नये वर्ष के नये संकल्प🌺भाग 3🌷आत्मिक अनुसंधान चर्चा🌲कमल भंसाली

जब कभी प्रकृति की नैसर्गिक सुंदरता हमारी नजरों से टकराती है तो निश्चित है उसकी इस सुंदरता से हमें आनन्द और प्रसन्नता का अनुभव होता है। ठीक ऐसे ही जब किसी असाधारण व्यक्तित्व से हम मिलते है, तो हम उस मिलन को अपने जीवन की एक धरोहर समझते है। हमारी विडम्बना भी यही है कि हम उसके दूसरे पहलू पर कभी या तो गौर नहीं करते या हमारे अंदर इस तरह के जज्बातों को समझनें की समझ नहीं है कि व्यक्तित्व किसी का योंही प्रखर और आकर्षक नहीं होता उसके पीछे उसकी दृढ़ स्वयं परिवर्तन की चाह और क्षमता होती है। क्यों नहीं कुछ प्ररेणा उनसे स्वयं के जीवन को मिले ! जीवन सिद्धान्त तो यही कहता है, ऐसे व्यक्तित्व प्रेरणा के स्त्रोत होते है और उनसे हम भी जीवन को आकर्षक और लुभावना बना सकते है। शुरुआती जिंदगी से हर कोई एक साधारण गुण और अवगुणों से युक्त इंसान होता है, यह उस विशिष्ट इंसान की मानसिकता थी, उसने अपने जीवन के कुछ अवगुणों पर गौर किया और अपने जीवन से उन्हें धीरे धीरे स्थानांतरित कर उनकी जगह सही गुणों का विकास कर उन्हें महत्व दिया। इस तरह के परिवर्तन की सोच का सही समय अभी हमारे लिए भी है, जब आनेवाला साल हमें बेहतर ढंग से जीने का आह्वान करता है। पिछली हमारी चर्चाओं में हमने इस बारे में काफी चिंतन और अध्धयन किया अब समय आ गया कि उनके अनुरूप हम स्वयं को कुछ नये संकल्पों से सुधारे, ध्यान इतना ही रहे संकल्प सिर्फ संकल्प बन मर न जाये, उन्हें सदाबहार रख हम उन के द्वारा प्राप्त सकारत्मक परिवर्तन को अपने जीवन तत्वों में समाहित कर ले।

पीछे, हमने जिन तीन क्षेत्रों की चर्चा की हकीकत में उन्हीं से प्रभावित हो हमारा जीवन अपना काफी विस्तार करता है और एक दिन अपनी पूर्णता को प्राप्त भी करता है। कहते है, जीवन के अंतिम पड़ाव पर प्राणी में गंभीरता आ जाती है क्योंकि वो उस समय अपनी सफलताओं से ज्यादा अपनी असफलताओं से पीड़ित रहता है। मनन करता अपनी उन कमजोरियों का जिससे उससे उसका जीवन कठिन हुआ। उसका अपनी प्राप्त सांसारिक उपलब्धियों के प्रति प्रेम भी नगण्य हो जाता है । संसार से विदा लेते समय अपनी आत्मा की गहनता में जाने का मन होता है, जिस पर वो कभी कभार ध्यान देता था या देता भी न था।अगर हम कभी अपने दैनिक जीवन के तौर तरीको का स्वयं अवलोकन करते तो शायद सहज में ही समझ में आ जाता कि छोटी छोटी उपलब्धियों के लिए हमने अपनी बड़ी बड़ी खूबियां दाव पर लगा दी है। यानी अपने किसी नैर्सिगक गुण या गुणों की आहुति इस तरह के यज्ञ में दी है, तत्काल के परिणाम का क्षणिक ख़ुशी में विलीन होते ही हमें सहज महसूस हों जाता है, कहीं न कहीं ये हमारी आत्मा की हार है। अर्थ क्षेत्र की उपलब्धियों पर ही गौर करे तो हमें ऐसे कई एहसास आज भी हो सकते है । ज्यादा अर्थ संचय की चाह के लिये स्वास्थ्य पर किया गया किया गया अत्याचार जीवन की समय सीमा को कमजोर करता है इसलिए दोस्तों, वर्ष की सुंदर व स्वस्थमय शुरुआत से पहलें हम अपने मन व दिल को दुरुस्त कर लेना चाहिए । अपने लिये स्वयं तय किये नये निर्देशों व संकल्पों का पालन कर जीवन को सही व्यक्तित्व का उपहार देने का प्रथम दृढ़ संकल्प स्वीकार कर लेना उचित लगता है।

