🙆”मा”🙅 रिश्तों का व्यवहारिक आंकलन 👧 एक उद्धेषपूर्ण अनुसंधान चर्चा 👼भाग 1

जब भी हम कभी जिंदगी के सन्दर्भ में बात करते है, तो अहसास भर होता है कि जिंदगी को समझने की जरुरत होती है । जिंदगी बहुमूल्य होते हुऐ भी हम इसकी कीमत का शायद ही कभी मूल्यांकन करते है, यह हमारी शायद कोई नीतिगत कमजोरी है और इसका हर्जाना हम काफी बार क्षमता से ऊपर चुकाते है। एक सत्य जीवन का जो हमारे सामने कई प्रश्न खड़ा करता है, वो है आपसी रिश्तों का तालमेल, साधारण स्थिति में भी रिश्तों का निबाहना आजकल काफी चिंतन का विषय कहा जा सकता है। विपरीत परिस्थियों में तो हमारा आपसी सम्बन्ध निम्नतम रक्तचाप से भी नीचे चला जाता है। आखिर ऐसा क्यों है, कि सबसे सक्षम धरती का प्राणी अपनों से ही पराजित हो जाता है ! आज हम रिश्तों के विज्ञान की समीक्षा करेंगे परन्तु उससे पहले यह जानलेना जरूरी है, आखिर रिश्तों से हमारा क्या तातपर्य है ? सम्बंधों की रूपरेखा के अंतर्गत ही हमारा चिंतन होना इसलिए जरूरी हो जाता है क्योंकि इनपर हम अपना कुछ अधिकार मानते है। हम किसी भी रिश्ते का मूल्यांकन करे उससे पहले यह समझलें कि हर रिश्ता चाहे वो खून का हो या परिस्थितियों से बना हो दोनों में ही आपसी विश्वास की मात्रा बराबर होनी जरुरी होती है। विश्वास के धागों में प्रेम के मोतियों की कीमत अनमोल होती है, इस सत्य से परिचित इंसान हर रिश्ते का सही सम्मान करता है और आजीवन सुख का स्पर्श उसे प्राप्त होता रहता है, ये एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है।

रिश्तों की दुनिया विचित्र और सचित्र होती है, इसमे नये नये रिश्ते जो व्यवस्था और अर्थ अर्जन के अंतर्गत बनते और बिगड़ते है, उनके वजूद की सीमा सीमित होती है, अतः उनसे ज्यादा न सुख मिलता न ही दुःख। परन्तु इंसान को जन्म लेने के बाद जिन दो जीवन पर्यन्त रहने वाले आत्मिक रिश्तों से प्रथम साक्षात्कार होता है, वो दुनिया के सबसे बड़े विश्वास के ग्राहक होते है। जी, हाँ, मैं माता- पिता व सन्तान के अनमोल रिश्ते की बात कर रहा हूँ। शास्त्रों की बात माने तो दोनों ही रिश्तों को भगवान के समकक्ष पूज्य और सम्मानीय माना गया है। चूँकि माता- पिता का रिश्ता प्रेम और भावुकता के अमृत भरे तत्वों से संचालित रहता है अतः दुःख और सुख दोनों को अनुभव जीवन पर्यन्त करता रहता है। इसे जीवन विशेषज्ञ उम्मीद, आशा और भविष्य के तत्वों से पोषक रिश्ता भी बतलाते है, जो काफी हद तक सही मूल्यांकन लगता है। आज हम इसी रिश्ते के सन्दर्भ में अपना चिंतन आगे बढ़ाते है क्योंकि ये जीवन का प्रथम रिश्ता है, जिसे विधाता हमें धरती पर पहला उपहार देता है।

सबसे पहले हम मर्मस्पर्शी, ममतामयी व स्नेह से भर पूर “माँ ” के रिश्ते से अपनी विवेचना से शुरुआत करे तो शायद हम जीवन के इस मधुरमय रिश्ते का सर्वांग आनन्द प्राप्त करने की कोशिश करे। कहते है, “माँ “अगर स्नेह से भरपूर नहीं होती तो प्रेम की परिभाषा में अमृत्व नहीं झलकता अतः उचित हो जाता इस पवित्र रिश्ते के आत्मिक और सात्विक तथ्यों का मानसिक और संसारिक दृष्टि से विश्लेषण करने की चेष्टा करे।

