💅कर्म का मर्म “धर्म” ✍कमल भंसाली✍ प्रथम चरण

“धर्म” मानव के लिए सिर्फ एक शब्द नहीं अपितु एक सुखद आत्मिक स्पर्श है, साथ में मानव कर्म की सात्विकता के अंश की मीमांसा भी है। सीधा साधा धर्म किसी भी भव्यता का भी मोहताज नहीं है, न ही वो आडम्बरों और पंथो की डोर से बंध कर कोई नीतिगत सिद्धांत तय करता है। इंसानी फितरत धर्म की लाखों परिभाषाएं बना ले , पर सच यही है, “धर्म कभी भी प्रदर्शित नहीं होना चाहता”, वो हमारे दैनिक कर्मो द्वारा अर्जित परिणामों के फल से स्वयं ही दृष्टिगत हो जाता है। धर्म का सम्बंध हर जीवित प्राणी से है, धर्म का शरीर और आत्मा दोनों से ही सम्बंध रहता है। कुछ आधात्यमक शास्त्रों के अधीन होकर हम यह भी कह सकते है कि हर आत्मा की एक ही चाहत होती है, वो अक्षुण रहें कहीं से भी खण्डित न हों जिससे उसके वापसी सफर में कम कष्ट हों या न हो । धर्म इसमें उसको सहयोग करता है। आत्मा एक चीज से बहुत घबराती वो है मन की चंचलता। मन की चंचलता सांसारिक सुख और दुःख दोनों का निर्माण करने की क्षमता रखती है। हम जीवन के धार्मिक पहलू पर दृष्टिकोण तय करे, उससे पहले हमें एक नजर इस श्लोक पर जरुर डालनी चाहिए, शायद जिससे हम कुछ हद तक धर्म कि परिभाषा के आसपास के माहौल से परिचित हो सकते है।

अथाहिंसा क्षमा सत्यं ह्रीश्रद्धेयन्द्रिय संयमा ।
दानमिज्या तपो ध्यानं दशक धर्म साधनम् ।।

( अंहिसा, क्षमा, सत्य, लज्जा, श्रद्धा, इंद्रियसंयम, दान, यज्ञ, तप, और ध्यान धर्म के साधन है।)

सवाल यह भी किया जा सकता है, क्या इनके अलावा बचे कर्मों में अधर्म समाया है, नहीं, सच्चे आत्मिक चिंतकों के अनुसार चेतनामयी आत्मा जिस कर्म की अच्छाई को पुष्टि कर दे और उस से दूसरों को कोई नुकसान नहीं पहुंचे तो वो कर्म भी धर्म की सांकेतिक परिभाषा के अंतर्गत ही आता है।धर्म कि हम सब बातें और चर्चा करते है, पर हम उससे कितने प्रभावित है और हमारे जीवन में उसकी क्या भागदारी है ! ये एक सत्य सवाल है, जो हर एक की आत्मा जीवन के अंधेरों में स्वयं से पूछती है। हालांकि सन्तोषजनक उत्तर कर्म से ही जाना जा सकता है, पर यह पूर्ण सत्य की कमी की वजह से जान पाना जटिल है।अति संपन्न धर्म शालीनता चाहता है, उसे अपने नाम की चर्चा में जरा भी उग्रवाद या प्रशंसा की चाहना पसन्द नहीं है। माना जाता है, मानव जाति के उदय के साथ धर्म और कर्म का भी उदय हो गया था। हालांकि कर्म ने पहले जीव विज्ञान के तहत अपना वजूद मानव को स्वीकार करा दिया। कर्म मानव की पहली जरुरत थी, अपने आपके अस्तित्व को बचाने के लिए। कुछ कर्मो के नकारत्मक फल पाने के बाद मानव ने कर्म की नैतिकता पुष्टि के लिए आत्मिक तराजू पर उसे तोलना शुरु कर दिया तब ” धर्म” की शालीनता हर प्राणी तक को समझ में आने लगी। अब हम “धर्म” शब्द को भारतीय परिवेश में बतलायी परिभाषा के अंतर्गत समझने की कोशिश करते है। वास्तव में धर्म एक संस्कृत का शब्द है, जिसका अर्थ बहुत व्यापक है। ध + र + म = धर्म । ध देवनागरी वर्णमाला का 19 वा अक्षर और तवर्ग का चौथा व्यंजन है। भाषाविज्ञान के दृष्टि से यह दन्त्य, स्पर्श, घोष, तथा महाप्राण ध्वनि है। संस्कृत के अनुसार धा ( धातु ) + ड विशेषण- धारण करने वाला, पकड़ने वाला होता है। यानी जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है। धर्म कभी विभक्त नहीं हुआ, न ही गलत परिभाषित होता है, पंथों के आडम्बरों में कितना धर्म सही है, यह एक तर्क का विषय भले ही हो पर धर्म की परिपक्वता सत्य से पोषित होने कारण उसकी अखण्ड पवित्रता आज भी बरकरार है। इसलिए ये हमें सदा सुनने को मिलता रहेगा कि” धर्म की जड़ हरी होती है”। ये प्रकृति का धर्म के प्रति अपना विशिष्ट अनुराग है।

