💘सपने अपने💘✍ कमल भंसाली

दर्द बहुत है दिल मे किस किस की बात करुं
पर जब अपनों से मिले तो दिल कहता कुछ करुं
बेबसी मेरी वो समंझे नहीं अब गिला किससे करु
भूल गये जो दिए संस्कार उनकी क्या बात करुं
🐷🐷🐷🐷
बदल गए वो जिनके लिए को जीवन किया अर्पण
अपनी सूरत न देख उनकी सूरत को समझा दर्पण
आज वही मेरे चहेते, चाहते अपने कदमों में समर्पण
जिंदगी बता क्या खता हुई जो टूट रहे सपने हरक्षण
🐪🐪🐪🐪
जिनकी अंगुली को छू प्रेम का प्रथम स्पर्श कराया
वही प्रेम आज तरस कर दिल से उनके निकल गया
खामोशी कमजोरी रही या मेरी कोई अपनी मजबूरी
दामन तो भीग गया पर जीवन की प्यास रहीअधूरी
🐆🐆🐆🐆
दिशा निर्देश से उनके हर पल को सजाता रहा
जीवन के आनेवाले अंधेरों से उन्हें बचाता रहा
शिक्षा के रंगों से उनके जीवन को रंगता ही रहा
भूल थी जिंदगी, परायेपन का कभी अहसास न रहा
🐒🐒🐒🐒
अपनेपन के रिश्तों के साये में जब बिखर जाऊंगा
शायद हर दर्द के हर रंग में एक दिन डूब जाँऊगा जिंदगी के हर सितम की गहराई से न उभर पाऊंगा
अफसोस के पत्थर का शिलालेख बन पसरजाँऊगा
🐂🐂🐂🐂
अब अहसास न कर जिंदगी किसी भी प्यार का
लगे कोई सौदा है चाहत के नाजायज व्यापार का
दस्तूरों के लिए सही नहीं फलसफा परिवार का
वर्तमान जंग है स्वयं से स्वयं के ही एतबार का
🐘🐘🐘🐘
कुछ पल का बचा जीवन कहता हो के मगन
अंत ही करता भला, शुरुआत तो है छलावा
दौड़ उम्र की, अनुभव का है सदाबहार चमन
कर्म के फूल ही जीवन की बगिया में लगवा
रिश्तों के बेगानेपन में ही सिर्फ न भटका मन
🐵🐵🐵🐵
✍रचियता : कमल भंसाली

🐵सत्य और ईमानदारी की मजबूरी बन गई शेरनी🐯 चोरी 🐯 कमल भंसाली

दुनिया एक सच है, परन्तु झूठ के रोग से भयंकर ग्रस्त है। कहीं भी जाये दूर दूर तक झूठ का साम्राज्य फल फूल रहा है। अब तो नोबत यहां तक आ गई कि सच बोलने से कतराना ही सही लगने लगा। आज अगर कोई सच बोलकर जीने की कोशिश करता भी है तो समझ लीजिये झूठ बोलने वाले लोग उसका जीना दूभर कर देते है। भारतीय परिवेश की बात करे तो सच नदारद होता नजर आ रहा है। एक आकर्षक झूठ जितनी सहजता से प्लेटफार्म बना लेता शायद एक शुद्ध सच उतने ही दुश्मन। सवाल उठता है, नैतिकता का यह तत्व सच हमारी जिंदगी से क्यों आहिस्ता आहिस्ता विदाई ले रहा है ? इसका जो प्रमुख कारण अगर हम तलाशे तो शायद यह कह सकते कि इंसान को अपनी नैतिकता पर भरोसा नहीं रहा या फिर उसका सही जीवन दर्शन पर भरोसा कम हो गया है। पर तथ्य की बात है, सत्य कभी हार कर अस्त नहीं होता, हाँ कुछ देर के लिए कहीं ठहर जरुर सकता है।