इस पवित्र अनमोल रिश्ते की शुरुआत उसी दिन से शुरु हो जाती है, जब जीव “माँ” के गर्भ में जगह पाता है। हर “माँ” इसका प्रथम अहसास पाते ही स्नेहयुक्त तत्वों से इसकी सुरक्षा के लिए जागरूक हो जाती है। हालांकि “माँ “शब्द की महिमा को हर क्षेत्र से परिभाषित किया गया परन्तु आज तक सभी परिभाषायें सम्पूर्णता से अधूरी ही लगती। महाभारत महाकाव्य के रचयिता महर्षि वेदव्यास ने माँ के बारे में जो लिखा वो काफी सारगर्भित लगता है।

नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः ।
नास्ति मातृसंम त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया ।।

( यानी माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय चीज नहीं है। )

इसे हम तकनीकी रुप से समझना चाहते है, तो ” माँ ” शब्द की गरिमा को समझना होगा। प्रथम सांस के साथ नव प्राण प्राप्त शिशु जब प्रथम स्पर्श का मूल्यांकन सुरक्षित पालन पोषण के लिए करता है, तो “माँ “का दूध उसके आँचल में मचलने लगता है।ये अमूल्य रिश्ता है, जिसको मंत्र के रुप हर दुःख के समय याद किया जाता है। जो, माँ की भूमिका पर प्रश्न चिन्ह लगाते है, उन्हें अपना शैशव जरूर याद करना चाहिए। एक माँ अपनी सन्तान का पालन पोषण कितना तपस्यामयि हो जाती है, ये जानना भी संक्षिप्त में जरूरी भी है। वो सन्तान को गर्भ धारण कर नौ महीनें तक उसे वहां सब दायित्व निभाते हुए सुरक्षित रखती, प्रसव पीड़ा सहन करती। जन्म देने के बाद स्तन पान करवाती, रात भर जागती, खुद गीले में सो कर बच्चे को सूखे में सुलाती, उसका हर दैनिक कार्य करती, उसे सदा आंचल में छुपा कर रखती और उसकी रक्षा के लिए सब कुछ दाव पर लगा देती। ” माँ ” की महिमा और उसके आंचल की ममता को शब्दों में बयान करना मुश्किल होता है, पर महसूस किया जा सकता है।

आज युग बदल गया, सब तरह के सम्बन्ध स्वार्थ के धागों में बंध गए परन्तु आज भी “माँ “एक मात्र सम्बन्ध रह गया जिससे कोई नुकसान की कल्पना भी नहीं करता। परन्तु आज हकीकत यह भी है, अर्थ के प्रभाव ने ” माँ ” की भूमिका भी बच्चों के लालन पालन की बदल गई। आज की कुछ शिक्षित माँये बच्चों को आया के सहारा उनका लालन पालन करना पसन्द करती है, इस तरह के और भी कारणों से वर्तमान की कई घटनाये माता के प्रति सन्तान का रवैया कुछ रूखापन महसूस कर रहा है। ये वक्त की मजबूरी कहिये या अर्थ तन्त्र की मेहरवानी की माँ की शुद्ध भूमिका कमजोर हो रही है। पुराने समय से जब तक अर्थ का प्रभाव नहीं बढ़ा तब तक मजाल थी, कोई इस रिश्ते के प्रति नकारत्मक विचार बदलता परन्तु वर्तमान में भूर्ण हत्या ने कुछ संशय को प्रोत्सहान दिया है, फिर भी “माँ “तो “माँ” होती है, अंतस में तो इस पर उसे पश्चाताप जरूर होता होगा। कुछ वक्त के कारणों को छोड़ दे तो आज भी “माँ” बेमिसाल होती है।

