🙆सुख का निर्माण🎅भाग 2💆अनुसंधानिक तत्वों की तलाश✍कमल भंसाली

सुख दुःख दोनों की भूमिका का अगर विश्लेषण करने की प्रक्रिया को हम आगे बढ़ाते है, तो उनमें जो एकमात्र सहमति नजर आती है, वो सिर्फ मानव जीवन के सन्दर्भ में है। दोनों का मानव जीवन को निरन्तरता का बोध देना है। दोनों तत्व इसके अलावा मानव जीवन में विरोधाभ्यास का अनुभव देते रहते है, क्योंकि दोनों का आधार अलग अलग स्थान से आता है। सुख की मन से आशिकी है, मन को जो भा जाये वो सुख की अहसासित ऊर्जा बन जाती है। शरीर की चाहत भोगिक होती है, वो जब तक किसी चाहत को भोग नहीं लेता और उससे सन्तुष्ट नहीं होता तब तक किसी भी प्रकार की सुखमय ऊर्जा ग्रहण नहीं कर पाता। इसलिए शरीर को भोग वासना का पुजारी भी कहा गया है। अगर हम मन व शरीर के सुख दुःख की जरूरतों का विश्लेषण करे तो प्रमुख अंतर यही नजर आता है, कि शरीर की चाहते (Desires) अर्थ शास्त्र के सिद्धांत LAW OF UTILITY से काफी प्रभावित है। इस सिद्धान्त के अनुसार शरीर की भूख उपयोगिता पर निर्भर करती है। ज्यों ज्यों शरीर किसी भी वस्तु या पदार्थ का भोग करता है, उसी अनुसार उसकी तृप्ति उस वस्तु या पदार्थ के प्रति बढ़ती जाती है, तो एक स्थिति पर जाकर उसका लगाव उस वस्तु या पदार्थ के प्रति समाप्त होने की आशंका शुरु होने लगती है। पर मन की स्थिति चंचलमय बनी रहती है, उसकी दूसरी चाहते कभी सन्तुष्ट नहीं होती सदा ही उकसाती रहती, “मन मांगे और ( more)” ।

यहां सुख और दुःख के तत्वों का गहराई से विवेचन करना और समझना बहुत जरुरी है। मानव प्रवृति की सबसे बड़ी नासमझी यही है, जो उससे जुड़ा उसको उसने कभी ठीक से नहीं समझा। “जीवन जीना भी एक कला है” जरा इस वाक्य पर आज ध्यान दीजिये, बहुत ही कलात्मक व्यक्तित्व के निर्माण की तरफ इशारा कर रहा है। पर हम इससे परिचित होकर भी अजनबी जैसा व्यवहार करते है, जब की खुशियों के निर्माण में इसकी बहुप्राविधिक भूमिका बेमिसाल है। जिसमें सुख दुःख दोनों को बुद्धिमानी से विवेचना करने की सलाह है, तथा उन्हें जीवन में कैसे सन्तुलित तरीके से अपनाया जा सकता है के प्रति एक चेतनात्मक रवैया रखने की भी सलाह भी है। अगर जिंदगी के प्रति हमारी संजीदगी है तो हमें सबसे पहले इस तथ्य को स्वीकार भी कर लेना चाहिए, वस्तुतः जीवन कोई साधारण नहीं होता, वो तो सब तरह के असाधारण अस्त्रों से सुसज्जित होकर ही इस धरा पर आता है। हम ही उसके मालिक और चालक दोनों है। हमारी नादानी कहिये या नासमझी हम उन्हे अपने अनियंत्रित मकसदों के सामने बिना कोई योजना के गलत प्रयोग करते है, अतः साधारण मानव बन रह जाते है। जबकि सुख चिंतकों ने हमसे सदा आग्रह किया कि ” Happiness is not something you postpone for the future; it is something you design for the present.” Jim Rohan, author.

ये जानना भी शायद हमारे लिए दिलचस्प हो सकता है, कि सुख दुःख कौन कौन सी गलियों से होकर हमारे जीवन क्षेत्र में प्रवेश करते है। इसके लिए हमें अपने दैनिक जीवन में सतत कायम रहनें वाली कुछ सकारत्मक ऊर्जाओं से दोस्ती करनी पड़ेगी, उनका नाम उत्साह, उमंग, जोश जैसे तूफानी शब्द है। जिसे आप और हम इंग्लिश में शायद एक शब्द से समझ जाये, जिसके बारे में Robert Heaven Schaeffer फरमाते है ” Enthusiasm is the thing that makes the world go round. Without its driving power nothing worth doing has ever been done. It alleviates the pain of poverty and the boredom of riches. Apart from it joy cannot live. Therefore, it should be husbanded with zeal and spent with wisdom. To waste it is folly; to misuse it, disastrous.”।