इस सन्दर्भ में एक घटना का उल्लेख करना यहां सही होगा कि जब आज की तरह संचार सुविधाओं का इतना प्रभाव आदमी की जिंदगी पर नहीं पड़ा था तब मिश्र में रेडा डिफ जो एक टैक्सी चालक की नौकरी करता था तो उसने अपनी गाड़ी की पिछली सीट पर एक बण्डल को पड़ा देखा और उसमें उसको 12000 पौंड की रकम लिपटी मिली। शायद यह रकम उसके अंतिम ग्राहक की लापरवाही का परिणाम थी। डिफ की लड़की किसी गंभीर बिमारी से उस समय जूझ रही थी और रकम की कमी के कारण वो उसका इलाज ठीक से नहीं करा पा रहा था। निसन्देह यह रकम उसके लिए वरदान हो सकती थी परन्तु ठहरे हुए इस सत्य ने उसे विचलित नहीं किया और उसने तत्काल स्वच्छ आत्मिक निर्णय लिया। जिस होटल में उसने अपने ग्राहक को उतारा वहां वापस जाकर उस ग्राहक को ढूंढ कर रकम को वापस कर दिया। इस सच्चाई की सांसारिक कीमत भी उसे चुकानी पड़ी । उसी दिन उसके मालिक ने गाड़ी को बिना ग्राहक के चलाने के कारण नौकरी से निकाल दिया और सही इलाज के अभाव में उसकी लड़की के प्राण चले गये। परन्तु, भाग्य से एक रेडियों रिपोर्टर को इसकी खबर मिली और समाचार की जानकारी पाने के बाद उस समय के तत्कालीन राष्ट्रपति ने उसे एक नई गाड़ी प्रदान की और दूसरी जरूरतों में उसकी मदद की। उसकी इस सच्चाई भरी ईमानदारी ने डिफ को स्वयं की गाड़ी का मालिक बना दिया, अब वह स्वयं एक मालिक था। इस सच्ची घटना के अनुसंधान का परिणाम इतना निश्चित है कि हर निर्णय का स्वयं के सन्दर्भ में मूल्यांकन करना और उसी अनुसार निर्णय लेना आत्मिक विश्वास की श्रेष्ठता होती है। कुछ खोना और पाना यह स्वयं ही निर्धारित होता है पर इससे हमारी श्रेष्ठता की पहचान दुनिया एक दिन स्वयं प्राप्त कर लेती है। जीवन के क्षेत्र में Bernard Glipson का यह कथन ” If it be right, do it boldly; if it be wrong, leave it alone”. काफी सार्थक अर्थ से समाहित है।

जीवन की कई दृश्यत् और अदृशत घटनाओं से हम यह भी अहसास कर सकते है कि जरूरी नहीं सत्यता हर समय हमें सुख का अनुभव कराये, कभी कभी तो सत्यता के कारण आत्मा को असहनीय दुःख का भी अनुभव हो सकता है। आपसी रिश्ते जहां विश्वास की मात्रा की जरुरत ज्यादा होनी चाहिए, देखा जा सकता है, आज सबसे ज्यादा अविश्वासनिय महसूस हो रहे है। इस अवलोकन का चिंतन करने से इस अहसास को भी हमें जगह देनी कि आजकल जीवन अक्सर झूठ के दामन में ही फलफुलता है, और कहीं कमजोर हुई आत्मा सत्य को कमजोरी भी दे सकती है। हमें अपने पारिवारिक और सामाजिक जीवन के सन्दर्भ में अलबर्ट आइंस्टीन के इस कथन से पूरी तरह सहमत होना चाहिये, ” Whoever is careless with the truth in small matters cannot be trusted with the important matters.”।

सत्य से जुड़ा एक और शब्द “ईमानदारी” जीवन के सुखों की इमारत की नींव होती है, यह एक पराक्रांत तथ्य है और इसकी परायणता पर सन्देह उचित भी नहीं है। इस तथ्य की जांच हम संसारिक रिश्तों के सन्दर्भ में भी कर सकते है । मसलन पारिवारिक सम्बंधों को ही ले जो आज ईमानदारी को तरस रहे है और अनचाहे झूठ के शिकार हो रहे है । जीवन को गहनतम तनाव का उपहार देकर उसे जर्जर और कमजोर कर रहे है। इसका सीधा साधा कारण यही नजर आता है परिवार में सबकी अपनी अलग अलग महत्वकांक्षाओं को महत्व देना और परिवार की तत्कालीन जरूरतों के प्रति उदासीनता रखना। करीबी रिश्तों की क्या बात करे, वो तो सांसों के भी दुश्मन नजर आने लगे है। उनके लिए अपनी महत्वकांक्षा को हासिल करना ही प्रमुख होता है,। पूर्ण सत्य के अभाव व झूठ के सहारे वो अपने उद्धेश्यों को नये नये सपनों को मालिक बनाकर स्वयं ही उनके गुलाम हो जाते है।

