👉संस्कार 👈🏃लुप्त होता आकार🏃✍कमल भंसाली

” संस्कार” शब्द की व्याख्या करने से पहले हमें जीवन की उस अनुभूति के बारे में हर दृष्टिकोण सेथोड़ा चिंतन करना जरुरी हो सकता है , जिनमे मानवीय संवेदना अपना अस्तित्व तलाश करती है। आज की भौगोलिक स्थिति में हमारी भूमिका की साख अगर कोई है, तो हमारे “संस्कार”। भारत की सम्पन्नता में आज तक संस्कार की अहम भूमिका रही और आज भी उसकी तलाश किसी ने किसी रुप में की जाती है। इस चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले हम यह जानने की कौशिश जरुर कर सकते है कि विरासत में मिली यह गुणवत्ता क्या हमारे जीवन में आज भी मौजूद है ? सच्चाई से अगर उत्तर दिया जाय तो कह सकते है, कि अब इसका अंतिम स्वरुप ही हमारे पास है, और वो भी रुग्ण अवस्था में। जरा गौर कीजिये, जिस देश में नारी को देवी और माँ, बहन के रुप में देखा जाता था आज उसकी स्थिति कितनी दर्दनाक हो रही है। जहां परिवारों में माता-पिता और बुर्जगों को सही सम्मान दिया जाता, आज वो अकेलेपन की हतासा के साथ जीवन बिताने को मजबूर हो रहे है। भारतीय जीवन कुछ समय से पहले तक दासता के अंतर्गत ही रहा, चाहे वो राजा महाराजाओं का था, या विदेशियों का, उसके अनुरुप ही साधनों की सीमितता भी थी । देश जब स्वतन्त्र हुआ, तब उसके सामने गरीबी एक चुनौती के रुप में सबके सामने खड़ी थी। देश बंट कर हमें मिला, पर समस्याओं के सहित। हमारी पुरानी संस्कृति के संस्कार की समर्थ भूमिका ने हमारे अभी के जीवन को बेहतर बनाने में अपना बहुत कुछ दाव पर लगाया। कहने को तो हम विकास के पथ पर आज काफी आगे की तरफ जा रहे है, परन्तु बहुत कुछ पीछे छोड़ कर, उन्ही में एक है, हमारे सुखी करने वाले संस्कार, जिनमे साधन कम पर आपसी प्रेम का न सूखने वाला सागर हमारे पास था। कहते है, सुख के कई आधार होते है, जिनमे मानव मन खुशियों के नये नये स्वरुप तलाशता है, मन की यहीं चंचलता उसे दुःख की राह पर ले जाता है। आधुनिक युग आर्थिक सम्पन्नता के साथ नवीन साधनों से सजा है, उसकी भव्यता के सामने सरल संस्कारों की एक भी नहीं चल रही, हर दिन बेदम होकर मर रहे है, हां वो संस्कार आज भी अपनाये जा रहे तोड़ मरोड़ कर, जिनमें भव्यता है।

‘संस्कार’ शब्द का अर्थ होता है, “शुद्धिकरण” और इसका सम्बंध मानव जीवन से एक जन्म से कई जन्मों तक चलता रहता है, जब तक उसे जन्म मरण की प्रक्रिया से छुटकारा नहीं मिलता, उसे हम निर्वाण की स्थिति कहते है, ऐसा हमारे ग्रन्थ बताते है। उनके अनुसार संस्कार के दो रुप हो सकते है, एक आंतरिक और दूसरा ब्राह्म रुप। आंतरिक रुप की रक्षा के लिए रीति रिवाजों का सहारा लिया जाता है, जो हकीकत में संस्कारों का ब्राह्म रुप ही हैं। इनका उद्देश्य की पूर्व जन्म से जितनी आत्मिक उन्नति हुई, उससे हम इस जन्म में आगे बढ़े।
ऐसा मानना है, कि भारतीय संस्कारों का निर्माण ऋग्वेद के अंतर्गत शुरु हुआ। संस्कारों का निर्माण आंतरिक आत्मा शुद्धि के साथ सामाजिक नियमों के तहत हुआ, जिससे जीवन को आनन्दमय और सक्षम धरातल मिले। “कुमारिल ” आठवीं सदी का एक तंत्रवार्तिक ग्रन्थ के अनुसार मनुष्य दो प्रकार से सक्षम होता है, पूर्व जन्म के कर्मो के दोषों को दूर करने से और नये आत्मिक गुणों के उत्पादन से। संस्कार ये दोनों काम करता है, इसलिए ज्ञानित पुराने भारत में संस्कारों की सदा विशिष्ठ भूमिका रही। गौतम धर्म सूत्र में संस्कारों की संख्या चालीस बताई गई, जिनमे जन्म, मरण, और विवाह सम्बंधित संस्कार ही आजकल ज्यादा नजर आते है, आत्मिक शुद्धि संस्कारों का आडम्बरों सहित प्रयोग करने के कारण अब संस्कारों की श्रेणी में रखने से संकोच आता है।

हमने संस्कार को ऊपर शुद्धिकरण बताया, क्योंकि जीवन को स्वच्छ रखना प्रायः सभी का लक्ष्य होता है, अतः हमारा हर कर्म संस्कारयुक्त हों, ऐसी दिनचर्या को अपनाना हमारा ध्येय होना चाहिए। जब आज हम आधुनिक और पाश्चात्य संस्कृति को अपनाने की कोशिश कर रहे है, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए, संस्कार वहां भी होते है और वहां संस्कार के कई शब्द है, जिनका वो अपने दैनिक कार्य को उत्कृष्ट बनाने में काम लेते है। आइये जानते है, संस्कार सम्बंधित कुछ शब्द :

