध के लिए उपयुक्त शब्द “विवाह” का प्रयोग किया जाता है। हर धर्म में इसके लिए कुछ शपथों का भी उपयोग किया जाता है, जिससे सम्बन्ध सिर्फ शरीर तक सीमित न रहकर दिल के भीतर अपनी जगह तय कर ले। इस रिश्ते से दो शरीर के मिलन को विधिवत अनुमति दी जाती है, जिससे उनसे पैदा होने वाली सन्तान से परिवार का निर्माण जारी रहे, अतः हमारे धर्म- शास्त्रों के अनुसार ही इस बन्धन को कुछ मर्यादाओं का ख्याल रखने की हिदायत संस्कारों के तहत दी जाती है । जीवन की सुगमता को और सहज करने में विवाह की भूमिका बहुत ही सुंदर और स्वच्छ वातावरण तैयार करनें की होती है। तथ्य कहते है, नारी की गरिमा ही इस रिश्ते को विस्तृता या संकुचिता की ज्यादा जिम्मेदार होती है क्योंकि उसे प्रकृति ने कई संवेदनशील गुण पुरुष से अलग दिए है। नर- नारी दोनों ही जीवन की गति के सन्तुलित पहिये है।

आज नारी का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का दावा हम जरूर कर सकते है, पर तथ्य कहते है नारी ने ज्यादा समय नर को समझने के लिये लगाया इससे उसके पास नर की जानकारी ज्यादा सक्षम होती है और पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था में वो उसे व्यवस्थित रखने में सफल भी हो जाती है।
चूँकि आज विवाह विवाद का विषय बन रहा है, कल के बन्धन आज टूट रहे है, रिश्तों के मधुरमय होने से पहले कई तरह के जायज नाजायज कारण विच्छेद की स्थिति तैयारी कर रहे है। सम्बंधों का बनना बिगड़ना आज साधारण सी बात लगने लगी । कानूनी प्रक्रियाओं में दोनों का जीवन
आंशका, भय, डर, ख़ौफ़ से रुग्ण और कमजोर पथ की तरफ अग्रसर होने लगता है। सामजिक कमजोरियों के कारण कानूनी दावपेंच से ही समाधान की कोशिश की जाती है, जिसमे समय, धन, और स्वास्थ्य की बलि निश्चित है बाकी परिणाम अनिश्चित रहते है।

समस्या काफी गंभीर होती है जब काफी सालों का साथ दोनों मे से किसी एक की गलत नासमझी से बिखर जाता है या टूटने के कगार पर पंहुच जाता है। इस तरह की परिस्थितियों का निर्माण एक दिन में नहीं होता पर आसार दिखने के उपरान्त भी कमजोर सामाजिक और पारिवारिक दीवारों के अंदर अंतिम परिणाम का शिकार हो जाता है, जिसका सबसे ज्यादा प्रभाव बच्चों के भविष्य पर घातक रूप से होता है। स्वार्थ भरा माता पिता का यह स्वरूप उन्हें अंदर तक खोखला कर सकता है। यहां सवाल जो उभर कर प्रगट होता है, उसमें कोई सभ्य शालीनता नहीं तलाशी जा सकती अतः उत्तर तलासना सिर्फ संशय का शोधन करना ही कहा जा सकता है।

मनुष्य काफी हद तक परिस्थितियों का दास है, दोनों ही प्राणी नर- नारी अपनी शारीरिक सरंचना के कारण स्वतः ही ऐसी स्थितियों का निर्माण कर लेते जो उनको चरित्रमय जीवन से दूर ले जाती है, जहां यथार्थ से ज्यादा अधूरी हसरतों की भूमिका होती है। भारतीय परिवेश के दाम्पन्त्य जीवन में आज अर्थ का महत्व काफी बढ़ गया है। नारी गृह की सशक्त गृहणी की भूमिका के दायरे से बाहर अपनी दूसरी क्षमताओं को तलाशने में लग गई, इससे पारंपरिक गृह स्वामिनी जैसा मान सम्मान की अब मोहताज भी नहीं है। समानता के आधार पर वो आज अपना जीवन साथी तलाशती है।