इंग्लिश भाषा का एक शब्द है “FIDDLE ” जो आज के जीवन का प्राय्य बन गया है, जिसे आज के युग ने जीने की कला के रुप में स्वीकार भी कर लिया, अब ऐसा महसूस भी होने लगा है। इस शब्द का अर्थ होता है, ” to act dishonestly in order to get something for your self or to change something dishonestly, especially to your advantage.”। अगर वर्तमान परिस्थितयों पर हम अपनी ही ईमानदारी से स्वयं का अवलोकन करे तो लगेगा हम इस रोग से ग्रस्त हो चुके है। जीवन के सन्दर्भों के तहत बात करे तो हर देश, जाती, समाज, परिवार भी इस रोग से ग्रस्त हो चुके है। इस रोग की विशेषता यही है कि यह आत्मा में इतना निज स्वार्थ भर देता है की सत्य की बात तो मामूली सी लगती है ईमानदारी को भी इतनी दूर भेज देता कि मरने से पहले तक याद भी नहीं आने देता। हालांकि, अंतिम क्षण जीवन के बहुत कठोरता से उसे सत्य की वेदी पर इस अहसास की असहनीय पीड़ा देते है कि उसने सांसारिक सुखों की प्राप्ति के लिए आत्मिक पवित्रता का बलात्कार जैसा जघन्य अपराध किया है और जिसकी सजा उसे अनिश्चित रुप में चुकानी है। न्याय के इस सिद्धांत पर विश्वास हमें एक दिन करना ही होगा की ‘पीड़ा की सजा पीड़ा ही हो सकती है’। गलत तरीको से पायी सम्पति हो, प्रसिद्धि हो या और कुछ सांसारिक उपलब्धि एक क्षणिकता के सुख स्वरूप मात्र का अहसास है, पर उसकी कीमत कितने जन्मों तक किस रुप में चुकाई जायेगी यह तय वही करता है जिसने हमें इस धरा पर अपने कुछ पवित्र उद्देश्यों को अंजाम देने के लिए भेजा है। इस सत्य से कोई भी अपना आँचल नहीं बचा सकता।

इस चर्चा के तहत “चोरी” भी एक सच्चा दोस्ती जनक शब्द है, और मानव स्वभाव का एक अच्छा दोस्त, जो बचपन से ही हमारे व्यक्तित्व में अपना स्थान पका कर लेता है। हम अपने बचपन को अगर याद करे तो शायद कई ऐसी घटनाये हमारे दिमाग में होगी जब हमने अपने माता-पिता या और किसी से छुपा कर कोई टॉफी, कुछ खुदरा वस्तुओं को अनजाने बिना उन्हें मालुम पड़े ले ली इस तथ्य के अंतर्गत शायद और मांगने से नहीं मिलेगी। हम ये काम अनजाने में करते थे और जब तक नहीं पकड़े गये तब तक शायद यह अहसास ही नहीं हुआ कि ऐसा करना चोरी है। ‘चोरी’ शब्द से हमारा प्रथम परिचय बचपन में ही प्रायः हो जाता है, जब दूसरे की किसी वस्तु या और कुछ उनसे छिपा कर ले लेते या फिर प्रयोग करते तो हमें बताया जाता ऐसी हरकत को ‘चोरी’ कहते है। हमें शिक्षा भी दी जाती थी कि जिस वस्तु पर स्वामित्व हमारा नहीं और उसे बिना जानकारी और सहमति के हासिल नहीं किया जाना चाहिए। अगर हम वैसा करते है तो चोरी करते है और नीतिगत सिद्धांत यही है चोरी करना अपराध है, परआश्चर्य की बात है, आज हम पूरी जिंदगी में जगह जगह इस सिद्धांत की धज्जियां उड़ाते है।

