” परिपक्वता” कसौटी जीवन की कमल भंसाली

“परिपक्व” या “समर्थता” दोनों अलग अलग शब्द है, पर जीवन के सन्दर्भ में दोनों का उद्देशय एक है, समर्थता पाने के लिये पहले इन्सान का परिपक्व होना बहुत महत्व पूर्ण माना जाता है , ” परिपक्व” इंग्लिश में RIPE, MATURE, PREPARED, MATURITY, FULL DEVLOPMENT शब्दों के द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। मानव जन्म में परिपक्वता का अंश जन्म से ही जुड़ जाता है, क्योंकि मानव जीवन विकास की प्रक्रिया के अंतर्गत आता है। जैसे एक किसी भी फल को लीजिये, उसे स्वादिष्ट होने के लिए परिपक्व होना जरुरी है, जब तक वो इस स्टेज तक नहीं आता, हम उसका उपयोग करने से कतराते है, उसी प्रकार हमारा जीवन जब तक परिपक्व नहीं होता हमारा व्यक्तित्व देश व समाज के सन्दर्भ में ज्यादा उपयोगी नहीं हो सकता। आखिर क्या खासियत है, इस शब्द को जो हम हर सफलता या असफलता के सन्दर्भ में इसका प्रयोग ज्यादा करते है। इस शब्द का जो गूढ़तम रहस्य है, वो ये ही की यह किसी भी तत्व की पूर्णता का परिचायक बन जाता है, जिसके बाद शायद कोई प्रश्न उस विषय के लिए नहीं बचता। चूँकि हम सिर्फ जीव विज्ञान के सन्दर्भ में इस शब्द की चर्चा नहीं कर रहे है, अत संक्षिप्त शब्दों में इतना इंगित जरुर कर देना सही होगा की हमारी शारीरिक विकास प्रक्रिया का मूल्यांकन इसी शब्द के द्वारा किया जाता है यानी प्रकृति की किसी भी क्रिया की उन्नति का जिक्र इसी शब्द के अंतर्गत ही होता है। वास्तव में परिपक्वता पूर्ण विकास बनने की प्रक्रिया है , यानी किसी भी जीव, कोशिका या ऊतक के अंतिम चरण का विकास है। आज हम इस शब्द की महिमा का मूल्यांकन अपने व्यक्तित्व की प्रखरता को बढ़ाने के सन्दर्भ में करना पसन्द करेंगे, जिससे हम एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व के आस पास अपने आपको महसूस करे। इस लेख को आप पढ़े तो यह कभी न समझे की जीवन की गतिविधियों के अंतर्गत आनेवाली समस्याओं का हर विश्लेषण शत प्रतिशत सही हो, यह लिखना यहां जरुरी इस लिए हो जाता है, क्योंकि आगे हम अपनी क्षमताओं को परिपक्व बनाने के तरीको की भी चर्चा कर सकते है। आइये, आगे बढ़ते है….

अगर यह कहा जाय जीवन को इन्सान दो तरह से जीने की कोशिश करता है, तो एक प्रश्न स्वभाविक हो सकता है, कि किस दौ का यह जिक्र किया जा रहा है। इन्सान अपने जीवन को एक तो अनजान बन कर जीता है, दूसरे वो जीवन को समझबूझ कर बड़ी बुद्धिमानी से जीने की कोशिश करता है। जीवन को समझकर जीना और बुद्धिमानी से जीने में भी फर्क किया जा सकता है। बुद्धिमान इंसान की पहचान उसकी अपनी “समय सारिणी” के प्रति कितनी परिपक्वता है, पर काफी कुछ निर्भर करती है। पल पल से निर्मित समय की कीमत समझना, जीवन के प्रति सही आस्था का प्रमाण माना जाता है। आदमी के जीवन में सही कर्म और समय का तालमेल नहीं होने से वो अपने लक्षित मंजिल को हासिल करने में असफल हो सकता है। जीवन का परिपक्व समर्थित निहित लक्ष्य ही जीवन को उपयोगी बनाता है, इस तथ्य को स्वीकार कर अगर हम अपने जीवन को मूल्यांकित करे, तो निश्चित ही हमारा जीवन सारी शारीरक और आत्मिक खुशियों का मालिक बन सकता है। जब इंसान अपनी ही बनाई समझ की तरफ आगे बढ़ता है, तो सबसे पहले उसे अपने जीवन की अनिश्चित समय सीमा का ख्याल रखना चाहिए क्योंकि यह जीवन निर्माण का सबसे पहला तत्व है, और उसकी यही समझ उसे जीवन को मौत के से भय दूर रख सकती है, शायद परिपक्वता जानने की यह प्रथम सही कसौटी भी हो।

