👚सुख का निर्माण👚भाग 1✍ कमल भंसाली

मानव जीवन एक मूल्यवान उपहार है, जिसमें खुशियों की कोई सीमा नहीं पर हम अपने ही व्यक्तित्व कि जानी अनजानी गलतियों के कारण उन्हें दुःख के आवरण में ही तलाश करते नजर आते है। सच्चाई हर जीवन का आधार है, यहां तक की हमारा शरीर भी अपनें अंगों पर पूर्ण विश्वास इसलिए करता क्योंकि उनकी कार्य प्रणाली में सच का तत्व समाया है। उसी की बदौलत हम शरीर की स्वस्थता पर निर्भर होकर अपने जीवन क्षेत्र की विस्तृता को नये नये आयामों से सजाने की कोशिश करते रहते है। सभी खुशियां भाग्य और वक्त की सौगात नहीं होती, हकीकत में ज्यादातर खुशिया हमारे दैनिक जीवन के कार्य क्लापों में ही निहित रहती है। यानी यह कहा जा सकता है, कि खुशियों का निर्माण भी किया जा सकता है। दो सवाल यहां स्वयं से करना उचित होगा, पहला फिर करते क्यों नहीं ? दूसरा क्या करना कठिन है ? शायद, पहले सवाल का जबाब हर एक के पास है, खुशियों को भी सच्चाई और ईमानदारी चाहिए, और इंसान का पूर्ण सच्चा होना बहुत कठिन है, क्योंकि एक सामाजिक व्यवस्था में रहने की उसकी मजबूरी है। जहां तक कठिनता का सवाल है, उसमें यही कहा जा सकता है, जीवन अगर अपनी संक्षिप्त उपलब्धियों से सन्तुष्ट होता है, और अति भोगवादी प्रवृत्तियों के आकर्षण से ग्रसित नहीं होता तो सुख के क्षणों का अनुभव विपरीत परिस्थितयों में महसूस करता रहेगा। हमारी कई आत्मिक और मानसिक कमजोरियां ही हमें कठिनता का अनुभव ज्यादा कराती है और हम हर दुःख को भाग्य की देन मान लेते है। इस सन्दर्भ में पुरानी फ़िल्म “दोस्ती” का एक गाना काफी हद तक इस बात का समर्थन करते नजर आता है, कि जीवन में सुख और दुःख एक सिक्के के दो पहलू है, अतः उनके बदलते पहलू पर न गौर करे तो भी सिक्के की वही कीमत रहेगी। गाने के बोल कुछ इस तरह से इस स्थिति का अनुभव कराते है, ” राही मनवा दुःख की चिंता क्यों सताती है, दुःख तो अपना साथी है, सुख है एक छांव ढलती आती है जाती है” ।

प्रायः सभी धर्म विशेषज्ञ यही कहते संसार दुःख का सागर है फिर वो इसके विपरीत यह भी कहते है, मानव जीवन अनमोल है। यहां तथ्य कुछ दूसरा है, जो शायद हम नहीं समझ पा रहें है, सृष्टि की मेहरवानी ही मानव जीवन है, दूसरे श्रेणी के जीव जन्तु जिनमे भी सजीवता है, काफी हद तक बेबस और लाचार होकर जी ते है। अतः स्पष्ट है, मानव जन्म पाना ही जीवन की पहली और मृत्यु अंतिम खुशी है। यहां प्रश्न उभर सकता है, मौत ख़ुशी क्यों है ? इस सवाल के उत्तर को सही ढंग से समझने से पहले हमें ख़ुशी को परिभाषित करना होगा, हमें समझना होगा आखिर कौन सा अनुभव और अहसास हमें सुख दुःख का अहसास देता है। संक्षिप्त में हम यों भी समझ सकते है कि सुख और दुःख का संबध अनुकूलता और प्रतिकूलता से होता है। जीवन- दर्शन के जानकारों के अनुसार सृष्टि का निर्माणिक तत्व ‘सृजन’ विसर्जन की देन है, उनके अनुसार विसर्जन होने से ही सृजन हो सकता है। वो तो ये भी कहते है, मानव भी विसर्जन की देन है।
सुख का निर्माण कोई अगर करना चाहता है, तो उसे इस सिद्धान्त को अपने अंदर तक तलाशना होगा। उदाहरण के तौर पर जब कोई आदमी किसी भी वस्तु का दूसरों के हित में विसर्जन करता है, तो निश्चित ही सुख की कुछ बूंदों की अनुभूति का आत्मा में सृजन जरुर महसूस करेगा, चाहे उसकी अवधि संक्षिप्त ही क्यों न हो।

एक अंग्रेज संत फैड्रिक लेविस डोनाल्डसन् ने सन् 2015 में अपने प्रवचन में एक प्रश्न के उत्तर में बताया कुछ हमारे किये सामजिक पाप ( Sins )भी होते है, जिनके कारण मानवता को दुःख झेलने पड़ते है।उनके अनुसार वो है:

1.बिना कर्म किये पाया धन
2.बिना विवेक की हुई अय्यासी
3. बिना चरित्र के पाया ज्ञान
4. बिना नैतिकता का व्यापार
5. बिना मानवता का विज्ञान
6. बिना त्याग की पूजा
7. बिना सिद्धांतों की राजनीति

आज की जीवन पद्धति के संदर्भ में उपरोक्त बातों को काफी सीमा तक सही ही माना जाएगा। क्योंकि आज हम रोज अनजाने भय के अंतर्गत ही अपना दैनिक जीवन जीते है। आज कहनें को शिक्षा का प्रसार उच्चतम स्तर पर हों रहा है, पर संस्कारों का होता क्षय शरीर को अति भोगवादी बना कर मानव को इतना कमजोर बना देगा कि शरीर कोई भी हिस्सा मानसिक और आत्मिक सुख के लायक ही नहीं रहेगा। प्रकृति और समय को समझ अगर इंसान संयमित रहें तो वो कई छोटे छोटे सुख के बिंदु अपने दैनिक जीवन में महसूस करता रहेगा। चूंकि हमारे देश में सदा आध्यात्मिक समझ रही है, अतः प्रेम का विस्तार यहां प्रत्येक दिल तक होता आया है। हालांकि हम आज समय का खेल कहकर हर दुःख का निवारण करनें की कोशिश जरुर करते है, पर दिल में तो गम का धुंआ हमारे दिल में प्रेमित शिराओं में सुख की जगह दुःख का ही निर्माण कर रही है। समझने की बात है, सही समय पर रोग की पहचान और उसका सही निदान की कोशिश करना सुख निर्माण की तरफ पहला कदम है। शरीर, मन, आत्मा के प्रति हमारी सचेतना ही सुखी जीवन का आधार है। अतः स्वयं की सक्षमता को ही पहला सुख कहा जा सकता है।

सर्व परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् ।
एतद विद्यातस्मासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ।।

दूसरे पर आधार रखना पड़े वो दुःख, स्वयं के आधीन हो वो सुख; यही सुख दुःख की संक्षिप्त परिभाषा है।

क्रमश….लेखक कमल भंसाली

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