🌻आज🌻 ✍ कमल भंसाली

” आज ”

दिन का सफर
जब भी शुरु करता
मुस्कराकर अपने
आप से कहता
“आज” मेरा अच्छा
दोस्त बन जा
कल तुझे याद करुंगा
नाम जग में तेरा
जरुर प्रकाशित करूंगा
मेरा “आज”
मुझ से ही बोल गया
तेरी यह बाते
अब अच्छी नही लगती
जो तूं कहता
कभी वो नहीं करता
सच कहता
तुमने कभी
मुझे समझा ही नही
हकीकत यह
मेरी कीमत जानता ही नहीं
सिर्फ जग में दावा करता
मुझे महत्व देता
जब मैं बीत जाता
“तो”
बेशर्मी से मुस्करा कर रह जाता

समझ होती तो
कुछ ऐसे कर्म करता
मेरे रोम रोम में
बस जाता
जग में तुम मुझे
क्या प्रकाशित करता !
मै हीं तुम्हें हीरों की तरह
तराश कर
जग को सोंप देता
मेरे भाई
बुरा में किसी के लिये
सोचता ही नहीं
सब कुछ सब के लिये
बना में हर एक के लिए
अपना कर्तव्य ही निभाता
आज होकर भी कल में समा जाता
इसलिए जग मुझे भूल नहीं पाता
तासीर सबकी यही
यह अलग बात
सबके अपने अलग अलग कर्म
उनका अपना जीवन धर्म
जो इसे सत्य समझे
तो उनकी जीत
बुरा समझे तो शायद
“आज” भी उनकी हार
चाहे करे या न करे स्वीकार
फिर भी
तुम्हारा प्रस्ताव
“आज” के लिए मुझे स्वीकार ……..रचियता✍कमल भंसाली

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