उपरोक्त चर्चा से यह कभी नहीं समझना चाहिए कि आपसी सम्बंधों में किसी एक की भूमिका की वकालत की जा रही है। जब भी किसी नाजुक सम्बन्ध का अनुशंधान किया जाय तो कुछ सत्यता भरे कटु अंशों को चर्चा में सम्माहित करना जरूरी होता है, अन्यथा बिना निष्कर्ष का ये लेख अधूरा ही रहेगा। इस चर्चा का ध्येय इतना ही कि जीवन पूरक इस सम्बन्ध की गरिमा को बनाये रखने कि जिम्मेदारी मर्द और औरत दोनों की आज के युगानुसार बराबरी की है और इस तथ्य को मानकर ही प्रेम भरे कर्तव्य से इस अटूट बन्धन को जीवन पर्यन्त निभाने का प्रयास करना चाहिए।

तथ्य कहते प्यार में चाहे शर्त न भी हो परंतु किसी भी प्रकार के सम्बन्ध के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। ध्यान यह भी रहे गर्मजोशी में बनाये गये किसी भी प्रकार के प्रेममय सम्बन्ध अति शीघ्र हिम बन पिघल भी सकते है। दिल की भावनाओं में अगर प्रेम की कदर होती है, तो बिना किसी सम्बन्ध के जीवन प्रेम का उपासक बना रहता है, हमारी भावनाओं में इस विचार को कभी भी गहराई नहीं देनी चाहिए कि दिल को तो भगवान ने टूटने के लिये बनाया है। मार्क ट्वैन का कथन इस सन्दर्भ में बहुत ही मार्मिक है ” Never allow someone to be your priority while allowing your self to be their option”। क्रमश….लेखक कमल भंसाली

👍घटना👎कमल भंसाली

घटनाओं से संसार बना
बिन घटना के जग सूना
हर घटना की अलग लय
कहीं सृजन और कहीं क्षय

सुदर्शन चक्र की तरह इसकी महिमा
न इसके लिए दुरी, न इसकी कोई सीमा
कहीं प्रहरी, तो कहीं है, जग संहारक
कहीं कर्मो का फल, कहीं भाग्य प्रचारक

हर पल, कुछ घटना तय
कहीं खुशी, कहीं पर भय
इसमे जीवन की हर लय
हर कर्म का फल करें,तय

घटनाओं से ही शुरु होती, जिंदगी
घटना में जीवन का पूरा समाया सार
बिन घटना भी है, एक घटना प्रकार
उसी में रहता , एक लक्ष्य भरा संसार

एक क्षण में बादल बरसते
दूसरे क्षण बिजली चमकाते
उमर घुमड़ सब को डराते
पर कुछ नहीं करते, चले जाते

घटना की हकीकत कोई भी न जाने
न ही कोई इसकी उपलब्धि पहचाने
शुभता का चिंतन ही इसका उपचार
घटना तय है, सदा चिंतन करो साकार

कहते है, घट घट के वासी की है, पत्नी
नाज नखरों में रहती है, उसकी संगिनी
कुछ न कुछ कर, अपना रुप सदा दर्शाती
एक अदा से, संसार का स्वरुप समझाती

आज हम है, कल नहीं, यह भी एक घटना
जीवन, मृत्यु का खेल, दोनों को ही जीतना
इसी कशमकश में, ख़ुशी और गम करते कुश्ती
समझना जरुरी, घटने में ही समायी, हमारी हस्ती
****कमल भंसाली

🍃सफलता सूत्रम🍃 जीवन उपयोगी मुक्तक कविता ✍कमल भंसाली✍

अफसोस न कर जिंदगी अपनी नाकामियों का
ये नाप नहीं अपनी छिपी हुई हर क्षमताओं का
ये तो सिर्फ एहसास अपने कम किये प्रयासों का
हार नहीं स्वीकार फलसफ़ा है हर सफलता का

अनैतिकता से अर्जित हर सफलता होती अधूरी
सत्यता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती कभी पूरी
हर मंजिल तक पंहुचने के अपने अपने होते दस्तूर
जो स्वयं की क्षमताओं से अनजान वो ही उतना दूर

कल की गलती कभी आज न दोहराना
हर गलती में हो सुधार, यह पाठ अपनाना
छिपी हुई गलतिया की चाल को समझना
इज्जत के नाम पर उन्हें कभी न छिपाना

दृढ़ता संकल्पों में सदा उद्धेश्य बनाये रखना
आलस्य की गहराई से स्वयं को दूर ही रखना
मेहनत ही दवा, हर घायल कर्म को समझाना
आश्रित न हो हर कर्म को खुद्दारी से सजाना

मंजिले नहीं होती उतनी दूर जितनी तुम्हें दिखती
बैठे बैठे कोई भी यात्रा संपूर्णता नहीं प्राप्त करती
चलने वाली राही बन, तेरी सांसों को गति मिलती
ठहर जो जाता उसे कर्म की निर्मलता नहीं मिलती