हम जरा आगे बढ़े, उससे पहले हमारा यह तय करना जरुरी हो जाता है, कि क्या हम हकीकत में जीवन को जी रहे है, या उसे निभा रहें है ? क्योंकि दोनों ही दो छोर है, आखिर जीवन यात्रा को पूर्ण करने के लिए हमें एक छोर से शुरु होना ही होगा। जिन्होंनें निभाने वाले छोर की यात्रा पसन्द है, उनके लिए यहां कहने को कुछ नहीं बचता, सिवाय शुभकामनाओं परन्तु जिन्होंने जिंदगी के कर्मठ छोर को अपना मकसद माना, उन्होंने अपनी क्षमताओं का सदुपयोग कर कई तरह की सफलतायें अर्जित करने की चेष्टायें की, सही मायनों में उन्होंने जीवन में रोमांच से कई तरह की खुशिया हासिल भी की है।सुख और दुःख भी एक मनोविज्ञान का विषय है, इसे हम भाग्य से जोड़ते है, सन्तोष के लिए सही हो सकता है। कुछ मनोवैज्ञानिकों ने सुख और दुःख की अनुभूति को व्यवहारिक कुशलता का परिणाम भी बताया, पर इसकी सीमितता से इंकार नहीं किया जा सकता। वैसे देखा जाय आदमी का अपना चिंतन भी सुख दुःख का निर्माण करता रहता है। कभी बिना कारण भी नकारत्मक चिंतन से दुःख का अहसास होता है। प्राकृतिक आपदाए, शारीरिक बीमारियां जैसे दुःख इंसानी क्षमताओं की परीक्षाये होती है, जब तक ये हादसों में परिणित नहीं होती तब तक आदमी इनसे असहनीय दुःख नहीं पाता। जीवन निभानेवाले आदमी का चिंतन इन्हे दुःख का कारण मान ले पर निर्भीक आदमी इनका मुकाबला करता है।

माना जा सकता है, सुख दुःख कोई कारखाने का उत्पादन नहीं कि तादाद में जमा किया जा सकता अगर ऐसा होता तो यहां कुछ भी नहीं लिखा जा सकता क्योंकि फिर दुःख का उत्पादन कोई नहीं करता, सुख सस्ता हो जाता और नीतिगत बात यह भी सही है, कि सस्ते को खरीदने में भी मजा नहीं आता। अतः सुख का निर्माण किया जा सकता है,पर उसका उत्पादन नहीं। निर्माण और उत्पादन का फर्क एक एक ईंट को सजाकर भवन निर्माण करने वाले कारीगर से जांनना उचित होगा।

निर्माण एक कलात्मक क्रिया है, अतः जरुरी हो जाता है जानना कि हमारा अंतर्मन किस तरह की खुशियां चाहता है, और उसके चिंतन की क्षमता किस तरह की है। शरीर का हर अंग कारीगर नहीं होता, कुछ अंग सिर्फ समान इकट्ठा करने का काम कर सकते है। खुशियों को शरीर के धरातल की मजबूती चाहिए, ये पहला नियम हमें सदा ध्यान में रखकर हमें अपने स्वास्थ्य में सन्तुलन बनाये रखना चाहिए। चाणक्य नीति के अनुसार आलस्य शरीर का सबसे खतरनाक शत्रु है, उससे दोस्ती का मतलब हम जिंदगी में कभी अपनी ख़ुशी की चाहत नहीं कर सकते। ऐसी अवस्था वाले इंसान के लिए बेहतर है, वो दूसरों को खुश देखकर स्वयं खुश रहे।

आल्स्योपहता विद्या परहस्तगताः धनम् ।
अल्पबीजं हतं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम् ।।

आलस्य विद्या को नष्ट करता है। दूसरे के अधिकार में गया धन वापस नहीं आता। कम बीज वाला खेत नष्ट हो जाता है। बिना नायक के सेना हार जाती है। …चाणक्य निति

लेखक चेस्टरफील्ड का मानना है ” आलस्य मूर्खो का अवकाश दिवस है ” ।

विचारक जेरिमी टेलर तो यहां तक कहते है, ” आलस्य जीवित व्यक्ति की मृत्यु है ”

पर श्री मलूकदास जी ने आलस्य करने वालो को यह कहकर बहुत शान्ति दी …..

“अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम,
दास मलूका कह गए सब के दाता राम” ।

अर्थ- अजगर को किसी की नौकरी नहीं करनी होती और पक्षी को भी कोई काम नहीं करना होता, ईश्वर ही सबका पालनहार है, इसलिए कोई भी काम मत करो ईश्वर स्वयं देगा।

दोस्तों युग परिवर्तन नियम के अनुसार ऐसे कथन अमान्य की श्रेणी में आते है, अतः इसे चेतावनी ही समझे, क्योंकि सुख की अनुभूति ही सिर्फ सर्वश्रेष्ठ जीवन की चाहत हो सकती है। लेखक ***✍ कमल भंसाली …..क्रमश….

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