👥कर्तव्य और अधिकार👤 जीवन अनुसन्धान चर्चा भाग 1✍कमल भंसाली

“अधिकार” और “कर्तव्य” ऐसे शब्द है, जो एक दूसरे के पूरक है, एक के बिना दूसरे का चिंतन व्यर्थ है, फिर भी विडम्बना ही कहिये एक सर्व पसन्द है, दूसरा ज्यादातर सिर्फ चिंतन का विषय ही है। जी हाँ, मैं अधिकार की खुश किस्मती और कर्तव्य निर्वाह के कम पसन्द की बात कर रहा हूं। अधिकार प्राप्त करना सबको प्रिय लगता है, पर यह बात कर्तव्य निभाने के लिए नहीं की जा सकती, ऐसा क्यों है ? उत्तर देना आसान नहीं पर तथ्य कहते है देने वाला ज्यादा प्रिय लगता है और लेने वाला कम, ऊपरी सतह पर कथन सही भी लगता है, पर ऐसा हकीकत में हरगिज नहीं है। जब हम “अधिकार” और “कर्तव्य” का चिंतन अपने ही जीवन के सन्दर्भ में करते है, तब लगता अधिकार हमें ज्यादा सुविधाओं के लिए प्रेरित करता है, और कर्तव्य कहता है सुविधाये मेरा ध्यान रखने से ही प्राप्त हो सकती है। सच भी है, दोनों स्थितियों के निर्माण से ही सुव्यस्थित जीवन का संचालन संभव है। अधिकार यानी प्रभुत्व, या हक जिसे हम इंग्लिस में Right या Rights के नाम से जानते है, जो मानव की उग्रता से पोषित होता है, अतः इसकी सक्षमता में मजबूती और तेजी जैसे तत्व ज्यादा झलकते है। उसके विपरीत कर्तव्य का मतलब करने योग्य कर्म यानि किसी कार्य को करना, नैतिक जिम्मेदारी के अधीन होकर, संजीदगी और संवेदनाओं से ज्यादा पोषित है ।अतः नम्रता से इंग्लिश भाषा में Duty शब्द का प्रयोग ज्यादातर कर्तव्य पूर्ति के लिए ही किया जाता है। हालांकि कुछ और शब्द भी इंग्लिश में प्रयोग किये जाते है, जैसे OUGHT, WORK, OBLIGATION, JOB, ROLE,DORESHIP, PART, DEVOIR, CALL, BUSINESS, OBEDIENCE, DISCHARGE, FALL, BE UP, CONSCIENTIOUS , TRUSTWORTHY तथा LOYAL। इंग्लिश में स्थिति के अनुसार कर्तव्य बोध कराने के लिए अलग अलग शब्दों का प्रयोग किया जाता है, इसलिए समझदारी से इनका प्रयोग करना होता है। “अधिकार” शब्द का प्रयोग हर जगह करना खतरनाक है, हाँ इसके प्रति अपनी चेतना को जागरूक रखना जरूरी होता है।जब इंसान किसी प्राकृतिक या शासन सम्बन्धी सुविधाओं से वंचित हो और उससे उसका जीवन संचालन कठिनता महसूस कर रहा है, तब उसे अपने अधिकारों का भी ज्ञान रहना चाहिए। समय के परिवर्तन स्वरूप स्वयं को बदलना जरूरी भी होता है पर यहीं जब हम विशेष परिस्थितियों में बेअसर अधिकारों का उपयोग करते है, तो परिणाम विपरीत ही मिलते है। ऐसी स्थिति सामूहिक जीवन के अंतर्गत कई बार आती है। परिवार और समाज दो ऐसे क्षेत्र इसके सर्वतम उदाहरण है, जहां कर्तव्य कमी और अधिकारों का अधिक उपयोग होता रहता है। बात साफ़ है, अधिकार मानसिक विसाद को बढ़ाता है और कर्तव्य निभाव सुख का अहसास कराता है, मात्रा चाहे उसकी कितनी भी कम हों। जब बात कभी हम देश की वर्तमान परिस्थितयों पर करते है तो ज्यादातर चर्चाये अपने अधिकारों के सन्दर्भ में होती है, शायद ही हम चर्चा करते है देश के प्रति अपने कर्तव्यों की। आखिर अधिकार का हक पाने वाले हम भूल जाते है कि जब तक हम अपने कर्तव्यों की पूर्ति नहीं करेंगे तब अधिकार किस सतह से अपनी पूर्णता पायेगा और कैसे हम उसका उपयोग कर सकेंगे। भारत शायद दुनिया का सबसे उदारवादी देश है, जहां स्वतन्त्रता के अधिकार का लोग अपने छोटे छोटे स्वार्थों की पूर्ति में विशेष उपयोग करते है, यानी अपने कर्तव्यों को भूल जाते है।