जब तक साधनों का विकास कम हुआ तब तक “चोरी” शब्द एक शर्मनाक कार्य होता था और नैतिकता की प्रमुख तीन कसौटियां सत्य, ईमानदारी, और चोरी न करना हर व्यक्तित्व की पहचान तय करते थे। आज के प्रचार और प्रसार के साधनों तथा अनैतिक अर्थ की चाह ने इन तीनो गुणो को वचन की सत्यता, आत्मिक ईमानदारी और व्यवहारिक तत्व कभी भी चोरी न करना को हमसे सदा के लिए क्षीणने का प्रयास में लगे है। समय था कभी किसी भी खाद्दय वस्तु को उपयोग में लाने से पहले अगर कोई नुकसान पहुंचाने वाली वस्तु नजर आती तो उसे चुनते पर आज के अर्थ तन्त्र से त्रस्त दुनिया में किसी के पास समय नहीं है कि वो इस पद्धति को अपनाये। आजकल हम उन ब्रांडों पर ही ज्यादा विश्वास करते है, जिनका प्रचार वो लोग सिर्फ अर्थ के लिए करते है, परन्तु स्वयं उनका उपयोग करते ही नहीं, न ही उन्हें उनकी गुणवता का मालुम होता है। इसलिए हम चलते चलते हम यह जरूर कह सकते है, बधाई “अर्थ तन्त्र” तुम्हारे अनैतिक मन्त्रों ने मानव जाती को शून्यमय करने कार्य शुरु कर दिया और प्रथम जीवन अस्तित्वमयी तत्व सच्चाई, ईमानदारी और विश्वास को कर ढेर, चोरी को बना दिया बर्बर, खूंखार साहसी शेर…लेखक कमल भंसाली

😎मूल्यांकन स्वयं का 😎 कमल भंसाली

“पंकेविर्ना सरो भाति सभा खलजनै विर्ना ।
कटुवणैविर्ना काव्यं मानसं विशयैविर्ना “।।
यानी सरोवर कीचड़ रहित हो तो शोभा देता है, दुष्ट मानव न हो तो सभा, कटु वर्ण न हो तो काव्य और विषय न हो तो मन शोभा देता है। हम चाहे, तो इस श्लोक को मनुष्यता की संक्षिप्त अदृश्य परिभाषा मान सकते है। ज्यादातर दर्शन के ज्ञाता कहते है, जीवन को न समझना भी जीवन है, परन्तु उनकी नादानियों से जग जीवन को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। सारा संसार आज कई तरह की मानव- नादानियों से त्रस्त हो रहा है, कहना न होगा हम भी कुछ इस तरह के हालातों से गुजर रहे है। इसका एक ही कारण है, इंसान का स्वयं को न समझने की कोशिश और बहुमूल्य जीवन को बिना मूल्यांकित किये जीना ।

दुनिया में इंसान से ज्यादा समझदार प्राणी शायद ही अभी तक कोई हुआ है, कठिन से कठिन काम करने की काबिलियत उसमें पायी जा सकती है। परन्तु एक सवाल का उत्तर आज भी सहज नहीं प्राप्त किया जा सकता वो है, क्या इंसान स्वयं को जान सकता है ? ये ही एक क्षेत्र है, जिसका आज तक कोई सन्तोषजनक जबाब नहीं दिया जा सका और बहुत सारी शंकाओं के कारण इन्सान इसको तलाशने की कोशिश से बचना भी चाहता है। अलबत्ता यही कहा जाता है कि आदमी सब कुछ जान सकता है, परन्तु खुद को पूर्ण रुप से नहीं जान सकता। क्योंकी, स्वयं को जानना एकदम आसान नहीं होता, दूसरों के बारे में राय आसानी से बनाली जाती है, पर बात जब स्वयं पर आती हो, तो बगले ही झांकी जा सकती है। इसका यह भी कारण पूर्ण उचित नहीं लगता कि हम स्वयं को नहीं जान सकते क्योंकि स्वयं से हर आदमी अपनी क्षमताओं से ज्ञानित होता है। आज के दौर में नहीं जानने का एक प्रमुख कारण स्वयं के अंदर तक तलाशने के लिए समय की कमी का होना है। शास्त्रों और खासकर गीता जैसे महाउपदेशक पवित्र ग्रन्थ को अगर सन्दर्भ बनाये, तो यह कहना उचित होगा की जीवन बिना आत्मिक चेतना के व्यर्थ है, और इस जन्म के बाद वो कितना उपयोगी होगा कहना कठिन है। आचार्य रजनीश ( ओशो ) के अनुसार “जब हम अपने अस्तित्व का बोध करने लगते है तो सारा संसार हमारे लिए सर्वथा नये रुप में जीवंत होने लगता है”।

