♻समझदारी♻ कमल भंसाली

“सब कुछ सीखा हमने पर न सीखी होशियारी, सच है दुनियावालों हम है अनाड़ी” राज कपूर अभिनीत फिल्म, ‘अनाड़ी’ का यह शीर्षक गीत जीवन की सच्चाई का आज भी एक पहलू है, जिसमें वक्त के अनुसार परिवर्तन के अंश जरुर नजर आते है, पर परिस्थितियों के अनुसार आज भी आदमी बहुत जगह अपने आप की समझदारी पर शंका करता है। चूंकि “समझदारी” ‘समझ’ शब्द से अलंकारित हुआ है, अतः  वर्तमान में “अनाड़ी” शब्द का प्रयोग सही नहीं हो सकता क्योंकि जिस समय फ़िल्म बनी थी उस समय हमारे देश में शिक्षा का प्रसार न्यूनतम था। आज साधनों आधारित जीवन के कारण अनपढ़ आदमी तकनीकी क्षेत्र में कुछ न कुछ सीख जाता है, परन्तु व्यवहार के क्षेत्र में भावुकता और मोह की अतिरिक्तता उसे कभी न कभी अपने  अनाड़ीपन का अहसास करा देती है।  परिणाम कि अज्ञानता वश अनपढ़ इंसान चतुर इंसानों से मात खा जाता।  ऐसा आज भी होता है, जब अज्ञानता का फायदा लेने में किसी को संकोच नहीं रहता।  वैसे तो हर देश की सामाजिक स्थिति में बदलाव आना एक स्वाभाविक क्रिया है, फर्क गति में ही होता है, हमारा देश में  स्वतन्त्रता के बाद शिक्षा का महत्व बहुत कम गति से बढ़ा, सीमित साधनों में रहने वाले परिवार शिक्षा से ज्यादा भूमिगत कर्म को ही ज्यादा महत्व देते थे। जातिवादी परम्पराओं से हर तरह के कार्य का एक क्षेत्र निश्चित था, उसी के अंदर शोषित हो अनपढ़ता के कारण दासता का शिकार हर इंसान अंदर से कमजोर होता और उसका फायदा संपन्न और पढ़े लिखे लोग बहुत बेखुबी से उठाते। चूंकि हमारा उद्देश्य सिर्फ यह समझने का है, क्या सिर्फ समझदारी की कमी का नुकसान सिर्फ कम दिमाग  वाले व्यक्ति की संम्पति  है। जी, नहीं, अति समझदारी में भी गलती होना भी निश्चित होता है, इसके कई मुख्य कारण हो सकते है, उनमें प्रमुख है:

