💘Love 💘 आज कल ✍️कमल भंसाली

जरा इन शब्दों पर गौर कीजिये, “I Love You” । अब जरा सच्चाई भरे दिल से यह बताइये आपने अपनी जिंदगी में किसको और कितनी बार ये शब्द बोला। अगर आप वर्तमान पीढ़ी के युवक है, तो निश्चित है, इस शब्द का प्रयोग काफी बार किया होगा, क्योंकि ये वर्तमान जीवन शैली की आवश्यकता है। परन्तु, आप अगर मेरी तरह उम्र की परिपक्वता की श्रेणी में तो हो सकता है, यह शब्द आपने देश, माँ, पत्नी या अपनी ख़ास प्रेमिका के लिए कभी ख़ास परिस्थितयों में ही दोहराया होगा। समय के उड़ते पंखो की ताकत के आगे इंसानी भावनाओं का विक्षप्त अनुराग सदृश्य होना कोई आश्चर्य की बात नहीं, पर यह भावनाये आज के समय में संशय की अवस्थाओं को भी प्रकट करती है। इसका एकमात्र कारण जो स्पष्ट नजर आता वो है कथन में सच्ची आस्था का न होना। हो सकता है, कहने वाले के कथन में मजबूती नहीं परिस्थितियों की मजबूरी ज्यादा झलकती हो।कालचक्र की विशेषता होती वो बहुत कुछ पीछे से टान कर लाता, पर कुछ जो उसे कम पसन्द आता कुछ देर के लिए उसे घसीटता पर अंत में उसे छोड़कर कुछ नया ईजाद करने की कोशिश करता है। उसका यह रवैया बदलाव की परिभाषा में नये सन्दर्भ जोड़ देता है। कुछ ऐसा ही एहसास हम प्रेम के संकोच पूर्ण आवरण के साथ होता महसूस कर सकते है। हम अपनी वर्तमान जिंदगी में आज प्रेम को आवरण से ही बाहर होते देख रहे, हर रिश्ते में हम बेबाक ” लव” शब्द का प्रयोग कर लेते। जिन रिश्तों के प्रति हम प्रणाम शब्द का प्रयोग करते, उन्हें आज आदर से नहीं लव के सहारे अपना अनुराग प्रकट करते दीखते है। युग अनुसार सही होगा पर मुझे याद नहीं अपने बचपन के दौर में मैंने अपने पिताजी को कभी ” I love you, ” Papa” कहकर अपना प्रेम प्रकट किया हो, हां प्रणाम कर उन्हें इस गहन रिश्ते के प्रति अनुरागी आस्था को जरुर प्रकट किया, उसके बदले में उन्होंने अपना स्नेह आशीर्वाद द्वारा व्यक्त किया, जिसमें प्रेम से ज्यादा मुझे उनके स्नेह का अहसास हुआ। सम्बंधों और रिश्तों के मामले में कह नहीं सकता कुछ अलग करने से कुछ कम होता न ही कोई दावा करता पर सच के जिस अंश की तलाश हम हर रिश्ते में करते वो हमारे पिता- पुत्र के रिश्ते में था, पर आज उस सच की मात्रा का अंश कितना किस रिश्तें में है, अब ये सिर्फ मूल्यांकन का विषय रह गया है।सवाल ये भी किया जा सकता है, इन शब्दों का इस तरह विश्लेषण करने का कारण, तो उत्तर यही देना सही लगता, आज जताने वालों का प्यार शब्दों तक ही सीमित क्यों रहता ? ताजा कई उदाहरण जब सामने आते, तो ये शंका होती कि स्वार्थ के मन में उभरने पर इनका अर्थ कहां खो जाता। कभी लगता कहीं स्वार्थ और प्यार किसी अनुचित गठबन्धन का अहसास तो नहीं है, “I love you”। हम सभी किसी ख़ास राष्ट्रीय पर्व पर झंडे को सलामी देकर कहते। “Love you india”, परन्तु जब हम किसी ख़ास विषय पर अपनी विरोध की भावना को उजगार करते तो देश की सम्पति को ही आग लगा देते, बिना ये चिंतन के कि यह हमारी है, हमारे देश की है, जिसे हम ” आई लव यूँ ” कहते। इससे साबित तो यही होता कि हमारे अंदर देश प्रेम का कोई जज्बा नहीं हम सिर्फ शब्दों से ही दूसरों को अहसास देते। ये ही हालात आज के दौर में प्रेम का दंभ भरने वाले प्रेमियों को हम असहनीय रुप से नजर-अंदाज कर हम भी शुकून की तलाश करते नजर आते है।