🙋सुख का निर्माण 💆भाग 3 ✍कमल भंसाली

” नानक दुखिया सब संसार” इस अधूरे वाक्य की तर्ज पर अगर धर्म शब्द का दुरुपयोग होता है, तो अंधविश्वासों की गिरफ्त में फंस कर आम नागरिक बहुत कुछ खोता है। हम अपनी आदतों के वशीभूत होकर, जीवन से निराशित हो, कुछ दुःख को तो स्वयं निमन्त्रण देते है, मसलन आलस्य के कारण शरीर की गतिशीलता देने में असफल रहते है। कहते है, अधूरा ज्ञान भ्रम पैदा करता है, अतः चिंतन की शुरुआत में ही हम उपरोक्त दोहें की पंक्तियों को पूरा करते है। ” नानक दुखिया सारा संसार सो सुखिया जिस नाम आधार” गुरुवाणी की ये पंक्तिया जीवन के उस सत्य की और हमारा ध्यान केंद्रित करने को कहती है, कि विज्ञान लाख सीढ़िया ऊपर चढ़ जाए, पर उस सत्ता के आसपास भी नहीं फटक सकता जिसने हमारा निर्माण किया, अतः जो परम् है, उस पर अविश्वास करना जीवन का भटकाव है, और सुख का निर्माण बिना इस तत्व को स्वीकार किये असंभव है। गुरु नानक आम आदमी के विशिष्ट गुरु थे, जीवन की हर शिष्टता में उन्होंने सुख की संभावनाओं को तलाश करने का प्रयास किया, दूसरों के प्रति इसी सोच के कारण वो इंसान से संत हो गये। ये हमारा चिंतन ही है, जिससे हम जीवन में सुख और दुःख दोनों को निमंत्रण देते रहते है, इसलिए हमारे जीवन में कभी सुख, कभी दुःख का आगमन होता रहता है। आइये हम सुख निर्माण के कुछ सहयोगियों की तलाश शुरु करते है।

“जैसा चिंतन वैसा निर्माण” ये ही है, पहला तत्व जो जीवन मन्थन से हम प्राप्त करते है। एक सही चिंतन हमें भटकाव से रोकता है, और सीधे पथ पर चलने की सलाह देता है। तर्क की नहीं, मानने की बात है, सुख सरल होता है, निश्चित है वो सरल जीवन को पसन्द करता है। जीवन जब जब विचारों में राजनीति को महत्व देता है, तो अपने स्वभाव और प्रवृत्ति से उन्हें दृश्यत् कर देता है, और किसी भी आपसी सम्बंध को कटुता या मतभेद अनुभव भी करा देता है। कहीं ये प्रश्न भी दिमाग में आ सकता है, क्या सुख कोई इंसानी निर्मित पदार्थ है ? जो जीवन को संचालित और विचलित करता रहता है। आम धारणा और विश्वास है कि यह भाग्य और नियति के अनुसार ही इन्सान सुख और दुःख प्राप्त करता है। जी, हां, आप कुछ अंश तक सही भी हो सकते है, पर जरा उन तथ्य पर गौर कीजिये जो हमें अपने किये कर्म या कार्य से प्राप्त होते है। विश्वास कीजिये, सुख एक आभास है, अहसास है, जिसे हम हमारी स्वस्थ मानसिक परिस्थियों से अर्जित करते है। जरुरी नहीं हर लम्हें में सिर्फ खुशियों का समाचार रहे, कभी ग्रहण जैसी स्थिति से लम्हें भी भ्रम के दायरे में आ जाते है।

माना जा सकता है, दुःख एक सांसारिक जंगल का उत्पादन है, अतः इसमे जटिलता स्वभाविक है।पर सबसे बड़ी बात है, इसी जंगल में हमारा जीवन उद्धेश्य विचरण करता है क्योंकि ‘सुख’ हमारा चाहत तत्व एक खोज की क्रिया के अंतर्गत ही आता है। हमारा चिंतन अगर जीवन उद्देश्यों के प्रति स्पष्ट और साफ़ है, तो निश्चित है, हमारी सारी साक्षेप क्रियाये किसी भी कार्य को नकारत्मक्ता की शिकार नहीं होने देती। कभी कभी प्राप्त की हुई सफलताओं से मिले तनाव से बचाव भी सुख की प्रक्रिया होती है, ये मनोवैज्ञानिक सत्य है।

वक्त की समझ बहुत से सुखों का अहसास कराता है, मसलन हवाई यात्रा करनी है, समय से पहले एयरपोर्ट पंहुचना सांत्वना भरा सुखद अनुभव है, समय पर न पंहुचना कितनी अनचाही नकारत्मक परिस्थितियों का निर्माण करती है और उसके प्रभाव की गिरफ्त में आकर हमारा मन और तन विकृत हो जाता है, यह हम अच्छी तरह से जानते है। गुरु नानक की वाणी का अगर सन्तुलित अध्ययन किया जाय तो कई अप्रत्यक्ष तथ्यों से हम उनकी जीवन के प्रति सामयिक चैतन्य की अद्भुत मिसाल का आनन्द ले सकते है। सी राजगोपालचारी जो भारत के अंतिम वायसराय थे, उन्होंने एक बार कहा कि “बिना बुद्धिमता के सारा ज्ञान अप्रभावकारी हो जाता है, और उसका जीवन के सन्दर्भ में कोई मूल्य नहीं रहता” ।

अगर वक्त की तराजू पर किसी देश की विरासत का मूल्यांकन किया जाय तो उसकी संस्कृति के आत्मिक उत्थान के प्रयास को समझना जरुरी है, कहने में कोई संकोच हमें नहीं होगा इस क्षेत्र में हमारा देश सर्वश्रेष्ठ ही समझा जाएगा जिसने जिंदगी का सन्तुलन सुख दुःख की तराजू पर बनाये रखने की सतत चेष्टा की । “सुख और दुःख दोनों को जीवन का मुख्य तत्व माना है ” प्रसिद्ध लेखक TSH OXNREIDER ने इस तथ्य की प्रमाणिकता को कुछ इस प्रकार स्वीकार भी किया ” Two opposing things can be equally true …. Love to travel and I love my home”।

भारत ज्ञानियों और संतों का देश रहा है, यहां ज्ञान को सुख का आधार माना गया है, विपरीत स्थितियों में अर्जित ज्ञान सफलता व सुख के नये द्वार खोल देता है। ज्ञान की सर्वश्रेष्ठ विशेषता यह है कि सीमित जीवन को असीमित ऊंचाइयों तक पंहुचा देता है, ऐसे कई उदाहरणों से इतिहास भरा है, स्वामी विवेकानन्द उनमें से एक है। अतः सही यही है, जीवन में सुख का निर्माण इंसान के चिंतन पर ही निर्भर करता है। वक्त का मूल्यांकन कर अगर हम सही चिंतन की क्षमता रखते है, तो निसन्देह हम सुख के स्वयं निर्माता बन सकते है। क्रमश…..लेखक: कमल भंसाली

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