1.समस्या को सही ढंग से न समझना
2. समय पर समस्या को न समझना
3. असंयमित जीवन शैली
4. भावुकता भरा निदान
5. अधूरा प्रयास
6. मानसिक अदृढ़ता
7. सत्य से दूर भागना
असफलता की परिभाषा को समझने के लिए हमें अपनी आंतरिक क्षमता का उपयोग करना सहज नहीं होता अतः हम अपनी नाकामियों को सहज कभी नहीं लेना चाहिए। प्रसिद्ध दार्शनिक प्लेटों ने कहा “ ignorance or knowledge, which is better ? Entire ignorance is not so terrible or extreme an evil, and is far from being the greatest of all; to much cleverness and too much learning accompanied by I’ll bringing- up, are far more fatal.
कभी बीती या वर्तमान की जिंदगी पर सरसरी नजर डालें तो हमें लगेगा हमारी इन कुछ कमजोरियों ने या तो समस्याएं पैदा की या मौजूद समस्याओं का समाधान सही नहीं होने दिया । भारत में सबसे ज्यादा चालाक कूटनीतिज्ञ विद्वान चाणक्य के अनुसार “कोई भी काम शुरु करने से पहले सदा अपने आप से तीन प्रश्न जरूर करने चाहिए: मैं यह काम क्यों कर रहा हूँ ? इसका क्या परिणाम हो सकता है ? क्या मैं  सफल परिणाम प्राप्त कर सकता हूँ ? उनके अनुसार इन प्रश्नों पर गंभीरता से चिंतन कर अनुकूल उत्तर के बाद ही कोई विशेष काम शुरु करना चाहिए”।
कहते है, अधूरा ज्ञान तो पूर्ण अज्ञानता से भी खतरनाक होता है। यह बात आज के युग के संदर्भ में ज्यादा सही है क्योंकि आज ज्ञान तो हर जगह बिखरा है,  पर अधिकता की कमजोरी होती है, उसको अगर कोई न संभाल पाये तो बिखरने में देर नहीं लगती। विडम्बना यह भी है  पहले तो बिखरे को समेटना सहज नहीं होता, दूसरे समेटने से दूसरे नकारत्मक तत्वों का  साथ आने का खतरा भी रहता है। अतः अपनी मानसिक शक्ति के प्रति जागरूक होकर उसकी क्षमता का सदुपयोग समझदारी में  करना सही हो सकता है,परन्तु ध्यान रखना सही होता है,कि भावुकता या उग्र आवेग में ये शक्ति निष्क्रिय भी हो सकती है। समझदारी तभी परिणाम सही लाती है, जब अवस्था, समय, और स्थिति के अनुरूपक निर्णय लिया जाय। मान लीजिए कोई आदमी अभी तक शान शौकत की जिंदगी जीता है और कोई कारण से उसकी आर्थिक हालात दब रहे है तो बिना देरी किये अगर वो अपनी जीवन शैली का बदलाव कर लेता है, तो उसकी क्षमता क्षीण होने के बजाय उसे क्षमता प्रदान कर सकती और शायद जल्दी ही वो वापिस अपनी आर्थिक स्थिति को सही जगह वापस भी ले आये। इस संदर्भ में कई उदाहरण हमारे सामने आते है, जब उनकी समझदारी को हम दाद देते नजर आते है, जब वो पूर्ण गिरने से पहले वापस खड़े हो जाते है।
अतः सब कुछ खोइये परन्तु समझदारी को सदा साथ रखिये, ये ही आज के जीवन की सही सच्ची जीवन संगिनी है ।
चूंकि आज हम उच्चतम शिक्षा के महत्व को समझने लगे है, उस सन्दर्भ में समझदारी की परिभाषा को जान को जान लेना उचित समझेंगे । जहां तक हमारे दैनिक जीवन की बात है, समझदारी का मतलब समझ बुझ कर लिया निर्णय और उसी अनुसार किये कार्य को हम तर्क संगत परिभाषा कह सकते है। वैसे अंग्रेजी में Sensibly इसके लिये सबसे उपयुक्त शब्द है। ऐसे दूसरे शब्दों में इस तरह भी समझा जा सकता है बुद्धिमान होने की अवस्था का भाव, युक्ति से पूर्ण होने का भाव या फिर भली बुरी बात समझकर उसे मूल्यांकित करने का भाव। दोस्तों हकीकत में समझदारी मनुष्य का स्वयं अर्जित गुण है, इसमें विशेषज्ञ होने के लिए संयम, धैर्य और संतुलित चिंतन सर्व पर्याय जरूरतें है। समझदारी को सौभाग्य का प्रवेश द्वार और बेवकूफी को दुर्भाग्य का द्वार ज्ञान शास्त्रों में माना गया है और ये भी हिदायत दी गई है तात्कालीन आकर्षण से बचकर, दूर की सोच का उपयोग कर किसी भी काम की प्रतिक्रिया और परिणति का रूप समझ कर स्थितियों के अनुकूल निर्णय लेकर प्रयास करना ही सही “समझदारी” है। न तो इस लेख का लेखक ये दावा कर सकता है कि वो समझदार है, न ही आप।  जब तक सही निर्णय के सफल फल हम प्राप्त करते रहेंगे, तब तक कि अवधि तक ही हम समझदार है, नहीं…तो सच है….गुनगुनाते रहिये …..✍ लेखक ..कमल भंसाली

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