🐵सत्य और ईमानदारी की मजबूरी बन गई शेरनी🐯 चोरी 🐯 कमल भंसाली

दुनिया एक सच है, परन्तु झूठ के रोग से भयंकर ग्रस्त है। कहीं भी जाये दूर दूर तक झूठ का साम्राज्य फल फूल रहा है। अब तो नोबत यहां तक आ गई कि सच बोलने से कतराना ही सही लगने लगा। आज अगर कोई सच बोलकर जीने की कोशिश करता भी है तो समझ लीजिये झूठ बोलने वाले लोग उसका जीना दूभर कर देते है। भारतीय परिवेश की बात करे तो सच नदारद होता नजर आ रहा है। एक आकर्षक झूठ जितनी सहजता से प्लेटफार्म बना लेता शायद एक शुद्ध सच उतने ही दुश्मन। सवाल उठता है, नैतिकता का यह तत्व सच हमारी जिंदगी से क्यों आहिस्ता आहिस्ता विदाई ले रहा है ? इसका जो प्रमुख कारण अगर हम तलाशे तो शायद यह कह सकते कि इंसान को अपनी नैतिकता पर भरोसा नहीं रहा या फिर उसका सही जीवन दर्शन पर भरोसा कम हो गया है। पर तथ्य की बात है, सत्य कभी हार कर अस्त नहीं होता, हाँ कुछ देर के लिए कहीं ठहर जरुर सकता है।

इस सन्दर्भ में एक घटना का उल्लेख करना यहां सही होगा कि जब आज की तरह संचार सुविधाओं का इतना प्रभाव आदमी की जिंदगी पर नहीं पड़ा था तब मिश्र में रेडा डिफ जो एक टैक्सी चालक की नौकरी करता था तो उसने अपनी गाड़ी की पिछली सीट पर एक बण्डल को पड़ा देखा और उसमें उसको 12000 पौंड की रकम लिपटी मिली। शायद यह रकम उसके अंतिम ग्राहक की लापरवाही का परिणाम थी। डिफ की लड़की किसी गंभीर बिमारी से उस समय जूझ रही थी और रकम की कमी के कारण वो उसका इलाज ठीक से नहीं करा पा रहा था। निसन्देह यह रकम उसके लिए वरदान हो सकती थी परन्तु ठहरे हुए इस सत्य ने उसे विचलित नहीं किया और उसने तत्काल स्वच्छ आत्मिक निर्णय लिया। जिस होटल में उसने अपने ग्राहक को उतारा वहां वापस जाकर उस ग्राहक को ढूंढ कर रकम को वापस कर दिया। इस सच्चाई की सांसारिक कीमत भी उसे चुकानी पड़ी । उसी दिन उसके मालिक ने गाड़ी को बिना ग्राहक के चलाने के कारण नौकरी से निकाल दिया और सही इलाज के अभाव में उसकी लड़की के प्राण चले गये। परन्तु, भाग्य से एक रेडियों रिपोर्टर को इसकी खबर मिली और समाचार की जानकारी पाने के बाद उस समय के तत्कालीन राष्ट्रपति ने उसे एक नई गाड़ी प्रदान की और दूसरी जरूरतों में उसकी मदद की। उसकी इस सच्चाई भरी ईमानदारी ने डिफ को स्वयं की गाड़ी का मालिक बना दिया, अब वह स्वयं एक मालिक था। इस सच्ची घटना के अनुसंधान का परिणाम इतना निश्चित है कि हर निर्णय का स्वयं के सन्दर्भ में मूल्यांकन करना और उसी अनुसार निर्णय लेना आत्मिक विश्वास की श्रेष्ठता होती है। कुछ खोना और पाना यह स्वयं ही निर्धारित होता है पर इससे हमारी श्रेष्ठता की पहचान दुनिया एक दिन स्वयं प्राप्त कर लेती है। जीवन के क्षेत्र में Bernard Glipson का यह कथन ” If it be right, do it boldly; if it be wrong, leave it alone”. काफी सार्थक अर्थ से समाहित है।

