🍂अंदर तक मरता आदमी🍂कमल भंसाली

अंदर तक मरा इंसान
जब बाहर जिंदा दिखता
तो न विस्मय, न आश्चर्य होता
सिर्फ एक अनुभूति होती
जिंदगी, अपनी नहीं होती
अपने पास तो
स्वयं की सहानुभूति होती
जिसकी कोई कीमत नहीं होती
*
अंदर तक का मरना
और फिर भी जीना एक कला
कला शुकून देती
कई टूटी फूटी रेखाओं में
विचित्र रंग भर देती
उन रेखाओं से एक अफसोस से
जीवन के प्याले में
विषैला जहर उगलती
उसकी विशेषता
सिर्फ चेहरे पर
मुस्कराहट दिख जाती
बाकी अंदर रहस्यमय हो जाती
देखने वाले की दृष्टि को
भ्रम के सारे अनुभव करा जाती
स्वयं के अंदर की अनुभूति
असमंज में सांसे लेती
उसकी अपनी उदासी
लगती प्यासी
महसूस होता जिंदगी
उसकी नहीं
जग की है, कोई दासी
*
हकीकत कुछ और कहती
आदमी अंदर से
जिंदा पैदा ही नहीं होता
या फिर
मरे माहौल में
मन्त्र तंत्र से जिंदा रहता
दुःख के माहौल में
सुख की चाह
उसे जिंदा साबित करती
मरने की हजारों वजह
बताओ, साहब
आखिर सांसे कितनी मर्तबा टूटती …..
रचियता 😢😊 कमल भंसाली😢😊

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