🍳बड़ा सोचो बड़ा बनो 🍳भाग 1 जीवन चिंतन♨ कमल भंसाली

Tryon Edward के अनुसार ” Thoughts lead on to purpose; purposes go forth in action; actions from habits; habits decide character; and character fixes destiny” उपरोक्त वाक्य जीवन की सच्चाई है, हम जीवन को भाग्य से पाते है। इसलिए जीवन की उपयोगिता पर हम अविश्वास नहीं कर सकते, परन्तु इसका दूसरा पहलू यह भी है हम जब जीवन को सही आस्था नहीं प्रदान करते और जीवन निराशा के तमस मे नीरस और गंभीर हो जाता है। कई बार हम इस अहसास का भी दुरुपयोग करते कि जो हुआ या होगा वो भाग्य का खेल है और विपरीत परिस्थितयों में अपने भाग्य को कोसते रहते है। प्रश्न किया जा सकता है कि, क्या जीवन में भाग्य की कोई भूमिका नहीं है ? इससे पूर्ण सहमत नहीं होना जरुरी नहीं भी हो पर इसे आंशिक सत्य जरुर मानना होगा। कुछ स्थितियां भाग्य के अस्तित्व के पक्ष में अपने दावे प्रस्तुत भी करती है, जैसे कि लाटरी का खुलना। परन्तु कर्म के बिना भाग्य निष्क्रिय रहता है, मसलन लाटरी भाग्य की बात मानी जाय तो यह भी सही है कि लाटरी का खरीदना कर्म है। स्वच्छ कर्म नहीं तो भाग्य का ऊर्जात्मक होना आनिश्चित घटना क्रम के अंतर्गत आता है। आज का युग अर्थ से ज्यादा प्रभावित है, सामाजिक मान प्रतिष्ठा भी काफी हद तक अर्थ पर निर्भर रहने लगी है। आज कर्म वो ही ज्यादा इज्जत दिलाता है, जिसमे अर्थ की भरमार भी हो। परन्तु यह सिर्फ सोच की भटकाव है, सत्यता से कोसों दूर भी है। चन्द सालों के जीवन के सफर में कोई इंसान किसी कृत्रिम सफलता से बड़ा नहीं हो सकता। इसलिए आज की जरूरत है ” बड़ा सोचो और बड़ा बनो ” इसे हम आज की हमारी दूसरी सबसे पसंदीदा भाषा इंग्लिश में कह सकते है ” Be big by big thinking”। इस संदर्भ में जानेमाने लेखक और विचारक Rudyard Kipling कहते है “Think big and your deeds will grow”। इस महान लेखक के व्यक्तित्व सुधारक सुझाव पर आज हम जरा गंभीरता से चर्चा करते है, और इसके नियामक सिद्धान्तों को अपनाने की कोशिश करते है, जिससे आनेवाला समय हमारे लिए सार्थकता को साथ रखे। यह चर्चा खासकर उस युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन सके, जो सिर्फ आर्थिक सफलता की तरफ झुकती जा रही है, और अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को नजर अंदाज कर के स्वयं के लिए एक अंधकारमय भविष्य तैयारी करते हुये भी उससे अनजान है।

बड़े विचार रखने वाला ही बड़ा कार्य करने का अधिकारी है, यह बात सही है पर उत्सुकता हो सकती है, आखिर सिर्फ बड़े विचारों से ही क्या इंसान बड़ा हो जाता है ? जीवन जीने की प्रक्रिया में ‘बड़े ‘ से क्या अभिप्राय है ? दोस्तों, जीवन पाना और जीवन जीना जिंदगी के दो संक्षिप्त तत्व है, जिन पर ज्यादा चर्चा हम नहीं कर सकते वो है, “जीवन पाना” क्योंकि उस पर हमारा कोई अधिकार नहीं है, कोई अनजान सृजनकर्ता का ही यह चमत्कार है। पर जीवन पाने के बाद उसे जीना हर प्राणी को अपने तरीको से जीने का अधिकार दिया गया। यहां सबसे प्रमुख बात जो समझ में आनी चाहिए कि देने वाले ने हमें जीवन दिया पर आकर उसने हमें कभी नहीं कहा कि देखो मैने जीवन दिया है । शायद यही वो पहला तत्व है, जो हमें बड़ी सोच का मालिक बनने में सहयोग दे कि “दो किसी को कुछ भी पर उसे अहसास न कराओ कि तुमने उसके लिए क्या क्या किया ” ? गौर करे जिसकी चर्चा खुद न कर दूसरे करे, उसका व्यक्तित्व प्रभावकारी और बड़ा होता है।
इस संदर्भ में रहीम जी का यह दोहा हमारा मार्गदर्शन करता है :
“बड़े बड़ाई न करे बड़ों न बोले बोल ।
रहिमन हीरा कब कहे, लाख हमारो बोल”।।
सीधी सी बात है क्षणिक अर्जित धन और उस से प्राप्त कीर्ति मेहमान बन आती है, और बिना सत्कर्म और आत्मिक व्यवहारिक कर्म की कमी के कारण शीघ्र विदा ले लेती है।