जीवन क्षेत्र की यात्रा करते करते शायद हर इंसान कभी अपने आप से यह प्रश्न जरुर करता होगा क्या वो स्वयं को भी जानता है क्या ? क्या वो वही है ? या कोई उसका दूसरा स्वरुप भी है। हम अपनी किसी असफलता पर जब दुःख और निराशा के अंतर्गत जी रहे होते तो हमारा चिंतन कुछ अंतर्मुखी हो जाता है। हम अगर उस समय सफल होने वाले इंसान के समर्थ गुणों का अवलोकन कर अपनी कमियों को सुधारने का प्रयास करते है, तो निसन्देह यह एक उत्तम प्रयास है, अपने आप को जानने का पहचानने का। समझिये हम अति क्रोध के कारण असन्तुलित होकर कुछ गलतिया कर रहे है, और किसी सफल इंसान का शांत चेहरा हमारे सामने दृश्यत् हो रहा है तब हमें संभलने का यह संकेत स्वयं ही प्राप्त हो जाता है, कि हमें शांत रहने की कोशिश करनी चाहिए, जीवन में सफल होने के लिए। इस अनुभूति को भी हम स्वयं को जानने के प्रयास के अंतर्गत ही मानना चाहिए, क्योंकि हर मानसिक कमी स्वयं को स्वयं द्वारा जानने की कोशिश के लिए बाधक होती है। किसी ने कहा भी है ” Sometimes it is better to remain silent and appear a fool, than to speak and remove all doubt”।

स्वयं को जानने की प्रक्रिया को समझने से पहले हमें इस तथ्य को प्रमुखता देनी सही होगी की हमें दो अस्तित्व के सिद्धांत पर बनाया गया है। एक अस्तित्व शारीरिक व दूसरा आत्मिक, हालांकि दोनों को पूर्ण रुप से समझे हर प्राणी, यह जरूरी नहीं। धार्मिक शास्त्रों में शरीर के स्वरुप को सात धातुओं का समिश्रण भी कहा गया है। वो है, रस, खून, मांस, मेद, मज्जा, अस्थि और शुक्र। शायद यही वजह होगी इंसान उसकी हर तरह की जरूरतों से अपरिचित नहीं रहता। सिर्फ शरीर पर आश्रित प्राणी में इंसान नहीं आता क्योंकि वो विधाता की अंतिम सर्वश्रेष्ठ कृति है, शायद अभी तक की। उसको दूसरे प्राणीयों से कहीं जगह अलग किया गया है। उसके पास शरीर बोध की क्षमताओं के साथ कर्म की गुणवता बोध की भी क्षमता होती है। निश्चित है, उसके जीवन का मूल्यांकन भी सब प्राणीयों से अलग होता होगा। कहते है इंसान शरीर से ज्यादा मन या आत्मा से कम प्रभावित होकर जीवन ज्यादा बिताता है, हाँ, कभी कभी शरीर की ही नहीं आत्मा की जरूरतों को भी समझने की कोशिश जरूर करता है।

