⛷क्या वाकई जिंदगी ऐसी ही होती⛹कमल भंसाली

नयनों में
रुका जल
जब पलकों को भिगोता
स्वप्निल होने का अहसास
जिंदगी बहुत करती
पर
बिखरी यादें
बहुत परेशां करती
भूलभुलैयाँ सी
बचपन की गलियां
तंग होती उम्र की
संकड़ी नालियां
कितना कुछ बहा ले जाती
उदासियों की सलवटे
निस्तेज चेहरे पर
सिर्फ पढ़ने को छोड़ जाती
बीते पलों पर
अफसोस करती दीवानी
क्या वाकई ऐसी ही होती जिंदगानी !
🎷
यौवन की बेबस खुशबू
जब भी घायल दिल को सहलाती
अपने अस्तित्व पर
गरुर करती मखमली हसरते सो जाती
दिलाशा स्वयं को देती
उम्र की गरिमा की बात करती
जिन पगडंडियों से
कभी गुजरा जीवन का काफिला
आज सुनसान
इतना अकेला
हर परछाई में तन्हाई
उस पर सन्नाटों का जनाजा
कभी जो थी रिश्तों की रानी
आज बेबसी की निर्वासिनी
क्या वाकई ऐसी ही होती जिंदगानी !
🎼
जो नयन
दम भरते थे अपनेपन का
आज अहसास दे जाते
अपने पराये पन का
शंकित मन
चाहता कुछ समाधान
जिनके उत्तर कहां आसान
मुखोटों पर
दिखता आजकल
सम्बन्धों का श्मशान
🎻
क्यों होती रिश्तों की अनचाही बिरदारी ?
क्यों होती उन्हें निभाने की जिम्मेदारी ?
हर बन्धन की क्यों होती कमजोर डोरी ?
ढलती उम्र के पँखो की ये कैसी मजबूरी ?
📻
प्रेमित सांसे देह को जब तक सहलाती
हर अपनत्व की खुशबू पर मुस्कराती
निस्सहाय हो जब निढाल हो रही होती
आत्मिक अनुभव को ही पास बुलाती
जीवन सार, “त्याग”, पल में समझ जाती
📣
मिट्टी के देह की ये दास्तन
आने के बाद, बचता प्रस्थान
सिर्फ सत्य ने नहीं बदली पहचान
हर युग की देन मृत्यु नहीं आसान
इसलिए जी लेना धरा निवासनी
दुखः सुख है, सब एक समान
अंतर्मुखी फूल की सूरज मुखी कहानी
एक स्पर्श, एक स्पंदन, साँसों की संगिनी
क्या वाकई….🎧 ✍रचियता कमल भंसाली

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