कल कल बहते वक्त के धारे करते ही रहते इशारे
जो न समंझे उनसे दूर हो जाते मंजिल के किनारे
इतना ही तेरे भाग्य काअफसाना कहते ग्रह सितारे
सफल वही जो ढूंढ ले आने के अदृश्य मकसद सारे

दास्तन ऐ जिंदगी मेरी दोस्त ये ही दर्शाती
हर कर्म से तय होती तेरी मेरी जहां में हस्ती
सफलता-असफलता पथ के है चंचल पथिक
चलते चलते जब जो मिले वो ही अस्तित्व के प्रतीक

रचियता🍂✍ कमल भंसाली

🌷सच और प्यार🌷मुक्तक युक्त कविता✍ कमल भंसाली

सदिया बीती प्यार रहा अमर
पथिक चलना ऐसी ही डगर
प्यार ही हो तेरी असली मंजिल
खुशियों के फूल खिलेंगे हर पल

💖

खूबसुरती जिस्म की बदलती रहती
अवधि सांसों की भी कम हो जाती
पर प्यार की रंगत एक जैसी रहती
प्यार से रहो, धड़कने भी ये चाहती

💝

पल का प्यार, स्वाति बन कर चमकता जाता
सच्चाई की धवलता से पलमें कीमती हो जाता
रंग बदलता इजहार आरजूये ही करता जाता
इससे प्यार का अहसास कभी नहीं कर पाता

💕

हर रिश्ते में प्यार का ही बन्धन होता
खून से तो सिर्फ इसका सम्पर्क रहता
आपसी समझ बन जाता है जब प्यार
तो जीवन अपनी मंजिल करता तैयार

💑

कहते है जब तक प्यार और सच साथ साथ रहते
जीवन की बगिया में खुशियों के फूल खिलते रहते
झूठ की शराब में जो प्यार को ओतप्रोत कर रखते
एक दिन प्यार की चाहत में तिल तिल कर तरसते

👄

प्यार को जग में भगवान से कभी कम नहीं समझना
जीवन के नभ का इसे सूर्य और चन्द्रमा ही समझना
प्यार को उजियारा,सत्य को आत्म ज्ञान हीसमझना
सच्चे प्रेम को अटूट अनमोल जीवन बन्धन समझना

💟

सभी तपस्याओं का सार है, सत्य, प्यार भरा जीवन
अति चाहत की लालसा में जब भटक जाता इंसान
उसे इस लोक से उस लोक तक नहीं मिलते भगवान
कर्म बन्धन से परेशां कैसे करेगा आत्मा का निर्वाण

🙏🙏🙏 रचियता👉 कमल भंसाली👈

👤जिंदगी रुठती रही🙏कमल भंसाली

जिंदगी रूठती रही, मैं मुस्कराता रहा
ख्बाबों के टूटने का सिलसिला जारी रहा
फिर भी रूठी जिंदगी को प्रयासों से मनाता रहा
कभी कभी उसके न मानने की वजह तलाशता रहा
जिंदगी….

दर्पण में सूरत ने भी मुस्कराने से इंकार कर दिया
दिल की देहरी पर थकावट ने अपना डेरा डाल दिया
प्यार के दस्तूरों ने जज्बातों से सदा मजाक ही किया
हूनर सारे भूलकर फिर भी जीवन पथ पर चलता रहा
जिंदगी…

हर जायज ख्वाइस निराशा के जाम में डूब इतराने लगी
ख़ुशी के कदमों की आहट से जिंदगी डर कर भागने लगी
स्वयं को मूल्यांकित किया तो कीमते भी बगले झांकने लगी
उलझनों के दौर में फिर भी नन्ही खुशहाली को तलाशता रहा
जिंदगी…

जब सब कुछ लूट गया तो वक्त के कदम ठहर गये
अजनबी हसरतो के काले साये भी अदृश्यत् हो गये
झलक मुस्कराहट की दर्पण के टूटे शीशे में समा गई
रूठी जिंदगी , बन्द नैनों की एक बूंद से निरुत्तर हो गई

अब मैं रूठ गया, जिंदगी मुस्करा कर ठहर गई
प्रतीक्षित हो, अपने अनुराग का परिचय दे गई
तुमसे ही है मेरा जहां, कान में धीमे से बोल गई
न नाराज होगी मुझसे वो फिर कभी, ये सन्देश दे गई

रचियता: कमल भंसाली