युग के अनुसार शरीर की चाहते भी बढ़ती गई और भौतिकता का दबदबा भी शरीर पर ज्यादा शासन करने लगा। आज इंसान का शरीर हसरतों का खिलाड़ी बन गया जिसमें तेजी और रोमांच ज्यादा है। जब कोई बात आत्मिक अस्तित्व बोध की कहीं आती है, तो शरीर की लाचारी हमारी मजबूरी बन जाती है। ऐसा लगता है, हमारी सारी चेतनाये भौतिक सुखों की उपलब्धि के कारण कमजोर हो गई है। हम बहुत बार ये कहते नजर आते है कि हमें मंजिल कि चाह है, हम जीवन के हर क्षेत्र में सफल होना चाहते है। पर हकीकत यही है, हमें पूर्ण सफलता की नहीं भौतिकवादी सफलता की ही चाह ज्यादा होती है, और उसका रस्वादन करने के बाद दूसरे क्षेत्रों की सफलता हमारे नयनों से दूर हो जाती है, जब तक हमें जर्जर, क्षीण होती काया का अहसास नहीं होता, पर तब तक बहुत देरी हो चुकी होती है।

सांसारिक सफलताओं के मायने इस संसार में हम जब तक रहते है, तब तक ही हमारे लिए महत्वपूर्ण होती है। जिन सफलताओं से हमारा रुतबा समाज, देश, और विदेश में बढ़ता है, कहना न होगा हम ज्यादातर समय उनके लिए अर्पित करते है। जीवन की भी मजबूरी होती है, उसे भी समय या काल की गति के साथ सामंजस्य बिठाने का। दैनिक जीवन में शारीरिक धर्म की सबसे बड़ी खासियत यह ही होती है वो अपनी आवश्यक जरूरतों की पूर्ति के लिए हम से कुछ समय अपनें लिए स्वयं ही ले लेता है। शायद यही कारण है कि कुछ धार्मिक सिद्धान्तों का निर्माण इस तथ्य के अंतर्गत हुए कि आदमी ज्यादातर शरीर का दास है और इस दासत्व का विरोध करने से आत्मा के प्रति इंसान की चेतना जागरूक रहती है।

शरीर को जो विशिष्ठ और शिष्ट बनाना चाहती है वो आत्मा ही होती है, मन के सारे चंचल द्वार आत्मा ही बन्द कर सकती है। एक अच्छा मानव बनना शरीर की प्राथमिकता होनी चाहिए क्योंकि संसार सर्वोत्तम को ही ज्यादा गले लगाता है।

हमारी चिंतन की धाराए जब सफलताओं की चाहत करती है तब हम अगर उन सफलताओं की मंजिल में इस पार और उस पार के प्रति हमारे कर्तव्यों को समाहित कर अगर अपने कर्मक्षेत्र को तय करते है, तो यकीनन यह हमारे अपने अस्तित्व का सही मूल्यांकन का एक रास्ता हो सकता है। इस बात से बेपरवाह होना ठीक नहीं कि तन की अवधि के बाद हमारी सफलतायें आगे का सफर नहीं करती। हां, उन सफलताओं को जिन्हें हम बिना आत्मा के स्वीकृती या उसके विरुद्ध की है उन को हमारी अजनबी सूक्ष्मता कभी भी आगे के सफर में साथ नहीं ले जा सकती। यहां हम अजनबी सूक्ष्मता आत्मा को समझे जो इस संसार के बाद की यात्रा करने का वीजा रखती है, परन्तु यह सुविधा सात तत्वों से बने तन को नहीं नसीब होती।

इंसान का दुश्मन न तो तन है न ही मन, उसका चिंतन जब तक विवेकपूर्ण रहता है, तब तक उसके शरीर, मन और आत्मा की गति में स्फूर्तिमय जीवन जीने की चाह बनी रहती है, और शायद यही जीवन सार है।
जब तक हम इस सन्दर्भ में और आगे बढ़ने की तैयारी करे हमें इस अंग्रेजी लेखक के निम्न कथन पर गौर करना चाहिए ” As the day wears to evening deepens into night, can you look back over the walking hours and recall something you have said or done that was really worthwhile ? That’s good. You can’t ? Why –Francies Gay.

