😩अनचाही हमसफ़र 😨कमल भन्साली😨

मैं ही बेपरवाह रहा
खबर तो मिल रही
की तुम आने वाली हो
मुझे गले लगाकर
अपने आँचल में
छुपाने वाली हो
मेरे बिगड़े तन मन
की हालात पर
निगाह रखने वाली हो
जब असहनीय हो जायेगी
सब पीड़ाएँ
तो शायद तुम
साथ ले जाने वाली हो
एक नई राह
एक नई दिशा
उपहार में देने वाली हो
मै ही……

कुछ तो
तुम में है ऐसा
जिसके लिए
जीवन भर तरसा
अपनी याद
मध्यम मध्यम
स्वरों में
कभी कभार दिला देती
अदृश्य छवि तुम्हारी
सामने खड़ी होकर
मेरे ही दुःखो की
गिनती करा
अपनी मित्रता की
छाप लगवा लेती
अलबेली हो तुम
अपने अस्तित्व
के दस्तावेज पर
मेरे अंतिम
हस्ताक्षर भी करवा लेती
मैं ही….

दबी सी मुस्कराहट
सुर्ख होठों में भरकर
हाथ बढ़ा कर
अपना नाम
“मृत्यु” बता कर
बिताये जीवन का
सारांश समझाती
जग तो पराया होता
वो स्वार्थ पर पलता
जब तक
उसके लायक हो
सब कुछ सहता
जब कुछ नहीं बचता
तब तृष्कृत कर देता
दोस्ती धर्म को
निभाने
मुझे तो आना ही पड़ता
बन्धन है
तुम्हारा और मेरा
अंतिम साथ तो
निभाना ही पड़ता
जहां से चले हो
वहीं मंजिल है
गलत तुम भटके
यह बताना पड़ता
ख़ौफ़ नहीं मेरे दोस्त
न ही होगी कोई पीड़ा
सही दोस्त ने
तुम्हे मुक्त करने का
उठाया है, बीड़ा
जीवन अनबुझ पहेली
यह सोच कर
वापस कर दो
सब अमानतें जग को
आखिर, तुम हो
” बटोही अनजानी मंजिल के”
रचियता: कमल भंसाली

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