🌺 जीवन संध्या🌺 कमल भंसाली

मन मेरे
तूं चंचल ठहरा
आ आज तुझे बता दूं
बीत रहा जीवन का यह सवेरा
किस्मत से पा गया यह संसार सुनहरा
न इतना अब तूं इतरा
क्षीणता के सब चिन्ह दे रहे संकेत
ढ़ल रहा यौवन कर रहा हर पल इंगित
सामने से आ रही जीवन संध्या
जिसका हर ढंग मृत्यु को समर्पित
मान अब परामर्श मेरा
इसमें ही ढूंढ
अपनी बची समर्थता जरा
धैर्यता से कर पहचान
जान असल मे क्या है यथार्थ तेरा
इसके बाद तुम्हें गुजरना
उस पथ पर
जिसमें सिर्फ है
हल्की शाम का आता अंतिम अंधेरा
गुजरना निश्चित है
अनजान अनमोल मंजिल का राही
अब स्वयं को बदलना जरुरी है तेरा
मन मेरे..

दुनिया का हर रंग
तेरी नजरों से गुजरा
कौन हल्का कौन गहरा
कौन बदगुमां कौन सुनहरा
बता किसमें बसे प्राण तेरे
अब भी तूं भटक रहा
अपनी चंचलता का रथ दौड़ा रहा
भोगिली गर्दिश की धूल में
अपनी साँसों को भारी कर रहा
अहसासित भ्रम की
मंदाकनी से तृप्त हो रहा
समझ दोस्त, मेरे
दुनिया अतृप्त समुंदर
जिसका नहीं कोई किनारा
उस में सिर्फ है तेरा मेरा
बदल चिंतन की धारा
विश्वास कर
अब यहांअस्तित्व ज्यादा नहीं तेरा
शतरंज का खेल दुनिया
तूं उसमे एक छोटा सा मोहरा
कौन चला रहा तुझे
ये राज है गहरा
मन मेरे….

अब न हो पुलकित
न बन चंचल नदिया की लहर
दूर तिमिराच्छन गगन का कर अवलोकन
उस दृश्य में चित्रित तेरा उपजीवन
कहीं था तूं कोई टूटा सितारा
कहीं था चन्द्रलोकित अधूरा
हस्ती तेरी बदल
जगमगा अपना दीपन
ज्ञान को कर दीप्तिमान
सन्ध्या तेरी हो जाएगी आसान
बीत जायेगे तिमिर भरे पल
आसान होगी तेरी प्रवासी मंजिल
संयमित हो, सही पथ कर हासिल
जिम्मेदार बन, आहिस्ता आहिस्ता चल
मन मेरे….

✍रचियता✍कमल भंसाली

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