❤️सक्षम जीवन❤️ कमल भंसाली

शास्त्रों के अनूसार, जीवन सब जीवों को अवधि प्रदान ही मिलता है, इस अवधि के सफर में ही हर जीव शरीर, मन और आत्मा से अर्जित अपने कर्मों के फल से दुःख और सुख का अनुभव करता है। इंसान ही एक वो प्राणी है, जो हर जीवों में सर्वश्रेष्ठ है। इंसानी शरीर और उसकी क्षमताओं पर गौर करने से यह बात सहज और सरलता से समझ में आ भी जाती है। परन्तु, इंसान की एक ही कमजोरी है, वो वर्तमान से ज्यादा भविष्य को महत्व देता है, परन्तु नहीं ज्ञान करता कि वर्तमान का सही आनन्द तो वही उठा सकता, जो जीवन की सीमितता में अपनी क्षमताओं अनुसार भविष्य के पथ पर संयम से आगे बढ़े। समय के कालचक्र की गति पर हम अगर शोध करे तो यह बात हमें सहज समझ में आ सकती कि पिछले कुछ दशकों में हम जीवन को चलकर नहीं दौड़ते हुए जी रहे थे, जो जीवन नियमों के विरुद्ध थे।

कहते है, समय के पास जीवन को दुरस्त करने के सब तरह के उपाय होते है, इसका साक्षात परिणाम हम वर्तमान में अनुभव भी कर रहे है। हमेशा दौड़ की फिराक में रहने वाला मानव जीवन आज सहम कर रुक गया है। कुछ समय पहले की ही तो बात है, जब बिना मकसद कोईं किसी से मिलने से कतराता था। आज समय है, परन्तु मिलना वर्जित जैसा हो गया है। जिस शरीर को हम मशीन बना चुके थे, आज वो हमें उसके महत्वपूर्ण होने का अहसास दे रहा है। प्यार की परिभाषा में दो गज की दूरी ने अपना अस्तित्व बोध स्थापित कर दिया है। हम विशिष्ठ है, हमारा यह अंहकार भी चूर चूर हो चूका है।

अगर हम काल के इतिहास पर गौर करे तो ये समझने में क्षण की भी देरी न होगी इंसान कि भोग विलास और आराम के साधनों को ज्यों ज्यों ईजाद करता रहा, प्रकृति ने भी अपनी पीड़ा का कई तरह की बीमारियों और आपदाओं द्वारा अहसास कराना चाहा। इसका एक ही प्रमुख कारण जो नजर आता वो नैतिकता का पतन, चाहे वो प्रकृति के संदर्भ हो या उसमें रहने वाले प्राणियों के लिए। इंसानी फितरत की भी एक अजीब दास्तां है, वो सुधार की बात भी करता है, दूसरों को सुधारने के लिए तत्पर भी रहता, पर बात जब स्वयं की हो तो लाचार हो जाता, अपनी ही आदतों के कारण, जिनके बिना वो सोचता जीवन सिर्फ उसको ही बख्श देगा अगर वो गलती करेगा।

शास्त्रों के अनुसार ईश्वर ने अपने अंश में से पांच तत्व भूमि, गगन, वायु, अग्नि, जल का समावेश कर मानव देह की रचना की और उसे शांति और सदभावना से जग में अपने होने का अस्तित्व बोध कराने की नसीहत दी। धरती पर आते ही इंसान उसकी नसीहत भूल गया और अपनी देह को अपनी समझ अनुसार अच्छे बुरे कर्मों में लगाने लगा। उसका फल ईश ने इस देह की सीमा तय कर दी। इस सीमा के अंतर्गत ही इंसान सुख और दुःख का अनुभव कर लेता है। सुख और दुःख जीवन रूपी एक सिक्के के दो पहलू है, अवधि अनुसार वो अपने पहलू बदल लेते है। ईश्वर की इस नायाब संरचना को जो सही समझ लेता, वो दुःख में भी सुख का अनुभव कर लेता।

ये कोरोना काल हकीकत में कुछ नहीं इंसान की नाजायज सोच की कमजोरी है, अपने स्वयं के अहम् की हार है। अहंकार से खोखली हुई मानवता के बिखराव में ये जीवाणु, बिना किसी सही प्रतिरोध के पुरे संसार में फैल गया, हुई न वो ही बात की चींटी ने हाथी को झकझोर दिया। हमारी जीवन शैली पर गौर करे तो बात सहज में समझ में आतीं है, कि हमनें कभी जीवन का महत्व ही नहीं समझा। भोग के रोग में कमजोर हुई काया कब तक इस वायरस का प्रतिरोध करती। प्राणों पर बन आई तो योग और शरीर की प्रतिरोधात्मक क्षमता का ख्याल आया। शायद ये वायरस भी आधुनिक है, उसने भी हर दिन अपना रंग ढंग बदलना शुरु कर दिया।

जो भी हो, वास्तिवकता से मुंह मोड़ना तो अच्छा नहीं होगा, जीवन को तो आगे बढ़ना होगा, हर समस्याओं को किसी नकारत्मक चिंतन से हल नहीं किया जा सकता। तो फिर क्या करे ? उत्तर को खोजना नहीं पड़ेगा, सिर्फ अपने अंदर के सोये मानस को जगाना होगा। कैसे ? स्व- चेतना को नव स्वरुप से सजाना होगा। अपनी कमजोरियों को जानना होगा, जांच परख कर कुछ नियमों को मन से अंगीकार करना होगा। आगे बढ़े, उससे पहले हम इस वाक्य पर अंतर्मन से गौर करना पड़ेगा । ” Although the world is full of suffering, it is also full of the overcoming of it. (Heleen Keller)
उपरोक्त संदेश का सार स्पष्ट है, निराशाओं को नहीं आशाओं को जिंदगी में जगह दीजिये, निश्चित है, जीवन कल्याण की ऐसे ही शुरुआत होती है।
लेखक: कमल भंसाली

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