💕जिंदगी का मन💕 ✍कमल भंसाली

एक किताब है “जिंदगी”
लबालब आस्थाओं से भरी
पर अपने ही मन से
रहती सहमी और डरी
कर्म पथ की जब भी करती अवलोकन
सामने आकर खड़ा हो जाता मन
मंजिल की चाहत में
सब कुछ दाव पर लगाती
पर मन की करतूतों से हार जाती
पर अपनी हार पर जिंदगी कभी अफ़सोस नहीं करती
मन ही थक हार जाता
वो तो सदा प्रयास ही करती
ऐ जिंदगी तुझे सलाम

कब रुकी वो कब झुकी कभी
वो याद नहीं करती
राह है कैसी भी हो
सदा उसी पर ही चलती
किस पर कैसे चलना
यह मन तय करता
इसलिए वो जीने मरने से भय करता
ऐ जिंदगी…

किसने प्यार किया !
किसने इंकार किया !
किसने दिल को दर्द दिया
किसने गहरा घाव दिया !
किसने दिल को प्रेम दिया!
फर्क कभी वो नहीं करती
सब कुछ सहन करती
विद्रोह तो मन ही करता
ऐ जिंदगी ….

आश निराश दोनों के जल को पीती
फर्क नहीं अपने आंसुओं का करती
ख़ुशी और गम दोनों से ही
अपनी पलके सींचती
सुख दुःख दोनों धूपछांव में जीती
सत्य के दायरे में रहकर
कभी कभी झूठ को भी गले लगाती
अस्वीकार की राजनीति तो मन करता
ऐ जिंदगी…

भली भांति
वो सब कुछ जानती
जीना है इस जहां के दस्तूरों में
रहना है अतृप्ति भरे अंधेरो में
मुस्कराहट अधरों पर रहे
प्राणों भरी देह सदा संस्कारित रहे
जिंदगी, अपने जीने के हर अंदाज पर गर्व करती
समय आने पर मृत्यु का भी स्वागत करती
मन ही हार कर
अपने अफ़सोस को समृद्धि समझता
अपने ही बनाये अतृप्त सरोवर में डूब जाता
फलसफा इतना ही समझ में आता
जिंदगी को तो सदा जीना ही आता
मन ही विचलित हो राह भूल जाता
ऐ जिंदगी…

रचियता✍ कमल भंसाली

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