प्रेम के निशब्दों के अहसास और विश्वास के इतिहास पर कभी नजर डालें तो यही अहसास होता है, कि पहले बोलने में भले ही संकोच करते थे, पर समय आने पर अपने आपको साबित भी कर देते कि हम सही में प्यार करते है। हमारे पुराने साहित्य और कई ऐतिहासिक धरोहरों पर हम नजर डाले तो महसूस कर सकते प्रेम शब्दों का मोहताज कभी न रहा, सिर्फ अहसास भर से आगे की यात्रा कर लेता था। आज का दौर में प्रेम जरुरत का मोहताज बनता नजर आ रहा है, ये जीवन की खुशियों के लिए एक चेतावनी नजर आ रही, जिस पर हमें स्वयं के चिंतन की जरूरत स्पष्ट नजर आ रही है। आज प्रेम आमने-सामने होने से ही हो जरूरी नहीं रह गया। किसी सोशल मीडिया पर किसी सुंदर चेहरे पर आते देरी नहीं लगती और उसमें प्रस्तर होने की गति में कोई सीमा भी नजर नहीं आती, पर कितनी दूर तक का सफर, यह कहना कठिन है ? यह संशय और शंका की बात है, क्योंकि सिर्फ जिस्म के बाहरी अवलोकन से इजाहारित प्यार अपनी पौष्टिकता आखिर, किस साध्य से पायेगा ! इसलिए आज का जिस्म सम्मोहित प्यार प्रतिसंहत होने का ज्यादा अहसास देता है।आगे बढ़े, उससे पहले जरा प्यार को परिभाषित कर लेते, सीधी सी परिभाषा “प्यार” की प्रीति और स्नेह है, बाकी इसके आगे इसकी सजावट है। हां, प्रीति में भक्ति का अगर अमर तत्व हो फिर प्यार की परिभाषा स्वयं भगवान की भाषा बन जाती और उससे विशिष्ठ प्यार किसी दूसरी तरह का होता ही नहीं। परन्तु हम सांसारिक जीव है, अगर मीरा जैसे उदाहरण का अपवाद को छोड़ दे तो शायद इस स्थिति का चिंतन हमारे लिए कल्पना मात्र ही है। इंग्लिस में “Love” जिसका हम दैनिक जीवन में ज्यादा प्रयोग करते पर “Affection” उस पर भारी पड़ता, इसका उपयोग भी कम नजर आता। क्योंकि उसमे अदृश्य पवित्र अहसास के समन्वय को सादगी से महसूस करना आसान नहीं होता पर तय है, प्रेम की सही परिभाषा में शिष्टता की झलक बहुत महत्व रखती। अशिष्टता से सदा प्रेम की हार होती, चाहे आप उसके लिए कितने ही रुमानी शब्द मौहब्बत, इश्क, याराना आदि का कितने ही जज्बातों के साथ कर लीजिये।हम किसी भी सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत जीवन को समझ कर अपनी उम्र को अंतिम मंजिल तक की यात्रा कराते, उसमें हर अवस्था प्रेम का अपना प्रभाव काल के अनुसार बदलता रहता, पर बिना प्रेम जल बिन मछली सी हालत में ही जीवन गुजरता नजर आता। प्रेम आखिर जीवन की चाह क्यों है ? इसका उत्तर हमारी घटती उम्र की साँसे सही दे सकती। कैसे, तो समझना होगा सहारा व त्याग के उस समावेश तत्व को जो प्रेम और स्नेह मक्खन की तरह हमारे आपसी सम्बंधों और रिश्तों में समाया है। कहते है, सच्चे और सही रिश्ते बोलते नहीं, पर हमारे हर कदम के साथ फिर भी वो अपना तालमेल बनाये रखते। रिश्तों की विशाल दुनिया में पहला रिश्ता अपनी जन्मभूमि और जननी से हर इंसान का बनता। अगर वो इन दोनों से अपने प्रेम की सही जांच न करता, तो निश्चित है, उसके लिए हर प्रेम की भाषा अपरिभाषित ही सदा रहेगी। ऐसे इंसान को देश समाज, सम्बन्ध, सत्यता और धर्म से कोई लेना- देना नहीं होता वो अपने से ही अस्तित्वहीन हो जाता, और नगण्य मूल्यांकित हो जीवन के हर सही मकसद द्वारा नकारा जाता।आज प्रेम की बिगड़ती स्थिति का पूर्वालोकन कबीर दास जैसे संत ने समय से पूर्व ही कर लिया तभी वो कहते,
प्रेम पियाला सो पिये शीश दक्षिना देय
लोभी शीश ना दे सके, नाम प्रेम का लेय ।
( यानी प्रेम का प्याला केवल वही पी सकता है जो अपने सिर का बलिदान करने को तत्पर हो। एक लोभी- लालची अपने सिर का वलिदान कभी नहीं दे सकता भले वह कितना भी प्रेम- प्रेम चिल्लाता हो।)
अंत में ये बताने में हर्ज नहीं की प्रेम दिल और आत्मा दोनों का उत्पादन है, समय ही आजकल तय करता किस ब्रांड में युग अनुसार किसका कितना उपयोग किस जगह किस तरह करना है। आज भी आत्मा के उत्पादन संस्कारित तरीको से बनते जिनमें काफी कुछ खर्च करना पड़ता और बिना किसी मिलावट के कारण सुंदरता का बाहरी अहसास नहीं दे पाते। आजकल हर कोई दिल की सुनता, पता नहीं कब वो जिंदगी से खफा हो जाये।
लेखक : कमल भंसाली