कुल मिलाकर, हर धर्म माँ की अपार महिमा को स्वीकार करता है। हर धर्म और संस्कृति माँ की जीवन निर्माण की भूमिका को स्वीकार किया है। हिन्दू धर्म हर देवी को माँ के रुप में माना गया है, मुस्लिम धर्म ने माँ को पवित्र माना है। हजरत मोहम्मद कहते है ” माँ के चरणों के नीचे स्वर्ग है “। ईसाईयों के पवित्र ग्रन्थ ने स्पष्ट माना है ” माँ के बिना जीवन ही नहीं “। कहने का इतना ही सार है, कोई भी देश, कोई भी संस्कृति, कोई भी सभ्यता या किसी भी भाषा में माँ के प्रति असीम प्यार व सम्मान मिलेगा। भाषा परिवर्तन से माँ शब्द की गरिमा कभी अपरिचित नहीं रहती। हिंदी में “माँ”, संस्कृत में “माता”, इंग्लिश में “मदर”, “ममी” या “ममा” फ़ारसी में “मादर” और चीनी में “माकून”शब्द का प्रयोग होता है। भाषायी दृष्टि से “माँ “के चाहे भिन्न भिन्न रुप हो लेकिन ममता और वात्सल्य से हर माँ एक ही तरह की होती है।

अगर हम मनोवैज्ञानिक दृष्टि से “माँ” और सन्तान के सम्बंधों का विश्लेषण करने की कोशिश करे तो प्रथम समझना होगा, हर रिश्ते की बुनियाद भावनाऐं होती है । देश, जाति, धर्म तथा समय काल हर रिश्ते की गहनता को प्रभावित जरुर करते है, पर माँ का रिश्ता अंदर से अप्रभावित ज्यादा रहता है। माँ का रिश्ता बेटे के लिए या बेटी के लिए बिना कोई अलग् धारणा के एक जैसा रहता है यह और बात है, सन्तान गलतफेमियों के कारण इसे कम, ज्यादा में कभी कभी मूल्यांकित कर लेती है। हमारे देश में रिश्तों की नैतिकता बरकार रखने के लिए सदियों से प्रयास किया जाता रहा संस्कार निर्माण द्वारा बच्चों को बचपन से हर रिश्ते की गरिमा से अवगत कराया जाता इस प्रणाली माँ की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है। कड़वा सच यह भी है आज माँ की खुद की आस्थायें परिवार के नियमों के प्रति कम हो रहीं है, जो वर्तमान और भविष्य के लिए शायद सही नहीं है।

भावुकता से ओतप्रोत ” माँ” का रिश्ता गीतकार और कवियों को इतना भावुक कर देता कि माँ उनके लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन जाती। चरित्र निर्माण में “माँ ” की शिक्षा संतान को वक्त के अनुसार तैयार करने की क्षमता व मार्गदर्शन करती है। इतिहास गवाह है, संसार में बलशाली, बुद्धिमान, चरित्रवान आदि गुण युक्त व्यक्तित्व उभारने में ” माँ ” का सहयोग और मार्गदर्शन गुरुत्व केंद्र होता है।

फ़िल्म दादी माँ (1966 ) के इस गीत में ” माँ “की महिमा को मार्मित ढंग से प्रस्तुत किया गया है, जिसे ह्रदय द्रवित हो जाता है, और आँखों में स्नेहमयी “माँ” की नमन योग्य तस्वीर उभर आती है।

“उसको नहीं देखा हमने कभी
पर इसकी जरूरत क्या होगी
ऐ माँ….ऐ माँ! तेरी सूरत से अलग
भगवान की सूरत क्या होगी ।।”

दोस्तों संसार में सब कुछ मिल सकता सिवाय माँ के, अतः अगर आप के पास आज भी माँ का सौभाग्य है, तो
इस अनमोल रिश्ते का सम्मान सहित आनन्द लीजिये ।माता- पिता को सुखी रखकर नहीं चुकाने वाले कर्ज के ब्याज के रूप में ही सही। माँ- बेटे के रिश्ते की विवशता ही कहिये जिंदगी भर माँ जिस बेटे को समझने की कोशिश करती वो ही बेटा वक्त के साथ क्षीण होती माँ की काया व मन को सुख नहीं दे सकता। कहते है एक माँ कई सन्तानों को संभाल लेती पर सब सन्तान मिल कर भी एक माँ को अच्छी तरह संभालने में ज्यादातर असफल ही रहते है।

आगे बढ़े उससे पहले यही कहना सही होगा:-

“माँ” तेरा नहीं कोई मोल
तूं सदा रही अनमोल
तूं न होती तो
शायद ही बन पाता
जग का ये घूमता भूगोल”

रचियता और लेखक: कमल भंसाली **क्रमश कभी और…..

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