लेखक: कमल भंसाली

💏वक्त की शायरी💑 कमल भंसाली

सनम तुम्हीं से ही की मौहब्बत तुम्हें ही दिल दिया
तुम्हीं न समझे सदा हमें अंदाजे दर्द सदा ही दिया
न जाना हाल हमारा कभी कितना दिल घायल हुआ
बेवफा कहके बदनामी का बदगुमां तौहफा दिया
💘💘💘

कभी न भूले सनम, दस्तूर मौहब्बत को भी परखती
बेपरवाह प्यार किया है तो इल्जामों की क्या हस्ती
इंतहा मौहब्बत की होती तो दिल की मायूसी बढ़ती
बेचैनियों को भी थोड़ी जगह टूटे दिल मे मिल जाती
💗💗💗

भूल गए हम जिंदगी में देखा था कोई हसीन ख्बाब
तजाबुज़ हसरतों पर वरना हम न होते इतने बेताब
ख़्वाईसे दिल की भी वक्त के अनुसार बदलती रहती
कभी जिंदगी तन्हाई में भी प्यार की सरजमी ढूंढती
💔💔💔

दिलवर थे तुम कभी भूल जाये अगर दिल ये नादां
तो कभी जख्म कोई याद न करेंगे रहा अपना वादा
तकब्बुर तुम्हारा तुम्हें मुबारक, करते दुआ ए खैर
मौहताज न हो तेरी जिंदगी कभी बिना कोई यार
💕💕💕

जश्न हजार मनाओं पर मंजिलों पर कभी न इतराओ
वक्त के बदलते रवैये को जरा जिंदगी को समझाओ
आज की हंसी पर जरा गंभीरता की चादर ओढाओ
गम का सफर शुरु हो उस से पहले संभल जाओ
💖💖💖

फूल हो या कांटे जिंदगी कभी छांट ही लेती
बदलते जमाने मे मौहब्बत भी रंग बदल लेती
सदा किसी का कोई हों, गये वक्त की दास्तां लगती
जीना जरुरी साहब, दिल को हार मंजूर नहीं होती
💓💔💔💓

रचियता✍ कमल भंसाली

🌻आज🌻 ✍ कमल भंसाली

” आज ”

दिन का सफर
जब भी शुरु करता
मुस्कराकर अपने
आप से कहता
“आज” मेरा अच्छा
दोस्त बन जा
कल तुझे याद करुंगा
नाम जग में तेरा
जरुर प्रकाशित करूंगा
मेरा “आज”
मुझ से ही बोल गया
तेरी यह बाते
अब अच्छी नही लगती
जो तूं कहता
कभी वो नहीं करता
सच कहता
तुमने कभी
मुझे समझा ही नही
हकीकत यह
मेरी कीमत जानता ही नहीं
सिर्फ जग में दावा करता
मुझे महत्व देता
जब मैं बीत जाता
“तो”
बेशर्मी से मुस्करा कर रह जाता

समझ होती तो
कुछ ऐसे कर्म करता
मेरे रोम रोम में
बस जाता
जग में तुम मुझे
क्या प्रकाशित करता !
मै हीं तुम्हें हीरों की तरह
तराश कर
जग को सोंप देता
मेरे भाई
बुरा में किसी के लिये
सोचता ही नहीं
सब कुछ सब के लिये
बना में हर एक के लिए
अपना कर्तव्य ही निभाता
आज होकर भी कल में समा जाता
इसलिए जग मुझे भूल नहीं पाता
तासीर सबकी यही
यह अलग बात
सबके अपने अलग अलग कर्म
उनका अपना जीवन धर्म
जो इसे सत्य समझे
तो उनकी जीत
बुरा समझे तो शायद
“आज” भी उनकी हार
चाहे करे या न करे स्वीकार
फिर भी
तुम्हारा प्रस्ताव
“आज” के लिए मुझे स्वीकार ……..रचियता✍कमल भंसाली

👄तल्खियां💋✍ कमल भंसाली

तल्खियां तमाम उम्र यही रही
जिंदगी आहों में सिमट गई
हर अहसास के आहट तले दब कर
सिर्फ साँसों की मोहताज रह गई

माना दर्द की धूप बड़ी तेज होती
उसमें तड़पती घुटन की उमस होती
अपनत्व की छांव में भी पैर जल जाते
फिर भी मै कहता रहता जिंदगी से
“तूँ इतनी क्यों परेशां है ” ?

