****असहजता के शिकार आपसी सम्बन्ध****भाग 1★★कमल भंसाली

आज संसार अपनी ही तैयार की हुई विषमताओं की खाई में बेठा हजारों तरह से बीमार सम्बंधों के कारण जीवन की मूल्यता का अफ़सोस न कर उन्हें ही आरोपित करने की गलती कर रहा है। अपनी चेतना और संवेदनाओं को शायद वो आज के आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक परिवेश में भूल गया है।

विषय को आगे बढ़ाये उससे पहले हमें दो प्रसिद्ध दार्शनिको के इन कथनो पर जरा गौर कर लेना उचित लगता है। “Epictetus” एक यूनानी स्ट्रोक दार्शनिक थे उन्होंने जीवन का गंभीरता से अध्ययन किया और सिखाया “दर्शन” से जीवन जीने का तरीका सैद्धान्तिक अनुशासन नहीं होता खासकर आपसी नजदीकी सम्बंधों में, जिन्हें आहत होने का खतरा हर समय बना रहता है।

“Clear thinking requires proper training so that we are able to properly direct our will, stick, with our true purpose and disover the conections we have to others and the duties that follow from those relationship”.

Confucius एक चीनी दार्शनिक थे, उन्होंने जीवन के सम्बन्ध में लगभग कुछ ऐसा ही कहा
कि जीवन तो सरल साधा ही होता है, हमारे आपसी सम्बन्ध ही इसे जटिल बनाता है। “Life is really simple, but we insist on making it complicated”

आज हम जिस धरा पर अपना जीवन व्यतीत कर रहे है, वो प्रकृति के नियमोनुसार आज भी हमें सही रास्ते चलाने की कोशिश करती है, जिससे हर प्राणी का अस्तित्व सुखपूर्ण बना रहे। पर हम इस पहलू पर गौर ही नहीं करते क्योंकि हम सच्चाई से हमारे जीवन को दूर ले जा रहे है। मानव मस्तिष्क का अगर तेजी से विकास नहीं होता तो शायद आज भी मानसिक सुख की मात्रा अपनी उत्तमता के साथ प्राप्त करता। महत्वकांक्षा उसके पास उतनी ही होती जितने की वो कामना करता परन्तु वस्तुस्थिति विपरीतता का संकेत दे रही है। आज कृत्रिम आधुनिक साधनों के बाजार से जीवन ऊपरी सतह पर चमत्कारिता भरा उत्साह पूर्ण और सुखी सम्पन्न लगता है, परन्तु भीतर से निरहि, निराशावादी और तन्हाईयों का शिकार हुआ ही है, अगर हम ईमानदारी से इस तथ्य पर गौर करे तो। मानवता का निर्माण कोई एक दिन में सम्पन्न नहीं हुआ न ही आज की सामाजिक व्यवस्था का। मानव विकास की प्रक्रिया और उसके सामाजिक विकास का इतिहास आज हमारा चिंतन का विषय नहीं पर उसके तहत जीवन के सुख दुःख के निर्माण में हमारी आपकी भूमिका की तलाश अब जरूरी हो रही है, क्योंकि जीवन को सुख की छांव देने वाले रिश्ते और सम्बन्ध कई लाईलाज आत्मिक और शारीरिक बीमारियों से ग्रसित हो रहे है। गंभीर चिंतन अगर करे तो भविष्य ऐसीअनहोनी होनें के संकेत दे रहा है कि सबके रहते इंसान अकेला हो रहा है और मानवता धीरे धीरे धरती से अपना नाता तोड़ रही है। इसके क्या परिणाम भविष्य के गर्भ में कहा नहीं जा सकता ? पर कुछ समझा जरूर जा सकता है। आइये, कोशिश करते है, सबसे पहले दाम्पन्त्य जीवन के बनते बिगड़ते स्वरूप का, आज के युग के वातावरण अनुमोदन अनुसार।

सन्दर्भ चर्चा :वर्तमान
देश : भारत
व्यवस्था :सामजिक
चिंतनीय सम्बन्ध : पति- पत्नी
जीवन क्षेत्र : दांम्पत्य जीवन
प्रभावित क्षेत्र : आज का जीवन भविष्य के अन्तर्गत

हालांकि हमारी चर्चा इस महत्वपूर्ण विषय पर है पर संसार निर्माणकारी यह सम्बन्ध आज नई नई चुनौतियों का सामना कर रहा है। हमारे देश में इस सम्बन्ध से गरिमामय जीवन की पहचान बनती है, ऐसा आज भी विश्वास किया जाता है। पर आज हकीकत कुछ और ही बयान कर रही कर्तव्यों और अधिकारों के चक्रव्यूह में इसका अस्तित्व आत्मिक न रहकर आधुनिक साधनों के अधीन हो गया है। आज के युग को आर्थिक युग का दर्जा देकर हमने कितनी बड़ी गलती की इसका उत्तर भविष्य के गर्भ में जरुर कहीं न कहीं समाया है। उसके दुष्परिमाणों से पता नहीं हम कब तक अपने आप को बचाने में सफल होंगे, अभी फिलहाल कहना भी कठिन है।