जीवन की कई दृश्यत् और अदृशत घटनाओं से हम यह भी अहसास कर सकते है कि जरूरी नहीं सत्यता हर समय हमें सुख का अनुभव कराये, कभी कभी तो सत्यता के कारण आत्मा को असहनीय दुःख का भी अनुभव हो सकता है। आपसी रिश्ते जहां विश्वास की मात्रा की जरुरत ज्यादा होनी चाहिए, देखा जा सकता है, आज सबसे ज्यादा अविश्वासनिय महसूस हो रहे है। इस अवलोकन का चिंतन करने से इस अहसास को भी हमें जगह देनी कि आजकल जीवन अक्सर झूठ के दामन में ही फलफुलता है, और कहीं कमजोर हुई आत्मा सत्य को कमजोरी भी दे सकती है। हमें अपने पारिवारिक और सामाजिक जीवन के सन्दर्भ में अलबर्ट आइंस्टीन के इस कथन से पूरी तरह सहमत होना चाहिये, ” Whoever is careless with the truth in small matters cannot be trusted with the important matters.”।

सत्य से जुड़ा एक और शब्द “ईमानदारी” जीवन के सुखों की इमारत की नींव होती है, यह एक पराक्रांत तथ्य है और इसकी परायणता पर सन्देह उचित भी नहीं है। इस तथ्य की जांच हम संसारिक रिश्तों के सन्दर्भ में भी कर सकते है । मसलन पारिवारिक सम्बंधों को ही ले जो आज ईमानदारी को तरस रहे है और अनचाहे झूठ के शिकार हो रहे है । जीवन को गहनतम तनाव का उपहार देकर उसे जर्जर और कमजोर कर रहे है। इसका सीधा साधा कारण यही नजर आता है परिवार में सबकी अपनी अलग अलग महत्वकांक्षाओं को महत्व देना और परिवार की तत्कालीन जरूरतों के प्रति उदासीनता रखना। करीबी रिश्तों की क्या बात करे, वो तो सांसों के भी दुश्मन नजर आने लगे है। उनके लिए अपनी महत्वकांक्षा को हासिल करना ही प्रमुख होता है,। पूर्ण सत्य के अभाव व झूठ के सहारे वो अपने उद्धेश्यों को नये नये सपनों को मालिक बनाकर स्वयं ही उनके गुलाम हो जाते है।

इंग्लिश भाषा का एक शब्द है “FIDDLE ” जो आज के जीवन का प्राय्य बन गया है, जिसे आज के युग ने जीने की कला के रुप में स्वीकार भी कर लिया, अब ऐसा महसूस भी होने लगा है। इस शब्द का अर्थ होता है, ” to act dishonestly in order to get something for your self or to change something dishonestly, especially to your advantage.”। अगर वर्तमान परिस्थितयों पर हम अपनी ही ईमानदारी से स्वयं का अवलोकन करे तो लगेगा हम इस रोग से ग्रस्त हो चुके है। जीवन के सन्दर्भों के तहत बात करे तो हर देश, जाती, समाज, परिवार भी इस रोग से ग्रस्त हो चुके है। इस रोग की विशेषता यही है कि यह आत्मा में इतना निज स्वार्थ भर देता है की सत्य की बात तो मामूली सी लगती है ईमानदारी को भी इतनी दूर भेज देता कि मरने से पहले तक याद भी नहीं आने देता। हालांकि, अंतिम क्षण जीवन के बहुत कठोरता से उसे सत्य की वेदी पर इस अहसास की असहनीय पीड़ा देते है कि उसने सांसारिक सुखों की प्राप्ति के लिए आत्मिक पवित्रता का बलात्कार जैसा जघन्य अपराध किया है और जिसकी सजा उसे अनिश्चित रुप में चुकानी है। न्याय के इस सिद्धांत पर विश्वास हमें एक दिन करना ही होगा की ‘पीड़ा की सजा पीड़ा ही हो सकती है’। गलत तरीको से पायी सम्पति हो, प्रसिद्धि हो या और कुछ सांसारिक उपलब्धि एक क्षणिकता के सुख स्वरूप मात्र का अहसास है, पर उसकी कीमत कितने जन्मों तक किस रुप में चुकाई जायेगी यह तय वही करता है जिसने हमें इस धरा पर अपने कुछ पवित्र उद्देश्यों को अंजाम देने के लिए भेजा है। इस सत्य से कोई भी अपना आँचल नहीं बचा सकता।