आज नहीं तो कल हवाओं का रुख भी बदलेगा
मौसम कभी तो शीतलता का अहसास करायेगा
कल का सबक कभी तो सही राह को अपनायेगा
दर्द के अंधेरे आशियाने में दिल तब नहीं घबराएगा

दर्पण टूट भी जाये तो भी चेहरा कुछ दिखा जाता
कोशिश करने से हार का रुख भी राह बदल लेता
मुस्कराना सीख ले दिल हालात का मन बदल जाता
जरुरी नहीं हर सफलता से जीवन संभल कर चलता

जिन्दगीं की राहों में आशाओं के गुलशन बनाये
फिर उनमें कर्म से कोशिशों के पेड़,फूल लगायें
फल, फूल कुछ भी पाये पर काटों से न घबराये
तल्खियां तमाम उम्र की सदा, उन्हें गले क्यों लगाये

फलसफा जीने का इतना ही जग के लिए अपनाओ
खुद मुस्कराओं फिर उन्हें गैरों के चेहरे पर सजाओ
गिला नहीं जिंदगी से,मंजिल सिर्फ मेरा मकसद नहीं
जो भी बचा,लगता है अब भी वो किसी से कम नहीं

रचियता: कमल भंसाली

🌸जन्मदिन तुम्हारा 🌸खुशियां मेरी💕कमल भंसाली

“जन्मदिन” बहुत ही मंगलमय दिन होता है, वो भी जब सुख दुःख में साथ निभाने वाले हमसफ़र का हो। शुक्रगुजार हूं, उसका, जिसने शायर को मेरे लिए धरा पर भेजा। साथ चलने वाले को तौहफे नहीं मंजिल की चाह होती है। कहना न होगा, हम दोनों ने एक सार्थक जीवन को ही अपना उद्धेश्य बनाया और भगवान से प्रार्थना है, शायर को सुखी, सम्प्नन और स्वस्थ रखे। बताना जरुरी है, वो कमल काव्य सरोवर में मेरी प्रकाशित करने योग्य रचनाओ के सम्पादन का कार्य भी करती है। अतः फर्ज बनता है उपहार स्वरूप कुछ पंक्तिया आपके साथ उसके प्रति मेरी भावनाओं की सांझा करना।उसे आशीर्वाद दीजिएगा,और स्वस्थ स्वास्थ्य की दुआ कीजियेगा। * कमल भंसाली

साथी मेरे
जन्मों के बन्धन तक
साथ साथ चले
नील गगन तले
मांगी है दुआएं आज हमने
सजे तुम्हारे सब सपने
जन्म दिन तुम्हारा
हमें लगता दिल से प्यारा
तुम जियो हजारों साल
हर साल हो तुम्हारा बेमिशाल
साथी हो इस जन्म के मेरे
सब जन्मों में हो इस बन्धन के फेरे
साथी मेरे…

साथ तुमने हर कदम पर निभाया
हाथ पकड़ा जब भी कदम कोई डगमगाया
बन्धन की सार्थकता में सदा विश्वास लगाया
खुद्दारी तुम्हारी देख मन हरदम खिलखिलाया
जीवन की वीणा को अपनेपन के हर सुर से सजाया
रिश्तों के गुलशन में दीप अपनत्व का रोज जलाया
साथ मेरा तुमने कितनी सहजता से साथ निभाया
साथी मेरे ….

उपहार तुम्हें दूं ऐसा कुछ मेरे पास नहीं
प्रेम से ज्यादा की तुम्हे कोई चाह नहीं
शुक्रिया साथ जो तुमने अब तक निभाया
स्नेहभरा जीवन जो तुमने सदा अपनाया
साथी मेरे….

कहता है दिल, साथी साथ साथ चल
मेरे साथ सदा योंही हो सके तो बिना रुके चल
जन्मदिन की मंगलकामनाओं के साथ सहज चल
शुभकामनाओं सहित गुजरे हर पल,कहता “कमल”
साथी मेरे….
💕HAPPY BIRTH DAY💕 💝 कमल 💝