🍀कर्म का मर्म🍀धर्म के मर्म का दूसरा चरण🌷कमल भंसाली

तय है, “धर्म” स्वयं ही परिभाषित होता है, यह कोई मीमांषा का मोहताज भी नहीं होता। जो लोग दैनिक कर्तव्य को धर्म से जोड़कर जीना चाहते, वहां धर्म उनकी आत्मा की पहरेदारी करता नजर आता है। जीवन सभी को सहजता से जीनें के लिए ही मिलता है, पर इन्सान अपने जज्बातों के साथ उदारता बरतने लगता, तो कठिनाइयों को रास्ता मिल जाता और जीवन अविलक्ष्य होकर अवैध मंजिलों की चाह रखने लगता है। आत्मिक अनुसंधान और उससे अर्जित अनुभव ही एकमात्र इस अवस्था का समाधान हो सकता है। अगर हमारे दैनिक कर्म करनें की प्रवृत्ति में नैतिकता समावेश हो, जो साधारण चिंतन में विश्वास रखने वाले के लिए एक असहज क्रिया है क्योंकि चाहतों का चक्रव्यूह में फंसा मन जल्दी से उसे तोड़ नहीं सकता। ऐसी स्थिति में ‘धर्म’ शब्द ही उसे एक संकेतक चेतावनी जरुर देता है कि अति भोग जीवन की मूल्यता नहीं समझ पा रहा अतःउसे नैतिकता से परिचय कराना जरुरी है। प्रलोभ से घिरा इन्सान अपनी इस जगत की असहज महत्वकांक्षाओं के कारण नैतिकता को महज एक बाहरी ही तत्व समझता है, और भूल जाता है, कि नैतिकता और धर्म एक दूसरे के पूरक है, कह सकते है, उनका ‘चोली दामन’ का साथ है। यहां अब जरुरी हो जाता है यह बताने के लिए की धर्म के दस तत्वों का संगम ही ” नैतिकता” है। बिना कर्म नैतिकता की कोई भी परिभाषा नहीं बनती, सही कर्मों को समझ सही ढंग से करना ही ” नैतिकता” है। चूँकि नैतिकता धर्म के साथ हमारे जीवन से जुडी है, अतः संक्षिप्त में नैतिकता की परिभाषा नीति शास्त्र के ज्ञान और उसके अनुरुप किया जानेवाला आचरण होता है। जिसे हम इंग्लिश में morality, moral और ethics जैसे और कई शब्दों के रूप से जानते है।

ध्यान देने की बात है, अतः गंभीरता के साथ हमें यह स्वीकार कर लेना होगा हर जीवन की एक सीमा रेखा होती है, उन सीमाओं के अंतर्गत हर कर्म की अपनी गुणवत्ता होती है, इस गुणवत्ता के विरुद्ध किया हर कर्म अनैतिक और अधार्मिक गिना जा सकता है। जीवन की सत्यता वो ही समझ सकता है, जो सत्य की सत्ता स्वीकार करनें में संकोच नहीं करता। जिसने संसार या इस सृष्टि की सरंचना की उसने बहुत सोच समझकर मानव की भूमिका तय की है। प्रकृति को हम किसी भी दृष्टि से निहारे, अच्छी लगती इसका एक ही कारण है, सत्य सुंदरता का मालिक है, और संसार में सत्य की चाहत हर किसी को होती है। सत्यता की मजबूती कभी कोई भी झूठ कम नहीं कर सकता, यह बात और है, कुछ समय के लिए वो सत्य से इंसान को दूर कर देता परन्तु सत्य से सामना होते ही वो स्वयं अदृश्य हो जाता पर अपने नुकसान कारी प्रभाव से मानव जीवन की मुश्किलें बढ़ा जाता। कहते है, “झूठ के पाँव नहीं होते” पर दिमाग तेज होता है क्योंकि हर अवगुणों का नेता होता है, अतः उसके चालाक होने पर कोई आश्चर्य भी नहीं होता।

