🌻प्यार की परिभाषा  “प्यार” 🌼 कमल भंसाली

दोस्तों “प्रेम” प्यार, स्नेह” ये सब प्रेमसागर की उठती बैठती लहरें है जो दोनों ही अवस्था में निरन्तर बहती रहती है, और “प्रेमसागर” वो सागर है, जिसका निर्माण हमारे प्राणदाता ने किया है सिर्फ प्राणी मात्र के लिए ही नहीं बल्कि उनके लिए भी जो इससे स्पंदित हो सकते है। उन्होंने प्रेम और स्पर्श को चोली दामन का साथ दिया है, जिससे हमें प्रेम की परिभाषा जानने की जरुरत ही न पड़े, और हम समझ सके कि हम किस तरह का प्यार, स्नेह और प्रेम पा रहे है। उदाहरण के तौर पर जब पिता सन्तान के सर पर हाथ फेरे और माँ, जब दूध पिलाती उसके सर को हाथ से सहलाये तो शायद धरती पर स्वर्ग जैसी अनुभूति होती है, और हमअपने सांसारिक प्राणी होने पर गर्वित होते है, और उस प्राणदाता को सहर्ष प्रणाम करने की इच्छा होती है, हाँ, यही वो “प्यार” है, जो बहता रहना पसंद करता, आरजू इतनी है आपसे “प्यार” को प्यार ही रहने दे, रिश्तों के नाम पर इसे कभी बदनाम न करे”🌸 यह कविता उन के सम्मान को समर्पित कर मुझे भी आनन्द का आभाष होता है, जो प्यार को कभी “किसी स्वार्थ की तराजू पर नहीं तोलते और खासकर “अर्थ” के मापदण्डकों पर”।💮 कमल भंसाली

तुम कहती हो
प्रेम को परिभाषित करो
मेरा तो कहना है, प्रिय
ऐसा कह उसे आश्रित न करो
प्रेम कुछ नहीं
सिर्फ एक अहसास है
सो जाओ तो महसूस करो
जागो तो पाने का प्रयास करो
हाँ, कभी अधखुले नयनों से
इस पर प्रहार न करो
तुम कहती….

सच तो यही है, प्रेयी
प्रेम स्वयं ही परिभाषित
स्नेहमयी लहरों की
उत्सृष्ट तरंगों में हो निर्धारित
हर जीवन का प्राधिकृत
बन पल की रवानगी
प्राणी सम्बन्ध में विसृत
हो जाता स्वयं परिभाषित
आओ, हो जाए प्रेममय
शंकित हो न करे इसे दूषित
अच्छा लगता, अपरिभाषित
तुम कहती….

हाँ, प्रिया
प्रियवन्द बन कहता
मेरा तो मानना
प्रेम को कभी न जानना
मिलता तो स्वीकार करना
न मिले तो भी है देना
अनुरागी भंवरा बन
बिन नाम दिए रिश्तों का
यही सिर्फ गुनगुनाना
पल का जीवन
पल का प्यार
न कुछ तेरा
न कुछ मेरा यार
है, तो, सिर्फ
प्रेम,स्नेह और प्यार
बहती रहे वो बयार
जिसमे हो सिर्फ निस्संग
प्यार, प्यार, प्यार
तुम कहती….
🌷रचियता🌴कमल भंसाली🌷

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