😎मूल्यांकन स्वयं का 😎 कमल भंसाली

“पंकेविर्ना सरो भाति सभा खलजनै विर्ना ।
कटुवणैविर्ना काव्यं मानसं विशयैविर्ना “।।
यानी सरोवर कीचड़ रहित हो तो शोभा देता है, दुष्ट मानव न हो तो सभा, कटु वर्ण न हो तो काव्य और विषय न हो तो मन शोभा देता है। हम चाहे, तो इस श्लोक को मनुष्यता की संक्षिप्त अदृश्य परिभाषा मान सकते है। ज्यादातर दर्शन के ज्ञाता कहते है, जीवन को न समझना भी जीवन है, परन्तु उनकी नादानियों से जग जीवन को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। सारा संसार आज कई तरह की मानव- नादानियों से त्रस्त हो रहा है, कहना न होगा हम भी कुछ इस तरह के हालातों से गुजर रहे है। इसका एक ही कारण है, इंसान का स्वयं को न समझने की कोशिश और बहुमूल्य जीवन को बिना मूल्यांकित किये जीना ।

दुनिया में इंसान से ज्यादा समझदार प्राणी शायद ही अभी तक कोई हुआ है, कठिन से कठिन काम करने की काबिलियत उसमें पायी जा सकती है। परन्तु एक सवाल का उत्तर आज भी सहज नहीं प्राप्त किया जा सकता वो है, क्या इंसान स्वयं को जान सकता है ? ये ही एक क्षेत्र है, जिसका आज तक कोई सन्तोषजनक जबाब नहीं दिया जा सका और बहुत सारी शंकाओं के कारण इन्सान इसको तलाशने की कोशिश से बचना भी चाहता है। अलबत्ता यही कहा जाता है कि आदमी सब कुछ जान सकता है, परन्तु खुद को पूर्ण रुप से नहीं जान सकता। क्योंकी, स्वयं को जानना एकदम आसान नहीं होता, दूसरों के बारे में राय आसानी से बनाली जाती है, पर बात जब स्वयं पर आती हो, तो बगले ही झांकी जा सकती है। इसका यह भी कारण पूर्ण उचित नहीं लगता कि हम स्वयं को नहीं जान सकते क्योंकि स्वयं से हर आदमी अपनी क्षमताओं से ज्ञानित होता है। आज के दौर में नहीं जानने का एक प्रमुख कारण स्वयं के अंदर तक तलाशने के लिए समय की कमी का होना है। शास्त्रों और खासकर गीता जैसे महाउपदेशक पवित्र ग्रन्थ को अगर सन्दर्भ बनाये, तो यह कहना उचित होगा की जीवन बिना आत्मिक चेतना के व्यर्थ है, और इस जन्म के बाद वो कितना उपयोगी होगा कहना कठिन है। आचार्य रजनीश ( ओशो ) के अनुसार “जब हम अपने अस्तित्व का बोध करने लगते है तो सारा संसार हमारे लिए सर्वथा नये रुप में जीवंत होने लगता है”।

जीवन क्षेत्र की यात्रा करते करते शायद हर इंसान कभी अपने आप से यह प्रश्न जरुर करता होगा क्या वो स्वयं को भी जानता है क्या ? क्या वो वही है ? या कोई उसका दूसरा स्वरुप भी है। हम अपनी किसी असफलता पर जब दुःख और निराशा के अंतर्गत जी रहे होते तो हमारा चिंतन कुछ अंतर्मुखी हो जाता है। हम अगर उस समय सफल होने वाले इंसान के समर्थ गुणों का अवलोकन कर अपनी कमियों को सुधारने का प्रयास करते है, तो निसन्देह यह एक उत्तम प्रयास है, अपने आप को जानने का पहचानने का। समझिये हम अति क्रोध के कारण असन्तुलित होकर कुछ गलतिया कर रहे है, और किसी सफल इंसान का शांत चेहरा हमारे सामने दृश्यत् हो रहा है तब हमें संभलने का यह संकेत स्वयं ही प्राप्त हो जाता है, कि हमें शांत रहने की कोशिश करनी चाहिए, जीवन में सफल होने के लिए। इस अनुभूति को भी हम स्वयं को जानने के प्रयास के अंतर्गत ही मानना चाहिए, क्योंकि हर मानसिक कमी स्वयं को स्वयं द्वारा जानने की कोशिश के लिए बाधक होती है। किसी ने कहा भी है ” Sometimes it is better to remain silent and appear a fool, than to speak and remove all doubt”।