*IMPROVEMENT * PERFECTING
*REFINING. * AN INBORN POWER OF FACULTY
*A CONCEPT. * INFLUENCE
*INVESTITURE
*WITH THE SA. * ANY OF VARIOUS ESSENTIAL SANCTIFYING OR PURIFICATORY RITES AS THE
FIRST TAKING OF SOLID FOOD
*REFINEMENT. * CEREMONY
*FINISHING. * ADORNING
*SACRAMENT * PURIFICATION
*( साभार इंटरनेट से )
संस्कार को culture और manners जैसे और भी कई शब्दों से पहचाना जा सकता है। शब्दों की ज्यादा व्याख्या करना यहां हमारा ध्येय नहीं है, अतः आगे बढ़े उससे पहले हम यह मान लेते है, जीवन को सुधारमय गति मानव निर्मित शुद्ध संस्कार ही दे सकते है। संस्कार नहीं होते तो परिवारों का प्रेम भरा निर्माण नहीं होता, रिश्तों की सही पहचान नहीं होती, बड़े, छोटों का ज्ञान नहीं होता, धर्म नहीं होता और शायद यह संसार भी व्यवस्थित नहीं चलता। आज समाज चारों तरफ से अव्यवस्थित और तनाव ग्रस्त महसूस कर रहा है, मान मर्यादाओं की आस्था भी कमजोर पड़ रही है, असत्य वचन बेधड़क इन्सान की जबान से फिसल रहे है, हालात इस कदर बिगड़ रहें है, कि आपसी विश्वास पर प्रश्नचिन्ह लग रहे है। आखिर, ये सब हालात क्या संस्कारों के पतन के कारण नहीं हो रहे ? सही चिंतन इसे नकार नहीं सकता।

अंत में एक सवाल सदा ही सबके लिए चिंतन की बात है, जिंदगी किसी को भी बार बार नहीं मिलती, दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं है, जहां मृत्यु नहीं पहुँचती, खुशहाल जिंदगी संस्कार के पेड़ पर ही उत्तम फल लगा सकती है, इस जीवन को संस्कार ही सही दिशा निर्देश बता सकता है। अति आधुनिक जिंदगी बिन प्रेम अकेलापन, तन्हाई, सन्त्रास, और दर्दीली ही होती है, उम्र की डगर पर। रुपये की अधिकता बिना संस्कार जीवन को साधनों का सुख शायद दे दे, पर शरीर और मन को खोखला कर देता है, तभी हम उन संस्कारों की बात करते है, जिन्हें हम ने अपनाने में लापरवाही की।

भविष्य का अगर सही निर्माण इस युग की जरुरत रही, तो निश्चित तथ्य स्वीकार कर लेना चाहिए, हमें संस्कार को अपनाना है, नहीं जो मिल रहा है, उसे स्वीकार कर लेना ही उत्तम रहेगा।

चार्ल्स डार्विन के अनुसार ” In the long history of humankind ( and animalkind, too ) those learnt to collaborate and improvise most effectively have prevailed. ”

चूँकि, संस्कार जीवन स्त्रोत्र है, हमें विरासत में मिलते है, अतः इनका पालन विनम्रता से किया जाना चाहिए, और हमें अपने बच्चों की शिक्षा में इसे सम्मिलित भी करने चाहिए, जिससे हम उनके साथ अपने जीवन का तालमेल रख सके। यही एक सही संभावना है, भविष्यत जीवन को खुशहाल रखने की।

विडम्बना है संस्कारों की आज का अति शिक्षित युवक उनके अपनाने को परतन्त्रता के संदर्भ में देखता है,और बीते युग की पुरानी विचारधारा समझ कर स्वयं को भी अपनाने से दूर रखता है। अपनी संतान को सिर्फ जीवन बिगाड़ने वाले आधुनिक साधनों का उपहार देता है। ये तो पंचतन्त्र की उस कहानी के उस ज्ञानी को सदृश्य करने जैसा लगता है, जिसमें नायक उसी पेड़ की डाल को काट रहा होता,जिस पर वो बैठा होता है। वक्त के साथ समझौता करना सही तब तक ही होता है, जब तक वो जीवन की गरिमा को दूषित नहीं करता। ध्यान दीजिए, जिस गांव में बारिश न हो, वहां की फसले खराब हो जाती है और जिस घर में धर्म और संस्कार न हो, वहाँ की नस्लें खराब हो जाती है । संस्कार संसार मे हमारे व्यक्तित्व को निखार सकता है, अंहकार नहीं-सही शिक्षा तो यही है।

संस्कारों को सही और उपयोगी रीति रिवाजों में खोजने से कई अमृतमय गुण प्राप्त होते है, जैसे प्रणाम, आशीर्वाद, प्रेम, स्नेह, विश्वास, अंहिसा, सत्य, समृद्धि, ज्ञान, तपस्या, शान्ति आदि, विचार कीजिये क्या इनसे संस्कारित होना अच्छा नही है ?

नहीं तो फिर कबीर के इस दोहें से हमें, अपने आप को सन्तोष देना होगा….

करता था सो क्यों किया, अब कर क्यों पछिताय ।
बोया पेड़ बबूल का , आम कहां से खाय ।।

लेखक* कमल भंसाली

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