🌺 गुरु वंदना🌺 कमल भंसाली

दोस्तों,
नमस्ते,
नहीं जानता किसी के जीवन मे गुरु का योगदान क्या हो सकता है,परन्तु अपने जीवन का जब अवलोकन करता हूँ तो यही समझ में आया बिना माता पिता के जीवन को सही दिशा नहीं मिल सकती, वो ही बचपन में पढ़ाने के लिए सही विद्यालय का क्षमता अनुसार चयन करते है। सन्तान और परिवार के पालन पोषण के लिए अर्थ अर्जित करने वाले कार्य मे सलग्न हो जाते है, परन्तु एक पिता की आंखों में अपने सन्तान का भविष्य हर समय तैरता रहता है। अतः जीवन उपयोगी ज्ञान के तहत अर्थ से प्राप्त होने वाले शिक्षकों का सहयोग और समाज सम्बन्धी और आत्मिक सम्बन्धी संस्कारिक और धार्मिक ज्ञान के लिए पारिवारिक आस्थाओं से सम्बंधित गुरुओं का सहयोग स्वयं के साथ सन्तान के लिए लेते है। एक इंसान सर्व क्षेत्र का ज्ञाता नहीं हो सकता अतः जीवन की गति में समानता रखने के लिए उसे हर क्षेत्र के विशिष्ठ ज्ञानकर्ता से ज्ञान लेना जरुरी हो जाता है। चूंकि मै जैन समाज मे पैदा हुआ लाजमी था पिताजी मुझे बचपन मे अपने अपनाए धर्म गुरुओं के पास ले जाते और धीरे धीरे मुझे भी अपने सामाजिक परिवेश का ज्ञान होनें लगा। इसलिए उन्हें अपना प्रथम गुरु और मार्ग दर्शक स्वीकारना मेरे लिए भाग्य की बात है, जिस पर मुझे नाज भी है। हकीकत भी जीवन की यही कहती भगवान के बाद माता- पिता ही उत्तम सरंक्षक और सांसारिक मार्ग दर्शक होते है, परन्तु नैतिकता के कठिन रास्तों को तय करने के लिये धर्म गुरु ही सही मार्ग दर्शक होते है। दोनों ही इंसानी अवतार के रुप मे जीवन के स्वरुप को मंगलमय बनाने की कोशिस करते है, अतः बिना किसी कारण दोनों की कार्य प्रणाली पर प्रश्नवाचक चिन्ह कभी नहीं लगाना चाहिए, ये मेरा मानना है, समय की परिवर्तिता के साथ कुछ बदलना जरूरी भी होता है।

हमारे देश की यह महानता है, कि बचपन से हमें सर्व धर्म से परिचय कराया जाता है। रामायण, महाभारत, कुरान, बाइबल, गुरुग्रन्थ या दूसरे धर्म सम्बन्धी ग्रन्थ का प्रारंभिक परिचय स्कूलों में कराने के कारण आज भी हमारे देश के वातावरण में शुकून और शांति को प्राथमिकता दी जाती है । सामाजिक परिवेश में स्वस्थ मानसिकता का परिवेश बना रहे अतः हर धर्म और पंथ में गुरु ज्ञान को समुचित आदर दिया जाता है, हालांकि आज के परिवेश में इसमें कितनी सार्थकता है, ये वर्तमान की अपनी खुद की समस्या है, उस पर चर्चा करने का अधिकार मेरे पास नहीं है।

जब मै बचपन का दौर पार कर रहा था, माता पिता के कारण तब समझ मे आ गया, मै “जैन” समुदाय का हूं और “तेरा पंथ” मेरा पारिवारिक मान्यता प्राप्त पंथ है। उस समय के आचार्य और आज पंथ के गणपति शासनकर्ता श्री तुलसीजी से पिताजी ने मुझे गुरु धारणा की शपथ दिलाई, दुनिया दारी के हिसाब से मैने उन्हें प्रथम धर्म गुरु माना। एक बात सदा मन मे बसी रही ज्ञान गुरुओं से मिलेगा, अतः आत्मा से स्वीकार किया गुरु आदर सदा करुंगा, अपने मन को उनके प्रति कभी शंकित नहीं होने देना, चाहे मै आज की जीवन शैली के अंतर्गत उनका उचित सानिध्य न प्राप्त कर सकू पर नैतिकता के जिस पथ पर वो चलने का कह रहे है, उस पर ही चलना सही है। मेरे जीवन में ‘तेरा पंथ’ के तीन आचार्य का कार्यकाल अभी तक आया है, सच कहता उनके उपदेशों और उनसे निर्मित संस्कारों के कारण जीवन की विपरीतता में भी नैतिकता का सदा मेरी आत्मा में रही और शायद आज भी काफी हद तक बरकरार है, जीवन की इस उपलब्धि से मेरे पास जीवन मूल्यों के संदर्भ में एक सन्तुष्टि भी है।

मैं आज भी नहीं जानता क्या करने से क्या मिलता पर तय है बिन गुरु सही मार्गदर्शन नहीं, गुरु के द्वारा ही जीवन सक्षम हो सकता है। “गुरु वंदना” मेरी स्वयं की है, स्वयं के विचारों से लिखी है। फिर भी शब्दों और भावना की गलती सुधारने से परेहज भी नहीं, आखिर इंसानी कमजोरिया तो मेरे भीतर आज भी है। धन्यवाद सहित प्रस्तुत है ।

गुरु मेरे लिए ज्ञान
गुरु मेरे लिए भगवान
उस ओर न झांकू
जिससे कम हो उनकी शान
मेरा तो यही मानना
सही गुरु समकक्ष भगवान
वो दृष्यत नहीं होते
पर ज्ञानित को भेज देते
हम ही उनको चुनते
कांटों संग रहकर भी वो पवित्र फूल बन रहते
सुधर जाये सबका जीवन
इसका ही रहता उन्हें ध्यान
आस्थाओं का संगम में है नहाना
तो लो गुरु से ज्ञान
वो तो धर्म पथ के राही
तपस्या के सिपाही
आलोचनाओं से नहीं होते परेशान
कहती उनकी हर मुस्कान
पंथ तो उनके लिए बहाना
किसी भी दृष्टि से अंतर्मन में झांकना
फिर उनके चेहरे को निहारना
शंकाये हो जायेगी सारी निरस्त
आलोकित हो ज्ञान दीपक
जीवन के हर अंधकार में
तंग मार्ग दिशा करेगी प्रसरित
बिन गुरुज्ञान हो अगर अंहकारित
तो कहना है इतना, आटे में नमक को जानना
फिर बताना, नमक में आटा समाया
या फिर आटे को नमक ने स्वाद दिया
तो फिर गुरु बिना ज्ञान कहां से आया
जिसने भी शंकित मन से गुरु अपनाया
उसी ने आलोचना में थोड़ा अर्जित ज्ञान भी गमाया
मेरे पास तो गुरुओं प्रदत ज्ञान ही जीवन को दान
गरुवर को प्रणाम, सत सत वंदन
मै माटी का पुतला , सब गुरु मेरे मस्तक के चंदन…..✍रचियता ✍ 🌷कमल भंसाली🌷

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.