कुछ संकल्पों की एक सूची तैयार करे उससे पहले हमें इस सोच पर ध्यान देना होगा कि गुजरा समय कभी वापस नहीं आता पर हर क्षण के प्रभाव से हमारे जीवन को प्रभावित कर जाता। एक क्षण का उच्चतम चिंतन आदमी को पुरस्कार का हक दिला देता और एक क्षण का निच्चतम चिंतन जेल का दरवाजा भी दिखा देता। नैतिकता की कितनी भी हम अवहेलना अपने जीवन में करे पर जब स्वयं की चाही नैतिक जिम्मेदारी हमें दूसरों से नहीं मिलती तो कभी यह क्यों नहीं सोचते कि इसका तिरस्कार तो हमारा भी किया हुआ है। धर्म शास्त्रों ने तो सदा इंगित किया ” जैसी करनी वैसी भरणी” । अतः हमारे संकल्प जीवन सुधारक ज्यादा हो, तो निश्चित है समाज से प्राप्त होने वाले सुख से हम कभी वंचित नहीं रहेंगे।

सच और झूठ:-

जीवन कैसा भी हम जीये, सच और झूठ से वंचित रहना नामुमकिन होता है। इसकी मात्रा के उपयोग से ही सुख दुःख का स्वरूप भी बनता है। तय है किसी भी तरह के झूठ का बाहरी चेहरा कृत्रिमता के कारण आकर्षक और सुंदर होता है परन्तु सच की पवित्रता के सामने सदा ही फीका लगता है। सच में नैतिकता का तप समाहित होता और शुद्ध सच तो किसी भी तरह के आवरण से परेहज भी करता है। हम अगर अर्थ के नफे, नुकसान के सिद्धांत की जरूरत के अनुसार भी अगर झूठ का अति प्रयोग कर रहें है तो हमें किसी के बताये इस तथ्य पर भी ध्यान देना सही होगा ” सच वह दौलत है जिसे पहले खर्च करों और जिंदगी भर आनन्द करों, झूठ वह कर्ज है जिससे क्षणिक सुख या राहत पाओं पर जिंदगी भर चुकाते रहो” । चूंकि, हम संसारिक जीवन जीते है और सब तरह की परिस्थितियों से जीवन को गुजरना पड़ता है अतः आज के युग अनुसार झूठ के प्रयोग को पूरा बन्द नहीं किया जा सकता क्योंकि कभी कभी ये भी सोचना पड़ता है “लोहा को लोहा” काटता है। विपरीत परिस्थितयों में रिश्तेदार व सम्बंधियों का रुख भी अविश्वासकारी व असहयोगी हो जाता है, और सच यहां खतरनाक स्थिति पैदा कर देता है, ऐसी स्थिति में सब जगह सत्य का प्रभाव इन्सान को कमजोर करता है। चाणक्य सिद्धांत कठिन परिस्थितियों में प्रयोग योग्य कहा जा सकता है, कि “प्रेम और युद्ध” में सब जायज है। अतः दोस्तों आज की जिंदगी में सच और झूठ का प्रयोग बहुत ही समझदारी से करना चाहिए पर हर जगह झूठ को पहल देना आत्मिक कमजोरी ला सकता है और यह गलती ज्यादा न हों यह ध्यान नये वर्ष में हमें जरुर रखना चाहिए, सत्य को मन के पास रखकर। कोशिश करे नये साल में झूठ से ज्यादा सत्य वचन कहे।

सम्बन्ध :-
रहीम के दो दोहों पर गौर करते है ।
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय ।
टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परी जाय ।।
(रहीम कहते है कि प्रेम का नाता नाजुक होता है, इसे झटका देकर तोडना उचित नहीं होता। यदि यह प्रेम का धागा एक बार टूट जाता है तो फिर इसे मिलाना कठिन होता है और यदि मिल भी जाए तो टूटे हुए धागे के बीच में गाँठ पड़ जाती है।
*****

रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सो बार।
रहिमन फिरि फिरि पोइए, टुटा मुक्ता हार।।
( यदि आपका प्रिय सौ बार भी रूठे, तो भी रूठे हुए प्रिय को मनाना चाहिए, क्यों कि यदि मोतियों की माला टूट जाए तो उन मोतियों को बार बार धागे में पीरो लेना चाहिए।

रहीम दास जी कि इस सीख का हम अपने जीवन में कितना महत्व दे ये आज के वातावरण में कहना कठिन लगता है पर ये तय है हर सम्बन्ध की गरिमा प्रेम के तत्व पर ही निर्भर की करती है। प्रेम आत्मा से निकल कर आता है और हर सम्बन्ध को गरिमा से मान सम्मान देता है, हमें इसे स्वस्थ और स्वच्छ रखना भी चाहिए।सब के साथ प्रेम से रहने का संकल्प जीवन को भरपूर ऊर्जा की संपन्नता प्रदान कर सकता है। परन्तु, दुनिया सब लहजे से बदल रही है, सम्बन्धी, रिश्ते- नाते, समाज के आपसी सम्बन्ध कल तक जो दुनियादारी के हिस्से थे, आज वो सब व्यक्तिगत हो गए। यहां तक की एक ही छत के निचे रहनेवाले पति-पत्नी के सम्बन्ध में कुछ हिस्सा ही आपसी रह गया है। दिल की बाते अब दिल में ही रहती है, अपनों के वनिस्पत बाहरवालों के सहारे ही जिंदगी की समस्याओं का हल ढूंढना सही लगता है। व्यवहारिक दुनिया में आर्थिक क्षमता का भीतरी मूल्यांकन ही रिश्तों की प्रगाढ़ता तय करती है। आप किसी भी रिश्ते का खून का सम्बन्ध होनें पर भी उस पर प्यार और स्नेह का दावा नहीं कर सकते। समय आ गया है, आपसी खून से सम्बंधित रिश्तेनातों के प्रति हमें कुछ बदलाव अपनी सोच में करना पड़े जिससे कम से कम हमारा बाहरी प्रेम बना रहें। इनके बारे में ज्यादा सोचने से इंसान खुद ही तनाव भोगता है, जिससे जीवन को अप्रसन्नता ही मिलती है। कार्यकालि रिश्ते को हम अगर मधुर व्यवहार और कुछ आत्मिक प्रेम से संजो कर रखे तो वो हमारे लिए काफी सहयोगी हो सकते है। बाकी जिन घरों में आज भी प्यार और मान सम्मान का महत्व है, वहां किसी भीं नये संकल्प की जरूरत नहीं होती। समय अनुसार स्वयं को बदलने का संकल्प ही उचित है।

आत्मिक संकल्प:-

वर्ष जैसे विदा हो रहा है वैसे एक दिन हमें भी विदा होना है। हम में और उसमें एक ही सबसे बड़ा फर्क है, उसको हमने बनाया और हमें किसी अनजान शक्ति ने। हमनें वर्ष को सिर्फ गिनती तक ही मान्यता दी पर हमें तो नियति ने हजारों गुण – अवगुणों से युक्त होनें का मौका दिया है, जिससे हम अपने आने का उद्देश्य स्वयं में ही ढूंढ कर उस शक्ति को दुनिया से जाकर निराश न करे। हमारी रचना में दो पहलू पर शायद उसने ज्यादा ध्यान दिया और आत्मिक तथा संसारिक प्राणी हमें बनाया। धर्म और अधर्म की तराजू पर ही हमारी अगली गति तय होती है ऐसा हर धर्म शास्त्र बताता है और हमारा विश्वास भी यही है। हमारे सारे संकल्पों में सारे धार्मिक तत्व न हों पर नीति शास्त्रों पर विश्वास कर हमें हर संकल्प में अगर नैतिकता, संयम, प्रेम, धर्म, विश्वास जैसे तत्वों का विकल्प रखे तो निश्चित है, साल मधुरमय, ज्ञानोदय और आत्मिक हो सकता है। सभी के लिए नव वर्ष शुभता से सजकर आये, ये ही कामना लेखक करता है। गुजारिस भी है, इस लेख को उपदेश पाठ न समझे अपितु इसे जीवन सुधार विवेचना के रुप में ही परखे क्योंकि “To be beautiful means to be yourself. You don’t need to be accepted by others.You need to accept yourself”.-Thich Nhat Hanth.
**लेखक: कमल भंसाली**

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s