अजनबी परिंदे

कुछ दूर ही, हम चले

साथ कब बैठे

अजनबी राहों में

कभी न कभी

मिलकर जुदा ही है, होना

एक पल को

तुमको पाकर, है, खोना

दूसरे पल का रहेगा, इंतजार

फिर, कभी, इस राह गुजरना

दिल भी करेगा

अजनबी इंतजार

परिंदे बन हम रहते

साथ साथ रहकर

अलग अलग उड़ते

कुछ….

 

अजनबी होकर भी

अच्छे लगे

कुछ कशिश है, तुम में

साथ और भी चलते

पर, सपने तो

कभी कभी

नयनों की झील में

हंस की तरह

धवल होकर तैर ते

किसी एक की

मुस्कान पर, दिल में

एक साथ, इतने

“कमल”

कभी कभी ही खिलतें

कुछ दूर…

 

होता कोई, छोटा सा

एक ख्याल

जो, दिल रखता संभाल

फूल अज्ञेय प्यार का

जब खिलकर, कुम्हलाता

तो खुले आसमां को

चमकने की

फरेबी सी सौगात

दे जाता

फिर कभी मिलने की

आहत चाहों की

उलझन, भरी राहें

तय करने, छोड़ जाता

बिछोह के कितने

दर्द फिजा में, बिखेर जाता

एक अजनबी मुस्कान

सुर्ख होठों पर

जब स्पर्श करती

जिंदगी बिन स्पंदन

एक क्षण को

ठहर कर, उस क्षण कों

अनेकश, सलाम करती

कुछ दूर

और साथ चलने को विवश करती…

रचियता

✍कमल भंसाली

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2 विचार “अजनबी परिंदे&rdquo पर;

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