मानव जीवन विविध गुणों और अवगुणों का संगम है। हर प्राणी में प्राकृतिक गुण स्वयं अर्जित होते है, परिवार और सामाजिक परिस्थितियों के मूल्यांकन के अनुसार। ज्यादातर तकनीक गुण मानव अर्जित करता है अपनी आदतों के अनुसार या फिर दिमाग और मन की मिली गति के परिणाम अनुसार। पुराने समय में आदमी का दिमाग नैतिकता से ज्यादा बंधा होता था और अपने किसी भी महत्वपूर्ण कार्यों को अंजाम देने से पहले उसका मूल्यांकन पर्यवलोकन कर के करता और परिवार, रिश्ते और समाज पर पड़ने वाले प्रभाव की समीक्षा करता। आज युग बदल रहा ज्यादातर नकारत्मकता का चिंतन आज उन्नति को परस्व करने की सलाह देता है, जिससे इंसानी विचार बड़े होने की जगह हिंसक हो रहे है और सामाजिक सुरक्षा का खतरा दिनों दिन बढ़ रहा है। समय है, अगर हम नैतिकता के दृष्टिकोण से बड़े बनने की कोशिश करे। सवाल पूछा जा सकता है, आखिर नैतिकता पर ही इतना जोर क्यों ? इसका प्रमुख कारण यही है, संसार को भी स्वस्थ रहने के लिये पौष्टिक तत्वो की जरूरत होती है, और नैतिकता में इंसानी जीवन के सभी पौष्टिक रसायन होते है, जो हमारे किये अच्छे अच्छे कार्यो में समाहिस्ट रहते है और व्यवहारों से सदृष्ट हो दुनिया को उज्ज्वलता प्रदान करते है।

हमारी चर्चा में हम चिंतन को विभिन्न रूप से प्रस्तावित कर सकते है, पर जानते है, इसका सकारत्मक रुप ही सुहाना और सुंदर होगा अतः आदमी बड़ा वो ही होता है, जिसके जीवन मे सकारत्मकता का प्रभाव हो। कड़वा सच यह भी है, सब सकारत्मक नहीं होते, कुछ लोग जीवन मे नकारत्मक्ता के ज्यादा शिकार होते है और इसी स्वभाव वश बात कहने में उनकी निराशा और नकारत्मकता सदृश्य हो जाती है। जैसे डॉ. David Schwartz कहते है ” मान लीजिए आप कहते है, हम एक समस्या (Problem) का सामना कर रहे है। गौर कीजिए, यहां आप दूसरों को बड़े निराशावादी तरीके से यह बात कह रहे है। यहां आपसे जो संकेत आ रहे है वो किसी तरह की गंभीरता का अनुभव करा रहे, जिसका समाधन बहुत कठिन सा प्रतित लग रहा है । वहीं आप अगर कहते है कि हम किसी चुनौती (challenge ) का सामना कर रहे है, यहां हमारी भावनाओं में निराशा की जगह उत्साह और फुर्ती का वातावरण समाहित हो जाएगा। हम उस समस्या का निवारण बिना परिणाम की चिंता किये करने की कोशिश करेंगे। संक्षिप्त में यही कहना उचित होगा हम चिंतन से बड़े बने, सकारत्मक रहे, आत्मविश्वास कायम रखे, आशावादी सदा रहे और स्फूर्तिमय ऊर्जा हर कार्य में झलके, यही बड़े चिंतन का सार है। हमें अल्बर्ट आइंस्टीन का वह कथन सदा याद रखना चाहिए जब उन्होंने जीवन के प्रति हर इंसान को सचेत होकर जीने का संदेश दिया। उनके अनुसार ” एक सफल मनुष्य बनने का प्रयत्न न करो बल्कि एक उत्तम मनुष्य बनने का प्रयत्न करो “। बड़े चिंतन का प्रेरक और मुख्य तत्व होता है, कि जिंदगी चाहे छोटी हो परन्तु उसकी सकारत्मकता ऐसे व्यक्तित्व वाले लोगों को शीघ्र नहीं भूलने देती जो संसार में आये तो थोड़े समय के लिए परन्तु मानव उत्थान के प्रयास में अपना जीवन अर्पित कर अमर हों गये। इस संदर्भ में स्वामी विवेकानन्द का नाम याद आना उचित होगा और उनका यह कथन भी उन्हें काफी प्रेरणा देने वाला हो सकता है जो उत्तम जीवन जीने मे विश्वास करते है। ” Take one idea. Make that one idea your life – think of it and live on that idea. Let the brain, muscle, nerves, every parts of your body, be full of that idea, and just leave every other idea alone” . This is way of success” … क्रमशः लेखक ✍ कमल भंसाली

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