इस चर्चा के तहत “चोरी” भी एक सच्चा दोस्ती जनक शब्द है, और मानव स्वभाव का एक अच्छा दोस्त, जो बचपन से ही हमारे व्यक्तित्व में अपना स्थान पका कर लेता है। हम अपने बचपन को अगर याद करे तो शायद कई ऐसी घटनाये हमारे दिमाग में होगी जब हमने अपने माता-पिता या और किसी से छुपा कर कोई टॉफी, कुछ खुदरा वस्तुओं को अनजाने बिना उन्हें मालुम पड़े ले ली इस तथ्य के अंतर्गत शायद और मांगने से नहीं मिलेगी। हम ये काम अनजाने में करते थे और जब तक नहीं पकड़े गये तब तक शायद यह अहसास ही नहीं हुआ कि ऐसा करना चोरी है। ‘चोरी’ शब्द से हमारा प्रथम परिचय बचपन में ही प्रायः हो जाता है, जब दूसरे की किसी वस्तु या और कुछ उनसे छिपा कर ले लेते या फिर प्रयोग करते तो हमें बताया जाता ऐसी हरकत को ‘चोरी’ कहते है। हमें शिक्षा भी दी जाती थी कि जिस वस्तु पर स्वामित्व हमारा नहीं और उसे बिना जानकारी और सहमति के हासिल नहीं किया जाना चाहिए। अगर हम वैसा करते है तो चोरी करते है और नीतिगत सिद्धांत यही है चोरी करना अपराध है, परआश्चर्य की बात है, आज हम पूरी जिंदगी में जगह जगह इस सिद्धांत की धज्जियां उड़ाते है।

जब तक साधनों का विकास कम हुआ तब तक “चोरी” शब्द एक शर्मनाक कार्य होता था और नैतिकता की प्रमुख तीन कसौटियां सत्य, ईमानदारी, और चोरी न करना हर व्यक्तित्व की पहचान तय करते थे। आज के प्रचार और प्रसार के साधनों तथा अनैतिक अर्थ की चाह ने इन तीनो गुणो को वचन की सत्यता, आत्मिक ईमानदारी और व्यवहारिक तत्व कभी भी चोरी न करना को हमसे सदा के लिए क्षीणने का प्रयास में लगे है। समय था कभी किसी भी खाद्दय वस्तु को उपयोग में लाने से पहले अगर कोई नुकसान पहुंचाने वाली वस्तु नजर आती तो उसे चुनते पर आज के अर्थ तन्त्र से त्रस्त दुनिया में किसी के पास समय नहीं है कि वो इस पद्धति को अपनाये। आजकल हम उन ब्रांडों पर ही ज्यादा विश्वास करते है, जिनका प्रचार वो लोग सिर्फ अर्थ के लिए करते है, परन्तु स्वयं उनका उपयोग करते ही नहीं, न ही उन्हें उनकी गुणवता का मालुम होता है। इसलिए हम चलते चलते हम यह जरूर कह सकते है, बधाई “अर्थ तन्त्र” तुम्हारे अनैतिक मन्त्रों ने मानव जाती को शून्यमय करने कार्य शुरु कर दिया और प्रथम जीवन अस्तित्वमयी तत्व सच्चाई, ईमानदारी और विश्वास को कर ढेर, चोरी को बना दिया बर्बर, खूंखार साहसी शेर…लेखक कमल भंसाली

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