अगर देखा जाय तो हर नैतिकता की कसौटी ‘सत्यता’ ही होती है, आदमी द्वारा कि हर धार्मिक क्रिया अस्तित्वहिन ही रहती है, जब तक वो आत्मा में स्वर्ण शुद्ध “सत्य “को जगह देने के लिए “पूर्ण ईमानदारी” से स्वयं को तैयार नहीं कर लेता। जैसे शरीर अपनी दैनिक क्षुधा शांत करने के लिए भोगवादी बन नाना प्रकार की इच्छायें जागृत करता है, ठीक वैसे आत्मा अपनी पवित्रता की महत्वकांक्षा के लिए हर दैनिक कर्म में एक निष्कलंक सत्य की कामना करती है। हालांकि दैनिक जीवन की परिस्थितया इन्सान को मजबूर और कमजोर बना देती है, और वो आत्मा की कामना पूर्ण करने में अपने आप को ज्यादातर अक्षम ही पाता है। अतः साधारण इन्सान की उपलब्धिया अगर साधारण रहती है, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये, क्योंकि साधारण और असाधारण का असमान्य फर्क ही तो उसे इस संसार में मान सम्मान का अधिकारी बनाता है।

सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रवि: ।
सत्येन वायवो वान्ति सर्व सत्ये प्रतिष्ठतम्।।

( सत्य से पृथ्वी का धारण होता है, सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से पवन चलता है , सब सत्य पर आधारित है )

अगर उपरोक्त श्लोक के अर्थ पर गौर करे तो यही कहना सही होगा की “सत्य ही जीवन” है। झूठ का जंगल कितना ही विस्तृत क्यों न हो जाये, सत्य की समर्थता को वो कभी भी नहीं छू सकता।

हम बात नैतिकता के सन्दर्भ में आगे बढ़ाये तो स्वभाविक है, एक सवाल हमें परेशान कर सकता है, लालच, मोह, क्रोध, स्वार्थ और कई क्षणिक गलत अवस्थाओं में नैतिक तत्वों की क्यों कमी हो जाती है ? यहां हमें कंफ्यूश के उस कथन को प्राथमिकता देनी होगी जब उन्होंने इसी तरह के एक सवाल में जबाब दिया,” Wisdom, compassion and courage are the three universally recognized quality of men.” यानी एक श्रेष्ठ इंसान हमेशा नैतिकता के बारे में सोचता है, साधारण इंसान केवल सुविधा के बारे में सोचता है। तो क्या सुविधाओं को नैतिकता का शत्रु समझा जाय। शायद कदापि नहीं क्योंकि जरुरी सुविधाये इंसानी जीवन के लिए जरुरी है। कहते है ‘अति’ हर साधन की सही नहीं होती क्योंकि उसकी चाह में नकारत्मक तत्व अपना अस्तित्व बोध इंसान को नैतिक चिंतन से दूर करने की कोशिश करते है और देखा गया भी है अति साधनों की भूख कभी तृप्त नहीं होती।

मानव और उसका व्यक्तित्व काफी हद तक एक ही तलाश के मालिक है, जिनकी चाह होती है उन्हें सही उद्धेश्य प्रेरित, आनन्दित जीवन की प्राप्ति हों, और उसके लिए उन्हें संसारिक जीवन धारा की गतिविधि में नैतिक तत्वों का उचित समावेश रखना होगा। चूँकि नैतिकता हर कर्म में लिप्त रहती है, और उसका अदृश्य भाग दैनिक जीवन का मूल्यांकन, देश, समाज, जाती, भाषा, धर्म आपसी मानव सम्बन्धो के दिशा निर्देश के अनुसार तय करता रहता है। नैतिकता का मतलब मानवता की मर्यादा को आत्मिक सुरक्षा प्रदान करना होता है, क्योंकि सृष्टि की रचना करने वाले ने सजीव प्राणियों में सिर्फ मानव को असीमित अधिकारों से साथ सर्वश्रेष्ठ बुद्धिमता का वरदान दिया है। अतः सृष्टिकर्ता कभी नहीं चाहेगा उसकी गलत धारणाओं का अंजाम बाकी की मानवता को भोगना पड़े।

हमारे सांसारिक साधारण जीवन के सम्बंध में नैतिकता की जो सही परिभाषा Potter Stewart के अनुसार दी जो सकती, वो ” “Ethics is knowing the difference between what you have right to do and what is right to do” है।
क्रमश…..लेखक: कमल भंसाली

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