चूँकि धर्म जीवन का एक हिस्सा है, अतः आत्मबोध से उसकी अपनी अनुबन्धनता है। यही आत्मबोध हर इंसान की कमजोरी और मजबूती का निर्माणिक तत्व है। अगर धर्म के वैज्ञानिक पहलू पर एक नजर से चिंतन करे तो हमें धर्म को जाती, पंथ, समुदाय, देश और काल से विच्छिन करना जरुरी होगा क्योंकि ये इंसानी जरुरत की इजाद की हुई धाराणायें है, जिनमें ऐसी कोई भी गारन्टी नहीं मिलती कि ऐसा करने से हमें देवत्व या आत्मा को निर्वाण मिल जाएगा। इस कथन को सहजता से स्वीकार करने में स्वामी विवेकानन्द यह सन्देश शायद सहयोग करे जिसमे उन्होंने कहा है ” तुम्हे अंदर से बाहर की तरफ विकसित होना है। कोई तुम्हे पढ़ा नहीं सकता, कोई तुम्हे आध्यात्मिक नहीं बना सकता, तुम्हारी आत्मा के अलावा कोई गुरु नहीं है”। वास्तिवकता भी इस बात को स्वीकार ही करेगी की धर्म सात्विक रसात्मक तत्व है, सदा अप्रभावित रहता है, न यह किसी से कलंकित किया जा सकता न ही ये किसी से आलोचित हो सकता। दस सहः तत्व से निर्मित धर्म जीवन को अखण्डता, विशालता, आत्मिक सम्पन्नता, उसकी अपनी नैसर्गिक का सही अनुभव कराना चाहता है। हर मानव, धर्म के इस सूक्ष्म चिंतन को नकारता भी नहीं पर पूर्णता से भी इसे स्वीकारता भी नहीं, दुःख या उसकी मजबूरी कह लीजिये सीधे सरल समुज्ज्वल सत्य पर उसका विश्वास जीवन की कई अँधेरी टेडी मेड़ी पगडंडियों पर अक्सर डगमगा जाता है। मानव कि इस कमजोरी ने “माध्यम” को जन्म दिया, जिसकी शायद ही कोई जरुरत नहीं थी। पर वक्त की अपनी करामत होती है, उसका आनन्द वो कई तरह से लेता है। मानव वक्त का एक हिस्सा है, अतः “धर्म” का बाहरी स्वरुप भी प्रभावित होना लाजमी हो गया और क्षेत्रीय स्थल के अनुसार समझा जाने लगा। हम अपने देश के सन्दर्भ में इस पर ज्यादा चिंतन नहीं कर सकते, क्योंकि हर सकारत्मक और नकारत्मक क्षेत्र में लोग अपनी सुविधा अनुसार इस का सिर्फ शाब्दिक उपयोग करते है, जिसकी परवाह अमृतमय धर्म कभी नहीं करता। धर्म सिर्फ उस विशेष मानव से ही सम्बंध रखता है जो उसके अस्तित्व को स्वीकारता है, सामूहिकता से उसका कोई सम्बंध शायद ही हो। आर्थिक युग में धर्म को सामूहिक रूप देकर पुण्यता की खरीद समझना सिर्फ एक मानसिक क्रिया का ही स्वरुप है। निज- धर्म की शुद्धता की कसौटी स्वयं इन्सान का अर्जित आत्मिक सन्तोष ही होता है। जब कोई आडम्बरो से सजा समुदाय, जाति, पंथ या देश जब धर्म निर्देशक होने का दावा करता तो कहने में संकोच नहीं हो सकता उनका उद्धेश्य धर्म को समझने में संकुचित ही है, या फिर, किसी अस्वीकृत छवि को प्रचलित और प्रसारित करने का प्रयास मात्र है ।

कहते है, राजा हरिश्चंद्र ने सत्य से बंध कर ही धर्म को अपना जीवन आधार बनाया और कभी भी कर्तव्य के प्रति अपनी आस्था को मोह, स्वार्थ, झूठ, फरेब, लालसा, असंयमन आदि नकारत्मक चिंतन का शिकार नहीं होने दिया। जिंदगी सभी के पास एकल रुप में सीमित अवधि लेकर आती है, अपूर्णता के जंगल में सही राह भूल जाती है और स्वयं निभने वाले धर्म से दूर होकर जब उसे अपनी विपरीत दिशा में होने का अनुभव शुरू होता है, तो धर्म को पाने के लिए छटपट करने लगती है। संसार की विचित्रता को देखिये, जो धर्म अपने हम में स्वयं समाहित हो एकान्तिय होना चाहता है, अपने प्रत्येक तत्व के साथ मसलन सच, संयम, धैर्य, सेवा, स्नेह, प्रेम,साधना, अहिंसा और तप उन्हें हम अनदेखा कर झूठ, भोग, अधैर्य, तिरस्कार, घृणा, हिंसा, अंहकार आदि संसारिक मंजिल प्राप्ति के साधनो को अधिक महत्व देते है। अफ़सोस इतना ही है जन्म से जीवन के अंतिम क्षण तक की सवेंदनशील स्थितियों में जहां इन्सान का हमराही प्राकृतिक धर्म होना चाहिए, वहां व्यवहारिक आडम्बर कितनी शान से खड़ा मुस्करा रहा होता है। हमारे परिमार्जनीय कर्मों में ही शायद संभावित धर्म माखन के रुप में सम्माहित है, हमें इसलिए अपने हर कर्म का आत्ममंथन नियमानुसार करने की जरुरत है। वैसे भी उपदेश से ज्यादा धर्म को साथ साथ रखने की कोशिश में स्वयं का स्वयं ही आत्म मूल्यांकन करने का प्रयास सर्वश्रेष्ठ होता है, ये मेरी नहीं जीवन सुधारक विशेषज्ञों की राय है …..क्रमश …लेखक *** कमल भंसाली***

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