:'( मायूसी:'(

जिंदगी क्यों उदास रहती
अजनबी सी
तू सदा मायूस रहती
मुरझाई सी
हर दिन दूर रहती
पहलू में बैठकर भी
परायी सी दिखती
जिंदगी….

कभी कली बन कर आई
फूल की सूरत बन जग में छाई
बचपन की नादानी
तूं कभी भूल न पाई
देख, यौवन के बिगड़े भँवरों ने
कैसी तेरी हालत बनाई
जिंदगी…..

भूल गई बागवां की मेहरवानी
उसकी परवरिस में
तुमने क्या कमी पाई
संस्कारो की उपजाऊ जमीन
पता नहीं क्यों
रास नहीं आई
अपने ही काँटों से
बता तुमने अपनी यह हालत
क्यों बनाई
जिंदगी…

अपने चमन की महक बनती
जग की खुशियों में
सम्मिलित होकर मुस्कराती
दामन में
सितारों सी चमक झिलमिलाती
ये बात
कभी तुम समझ नहीं पाई
स्वार्थ की गलियों में
आज तुम
यों नही कसमसाती
काँटो की हल्की सी चुभन
तुम सहन कर न पाई
जिंदगी….

माना, यौवन तेरा
था बड़ा प्यारा
पर वासना का
रंग उसमे था गहरा
संयम की प्यास को न सह पाई
इन्हीं जुगनुओं ने
तेरी यह हालत बनाई
सच कहूं
नाजायज इच्छाओं ने
बहारों की कीमत
तुम्हे कभी नहीं समझाई
जिंदगी…

सूख रही
जब बदन की पत्तिया
कुछ तो अहसास कर
बची खुशबू को
जग के नाम कर
ढलती शाम में
अस्त होते सूर्य की किरणों में
नया कोई माहौल तैयार कर
पूर्ण मुरझाने से पहले
फिर से खिलने का
ख्याल कर
जिंदगी…..

रचियता**कमल भंसाली

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