हम जो इस देश के नागरिक है, यहां की सब सुविधाओं का तो उपयोग करते है, और उनकी कमियों पर दुःख महसूस करते है, पर किसी एक अपने जायज या नाजायज सुविधा के लिए अपने कर्तव्यों को भूल अनेक जीवन उपयोगी सुविधाओं को नुकसान पहुंचाने से परेहज नहीं करते है। इस लेख का यह कतई प्रयास नहीं है कि हम अपने अधिकारों के प्रति सचेतक न बने परन्तु देश और अपने हित के लिए जरूरी है कि हम अपने कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदारी का भी अहसास ही नही पालन करने का संकल्प होना चाहिए। ये देश की विडम्बना ही मानी जा सकती है कि उसके संचालन करने वाले नेता और पढ़े लिखे अफसर नैतिकता युक्त कर्तव्य का निभाव अपने निजी स्वार्थों के कारण नहीं पसन्द करते। ये तो तय है, कुछ भी बिना प्रयास संभव नहीं होता ।आज हम स्वतन्त्र है, परन्तु इसके लिए कितना कुछ खोया गया, इसका सही मानसिक चिंतन कम लोग ही करते है। याद करना जरूरी है, हासिल करना आसान होता पर त्याग करना कठिन होता है। अगर सुविधाओं का प्रयोग करना अधिकार है, तो उन्ही सुविधाओं को नष्ट करने की सोच को क्या कहें, हिसाब से तो ऐसे समय इन सुविधाओं को बचाने के कर्तव्य पर ध्यान देकर ही कोई कदम बढ़ाना चाहिए। जब हम परतन्त्र थे तो देश प्रेमियों ने कई तरह के आंदोलन किये, स्वतन्त्रता पाने के लिए नरम गर्म प्रयास भी किये पर सब की एक भावना थी कि देश दासता से स्वतन्त्र हो जाए, इस परिस्थिति में अधिकार और कर्तव्य का संयुक्त प्रयास था । लाला लाजपतराय ने जहां अधिकार याद दिलाया ” स्वतन्त्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है वहीं नेताजी सुभाष चन्द्र ने कर्तव्य निभाने का आह्वान किया ” तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूँगा”। शायद यही कर्तव्य और अधिकार की सही समझ और सक्षमता ने हमें आजादी का पुरस्कार दिया। युग परिवर्तन में अधिकारों के प्रति सचेतक इन्सान को सब साधन स्वतः ही मिल रहे फिर कर्तव्य की अवेहलना करने से प्राप्त परिणामों पर शिकायत करने का अधिकार कहां रह जाता है। सही चिंतन की जरूरत है, देश पर न्योछावर तो हम न हों पर देश से तो हमारा प्रेम आत्मिक होना जरूरी है। हमें R. J. Ingersoll के इस कथन पर विशेष ध्यान देना चाहिए कि ” The place to be happy is here. The time to be happy is now. The way to be happy is to make others so.” । उपरोक्त चिंतन के बावजूद भी अगर हमें कर्तव्य बोध की जगह अधिकारों की चिंता है तो निश्चित मानकर चलिए हमारी स्थिति John May के इस वाक्य में व्यक्त है ” If you are waiting for inspriation, you are waiting at a bus stop on a road where no buses run. क्रमश****लेखक: कमल भंसाली

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