हमारा देश की सामाजिक व्यवस्थायें कई किस्म के रीती रिवाजों से अंलकृत है, अतः पति-पत्नी के बन्धन दिवस पर उत्साह से इस बन्धन को सामाजिक मान्यता दी जाती है और ऐसे सम्बन्ध के लिए उपयुक्त शब्द “विवाह” का प्रयोग किया जाता है। हर धर्म में इसके लिए कुछ शपथों का भी उपयोग किया जाता है, जिससे सम्बन्ध सिर्फ शरीर तक सीमित न रहकर दिल के भीतर अपनी जगह तय कर ले। इस रिश्ते से दो शरीर के मिलन को विधिवत अनुमति दी जाती है, जिससे उनसे पैदा होने वाली सन्तान से परिवार का निर्माण जारी रहे, अतः हमारे धर्म- शास्त्रों के अनुसार ही इस बन्धन को कुछ मर्यादाओं का ख्याल रखने की हिदायत संस्कारों के तहत दी जाती है । जीवन की सुगमता को और सहज करने में विवाह की भूमिका बहुत ही सुंदर और स्वच्छ वातावरण तैयार करनें की होती है। तथ्य कहते है, नारी की गरिमा ही इस रिश्ते को विस्तृता या संकुचिता की ज्यादा जिम्मेदार होती है क्योंकि उसे प्रकृति ने कई संवेदनशील गुण पुरुष से अलग दिए है। नर- नारी दोनों ही जीवन की गति के सन्तुलित पहिये है।

आज नारी का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का दावा हम जरूर कर सकते है, पर तथ्य कहते है नारी ने ज्यादा समय नर को समझने के लिये लगाया इससे उसके पास नर की जानकारी ज्यादा सक्षम होती है और पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था में वो उसे व्यवस्थित रखने में सफल भी हो जाती है।
चूँकि आज विवाह विवाद का विषय बन रहा है, कल के बन्धन आज टूट रहे है, रिश्तों के मधुरमय होने से पहले कई तरह के जायज नाजायज कारण विच्छेद की स्थिति तैयारी कर रहे है। सम्बंधों का बनना बिगड़ना आज साधारण सी बात लगने लगी । कानूनी प्रक्रियाओं में दोनों का जीवन
आंशका, भय, डर, ख़ौफ़ से रुग्ण और कमजोर पथ की तरफ अग्रसर होने लगता है। सामजिक कमजोरियों के कारण कानूनी दावपेंच से ही समाधान की कोशिश की जाती है, जिसमे समय, धन, और स्वास्थ्य की बलि निश्चित है बाकी परिणाम अनिश्चित रहते है।

समस्या काफी गंभीर होती है जब काफी सालों का साथ दोनों मे से किसी एक की गलत नासमझी से बिखर जाता है या टूटने के कगार पर पंहुच जाता है। इस तरह की परिस्थितियों का निर्माण एक दिन में नहीं होता पर आसार दिखने के उपरान्त भी कमजोर सामाजिक और पारिवारिक दीवारों के अंदर अंतिम परिणाम का शिकार हो जाता है, जिसका सबसे ज्यादा प्रभाव बच्चों के भविष्य पर घातक रूप से होता है। स्वार्थ भरा माता पिता का यह स्वरूप उन्हें अंदर तक खोखला कर सकता है। यहां सवाल जो उभर कर प्रगट होता है, उसमें कोई सभ्य शालीनता नहीं तलाशी जा सकती अतः उत्तर तलासना सिर्फ संशय का शोधन करना ही कहा जा सकता है।

मनुष्य काफी हद तक परिस्थितियों का दास है, दोनों ही प्राणी नर- नारी अपनी शारीरिक सरंचना के कारण स्वतः ही ऐसी स्थितियों का निर्माण कर लेते जो उनको चरित्रमय जीवन से दूर ले जाती है, जहां यथार्थ से ज्यादा अधूरी हसरतों की भूमिका होती है। भारतीय परिवेश के दाम्पन्त्य जीवन में आज अर्थ का महत्व काफी बढ़ गया है। नारी गृह की सशक्त गृहणी की भूमिका के दायरे से बाहर अपनी दूसरी क्षमताओं को तलाशने में लग गई, इससे पारंपरिक गृह स्वामिनी जैसा मान सम्मान की अब मोहताज भी नहीं है। समानता के आधार पर वो आज अपना जीवन साथी तलाशती है।

उपरोक्त चर्चा से यह कभी नहीं समझना चाहिए कि आपसी सम्बंधों में किसी एक की भूमिका की वकालत की जा रही है। जब भी किसी नाजुक सम्बन्ध का अनुशंधान किया जाय तो कुछ सत्यता भरे कटु अंशों को चर्चा में सम्माहित करना जरूरी होता है, अन्यथा बिना निष्कर्ष का ये लेख अधूरा ही रहेगा। इस चर्चा का ध्येय इतना ही कि जीवन पूरक इस सम्बन्ध की गरिमा को बनाये रखने कि जिम्मेदारी मर्द और औरत दोनों की आज के युगानुसार बराबरी की है और इस तथ्य को मानकर ही प्रेम भरे कर्तव्य से इस अटूट बन्धन को जीवन पर्यन्त निभाने का प्रयास करना चाहिए।

तथ्य कहते प्यार में चाहे शर्त न भी हो परंतु किसी भी प्रकार के सम्बन्ध के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। ध्यान यह भी रहे गर्मजोशी में बनाये गये किसी भी प्रकार के प्रेममय सम्बन्ध अति शीघ्र हिम बन पिघल भी सकते है। दिल की भावनाओं में अगर प्रेम की कदर होती है, तो बिना किसी सम्बन्ध के जीवन प्रेम का उपासक बना रहता है, हमारी भावनाओं में इस विचार को कभी भी गहराई नहीं देनी चाहिए कि दिल को तो भगवान ने टूटने के लिये बनाया है। मार्क ट्वैन का कथन इस सन्दर्भ में बहुत ही मार्मिक है ” Never allow someone to be your priority while allowing your self to be their option”। क्रमश….लेखक कमल भंसाली

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

w

Connecting to %s