जीवन निर्माण को सशक्त करने के लिए जो तत्व सहायक होते है, आइये उनपर एक नजर करते है।

प्रथम: शरीर….” शरीर नहीं तो जीवन नहीं”

सच यही है, शरीर ही जीवन का प्रथम सत्य है, “शरीर नहीं तो जीवन भी नहीं” ।इस बात को समझकर शरीर के अस्तित्व को इन्सान को भगवान का नायाब तोहफा समझ उसका मान सम्मान सदा बरकरार रखना चाहिए। यह चिंतन इंसानी व्यक्तित्व की प्रथम परिपक्वता का तत्व निर्माण करती है, अतः किसी भी विपरीत परिस्थिति में देह का नुकसान सही नहीं कहा जा सकता। जॉन रिम के अनुसार” Maturity is the ability to reap without apology and not complain when things don’t go well”। मात्र शरीर को ही उपलब्धियों का एकमात्र स्त्रोत तो नहीं कहा जा सकता, पर हर बाहरी और भीतरी सफलता और असफलता प्रभाव कम या ज्यादा इसकी क्षमता पर जरुर देखा या अनुभव किया जा सकता है। भारतीय ज्ञान प्रदाता शास्त्रों का अगर मन्थन भी किया जाय तो शरीर का महत्व इस वाक्य में पूर्ण से समझा जा सकता है और वह है ” पहला सुख निरोगी काया” यानी उस सिद्धान्त को पूर्ण समर्थन ” शरीर नहीं तो जीवन भी नहीं”। शरीर को आप चाहे तो किसी भी विज्ञान से जोड़कर देख लीजिये, सब विज्ञान शरीर की उपयोगिता के लिए ही बने नजर आते है। अतः जीवन को परिपक्वता से ओतप्रोत रखकर समर्थता का सन्देश देना है, तो सही समझ यही है, शरीर वो मन्दिर है, जिसके सही रख रखाव की जिम्मेदारी हमारी बनती है। सन्त कबीरदास जी भी लापरवाही से शारीरिक क्षमताओं का छीजन अपरिपक्वता ही समझते है।

“मन मक्का दिल द्वारिका, काया कासी जान
दस द्वारे का देहरा, तामे ज्योति पिछान”

(अपने मन को मक्का, दिल को द्वारिका और शरीर को काशी जानो।
यह शरीर दस द्वारों का है जिसके अंतरतम ह्रदय में प्रभु का वास है।)

मानव शरीर हर रोज चौबीस घँटे की जिम्मेदारी ग्रहण करता है, पर कुछ समय के लिए वो हमारी उसके प्रति जिम्मेदारी का निभाव भी चाहता है। सुबह की सैर, योगिक क्रियायें, स्वस्थ पर्यावरण, स्वस्थ व सादा खाना, गहरी निद्रा, पवित्र विचार, सही कर्म, सही आस्था व मन को प्रफुल्लित करने वाला उत्साह आदि उसकी जरूरते है, अगर हम जीवन को इस दृष्टि कोण से जी रहे है, तो समझ सकते है, परिपक्वता या समर्थता की प्रथम सीढ़ी पर हमारा पहला कदम सही जगह पर टिक गया।
पूर्ण मीमांसा जीवन की इतनी ही है…..
स्वास्थ्य वो धन है, जहां आकर सभी प्रकार के धन की परिभाषा समाप्त हो जाती है, यानी परिपक्वता की कसौटी ” स्वास्थय ही असली धन है और परिपक्व होनें का पहला सबूत”।

क्रमश……
लेखक: कमल भन्साली

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.