स्वयं को जानने की प्रक्रिया को समझने से पहले हमें इस तथ्य को प्रमुखता देनी सही होगी की हमें दो अस्तित्व के सिद्धांत पर बनाया गया है। एक अस्तित्व शारीरिक व दूसरा आत्मिक, हालांकि दोनों को पूर्ण रुप से समझे हर प्राणी, यह जरूरी नहीं। धार्मिक शास्त्रों में शरीर के स्वरुप को सात धातुओं का समिश्रण भी कहा गया है। वो है, रस, खून, मांस, मेद, मज्जा, अस्थि और शुक्र। शायद यही वजह होगी इंसान उसकी हर तरह की जरूरतों से अपरिचित नहीं रहता। सिर्फ शरीर पर आश्रित प्राणी में इंसान नहीं आता क्योंकि वो विधाता की अंतिम सर्वश्रेष्ठ कृति है, शायद अभी तक की। उसको दूसरे प्राणीयों से कहीं जगह अलग किया गया है। उसके पास शरीर बोध की क्षमताओं के साथ कर्म की गुणवता बोध की भी क्षमता होती है। निश्चित है, उसके जीवन का मूल्यांकन भी सब प्राणीयों से अलग होता होगा। कहते है इंसान शरीर से ज्यादा मन या आत्मा से कम प्रभावित होकर जीवन ज्यादा बिताता है, हाँ, कभी कभी शरीर की ही नहीं आत्मा की जरूरतों को भी समझने की कोशिश जरूर करता है।

युग के अनुसार शरीर की चाहते भी बढ़ती गई और भौतिकता का दबदबा भी शरीर पर ज्यादा शासन करने लगा। आज इंसान का शरीर हसरतों का खिलाड़ी बन गया जिसमें तेजी और रोमांच ज्यादा है। जब कोई बात आत्मिक अस्तित्व बोध की कहीं आती है, तो शरीर की लाचारी हमारी मजबूरी बन जाती है। ऐसा लगता है, हमारी सारी चेतनाये भौतिक सुखों की उपलब्धि के कारण कमजोर हो गई है। हम बहुत बार ये कहते नजर आते है कि हमें मंजिल कि चाह है, हम जीवन के हर क्षेत्र में सफल होना चाहते है। पर हकीकत यही है, हमें पूर्ण सफलता की नहीं भौतिकवादी सफलता की ही चाह ज्यादा होती है, और उसका रस्वादन करने के बाद दूसरे क्षेत्रों की सफलता हमारे नयनों से दूर हो जाती है, जब तक हमें जर्जर, क्षीण होती काया का अहसास नहीं होता, पर तब तक बहुत देरी हो चुकी होती है।

सांसारिक सफलताओं के मायने इस संसार में हम जब तक रहते है, तब तक ही हमारे लिए महत्वपूर्ण होती है। जिन सफलताओं से हमारा रुतबा समाज, देश, और विदेश में बढ़ता है, कहना न होगा हम ज्यादातर समय उनके लिए अर्पित करते है। जीवन की भी मजबूरी होती है, उसे भी समय या काल की गति के साथ सामंजस्य बिठाने का। दैनिक जीवन में शारीरिक धर्म की सबसे बड़ी खासियत यह ही होती है वो अपनी आवश्यक जरूरतों की पूर्ति के लिए हम से कुछ समय अपनें लिए स्वयं ही ले लेता है। शायद यही कारण है कि कुछ धार्मिक सिद्धान्तों का निर्माण इस तथ्य के अंतर्गत हुए कि आदमी ज्यादातर शरीर का दास है और इस दासत्व का विरोध करने से आत्मा के प्रति इंसान की चेतना जागरूक रहती है।

शरीर को जो विशिष्ठ और शिष्ट बनाना चाहती है वो आत्मा ही होती है, मन के सारे चंचल द्वार आत्मा ही बन्द कर सकती है। एक अच्छा मानव बनना शरीर की प्राथमिकता होनी चाहिए क्योंकि संसार सर्वोत्तम को ही ज्यादा गले लगाता है।

हमारी चिंतन की धाराए जब सफलताओं की चाहत करती है तब हम अगर उन सफलताओं की मंजिल में इस पार और उस पार के प्रति हमारे कर्तव्यों को समाहित कर अगर अपने कर्मक्षेत्र को तय करते है, तो यकीनन यह हमारे अपने अस्तित्व का सही मूल्यांकन का एक रास्ता हो सकता है। इस बात से बेपरवाह होना ठीक नहीं कि तन की अवधि के बाद हमारी सफलतायें आगे का सफर नहीं करती। हां, उन सफलताओं को जिन्हें हम बिना आत्मा के स्वीकृती या उसके विरुद्ध की है उन को हमारी अजनबी सूक्ष्मता कभी भी आगे के सफर में साथ नहीं ले जा सकती। यहां हम अजनबी सूक्ष्मता आत्मा को समझे जो इस संसार के बाद की यात्रा करने का वीजा रखती है, परन्तु यह सुविधा सात तत्वों से बने तन को नहीं नसीब होती।

इंसान का दुश्मन न तो तन है न ही मन, उसका चिंतन जब तक विवेकपूर्ण रहता है, तब तक उसके शरीर, मन और आत्मा की गति में स्फूर्तिमय जीवन जीने की चाह बनी रहती है, और शायद यही जीवन सार है।
जब तक हम इस सन्दर्भ में और आगे बढ़ने की तैयारी करे हमें इस अंग्रेजी लेखक के निम्न कथन पर गौर करना चाहिए ” As the day wears to evening deepens into night, can you look back over the walking hours and recall something you have said or done that was really worthwhile ? That’s good. You can’t ? Why –Francies Gay.

लेखक: कमल भंसाली

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