💝महफ़िल तुम्हारी जन्नत हमारी💝 ✍कमल भंसाली

“महफिल सजी देखकर तुम्हारी
दिल तो कहता ठहर जाने को
थमती सांसों की कीमत चुकानी भारी
वक्त भी कहता महफिल छोड़ जाने को”

भुलेंगे नहीं हसीन अदाएं, तुम्हारी गुस्ताखियां
ये कनात, ये शहनाइयां और अधूरी मस्तियां

ये महफिले मिले आगे
ख्वाईस ये लेकर जाएंगे
तुम इंतजार न करना
अब जन्मों की है बात
माफ करना बची यही आखरी रात
जिसमे है थोड़े अधूरे बिगड़े अफ़साने
अदद नफस और बचे बिखरे से जज्बात

प्यार जिन्दगी को हमने बहुत किया
मौहब्बत पर ही सदा एतवार किया
गम को भी सिलसिले वार इकरार से जीया
कभी खूबसूरत हुए लम्हों को भी याद किया
तुम्हारी बेवफाई को दिल न माना उसे भी गले लगाया
हर नग्मों से इस महफ़िल को भी सजाया

कल को हमने नहीं देखा
कल तुम हमें न देखो
हसीन वादियों में उठे जब धुंआ
समझना कुछ न कुछ तो हुआ

हम न हो पर महफ़िल सजाकर रखना
दौर वो ही रहे, एक जाम जरा बचा कर रखना
आरजू रब से करना दरवाजा मधुशाला का खुला रखना
बची प्यास की कसम वापिस आने की फरियाद न करना

फुरकत में न हो गफलत उल्फत हो हमारी बरकत
राहबर शबनम की आब सी आरजू हो मेरी मन्नत
रब ही अब आशना, नाखुदा परेशां हो मेरी यह जन्नत
अहलोदिल गम न कर, तेरा मुस्कराना अब जहां की मालियत
रचियता : कमल भंसाली

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