💥त्याग💥आत्मसागर का अमृत🌸कमल भंसाली🌸


“त्याग” एक सक्षम, धार्मिक, आत्मिक और सत्यता से भरपूर अमृतमय शब्द है, जो नई नई ऊर्जाओं से ओतप्रोत होकर किसी भी परिणाम की गरिमा बढ़ा सकता है, और इंसान को महत्वपूर्ण सफल जीवन जीने की प्रेरणा दे सकता है। परन्तु इस शब्द की विडम्बना है, कि इसका महत्व सब जानते है, पर अपनाने की जब बात आती है, तो उनकी हिम्मत जबाब दे जाती है। इतिहास में ऐसे कई उदाहरण नजर आते है, जहां एक आदमी के त्याग से वक्त ने सुखद परिणाम दिए है। हम अपने ही देश के एक उदाहरण से इस बात की सत्यता परख सकते है, जब मुगलकाल का भारत में वर्चस्व बढ़ रहा था, उस समय उनको रोकने का साहस सिर्फ मेवाड़ के राजा उदयसिंह में था, पन्नाधाय ने उदयसिंह को बचाने के लिए अपने पुत्र का बलिदान किया। कहना न होगा, महाराणा प्रताप के पिता राजा उदयसिंह थे। इतिहास के इस प्रसंग से हमे यहां सिर्फ पन्नाधाय के त्याग को ही नहीं समझना है, अपितु यह भी समझना है, त्याग से कई परिणाम बदल जाते है,और महाराणा प्रताप जैसे वीर पुरुष जन्म लेते है।

“प्रेम” हर देश का सबसे प्रचलित शब्द है, जो हर रिश्ते की बुनियाद में होता है, परन्तु उसका सही उपयोग करना इतना आसान नहीं कहा जा सकता। दो देशों के सम्बंधों के सन्दर्भ में भी अगर देखे तो समझ में आ सकता है, कि उनका आपसी प्रेम भी त्याग का मोहताज होने के कारण एक राजनैतिक सीमा रेखा के अंतर्गत ही नजर आता है। चूंकि हम एक ऐसी दुनिया के प्राणी है, जहां हर चीज को हासिल करना पड़ता है, वहां हम किसी भी तत्व की शत प्रतिशत गुणवत्ता का उपयोग दैनिक जीवन में नहीं कर सकते परन्तु अगर आत्मिक ईमानदारी से अगर कुछ अंशों का प्रयोग करना सीख जाए, तो एक सही जिंदगी को हमें शायद बार बार परिभाषित भी नहीं करना पड़े। एक सफल इन्सान की अगर डायरी के कुछ पन्नों पर गौर करे तो निश्चिन्त ही हम यह समझ लेंगे कि उनके जीवन में दूसरे गुणों को सार्थकता ” त्याग” से ही मिली। आइये, आज हम जीवन को महत्वपूर्ण बनाने वाले इस तत्व की गहराई में उतरने की कोशिश कर, “जीवन को आत्मिक और दैहिक सुंदरता” का अनुभव कराये।

” त्याग” को हम समझ कर जीवन में महत्व दे, उससे पहले उसका परिचय करना सही होगा, “त्याग “का शाब्दिक अर्थ शब्दकोशों के अंतर्गत क्या होता है ?

1. वस्तु पर से अपना स्वत्व हटा लेना, उत्सर्ग
2. पूरी तरह स छोड़ देना
3. किसी काम, चीज या बात से लगाव या सम्बंध हटा लेना अथवा उसे छोड़ने की क्रिया का भाव
4. दुर्व्यसनों का त्याग
5. मन में विरक्ति या वैराग्य का भाव
6. इस तरह से सम्बंध तोडना कि अपने ऊपर कोई उत्तरदायित्व न रह जाए
7. स्वार्थ की उपेक्षा

अगर हम इंग्लिश भाषा की बात करे तो उचित शब्द ” Abandonment ” सही शब्द है। हालांकि Living, Resignation,Separation, Renunciation, Relinquishment, Divorce, Abdication, Abnegation, और Sacrifice का प्रयोग भी उचित लगता है।

चूँकि त्याग नैतिकता से सम्बंधित तत्व है, और आत्मा से बंधा है, अतः इसका प्रयोग सब जगह सहज नहीं होता। जिस काम को छोड़ने से किसी भी जीवन को तकलीफ मिलती हो, इसका प्रयोग नहीं होना ही उचित है, जैसे माता- पिता को त्याग देना। परन्तु, भारतीय संस्कृति में कन्यादान को महानतम पवित्र त्यागों में माना गया है। कुछ भी त्याग करने की इच्छा इंसान के मन में कुछ सात्विक तत्वों के संग्रहण की उतप्ती के बाद की भावनाओं से निर्मित तत्व माना जा सकता है, क्योंकि इंसानी मोह की जकड़ मन पर काफी शक्तिशाली होती है। त्याग आत्मसंतुष्टि प्रदान करता है, अतः शरीर और मन का सौंदर्य प्रसाधन भी कहा जा सकता है। अच्छा त्याग ही व्यक्तित्व को निखारता है, और जीवन में मान सम्मान को बढ़ाता है, अपनी नजर में भी और दूसरों के दिलों में। वैसे तो प्रायः सभी धार्मिक शास्त्रों और पंथों में त्याग को आत्मिक सुख का आधार माना गया है, परन्तु जैन धर्म में ही सिर्फ त्याग को आत्मकल्याण का सर्वश्रेष्ठ साधन माना है। जैन साधू, साध्वियां और सच्चे श्रवाक की दिनचर्या से त्याग का महत्व उनके जीवन में श्रेष्ठ है, कहा जा सकता है।

चूँकि हम “त्याग” की गुणवत्ता का उपयोग व्यक्तित्व विकास के सन्दर्भ में तलाश रहे है, तो हमें महात्मा गांधी के व्यक्तित्व पर एक सहज दृष्टि डालनी होगी। गांधीजी ने अपने व्यक्तित्व विकास में त्याग का भरपूर सही प्रयोग किया और साधारण से असाधारण महामानव बन गए। कर्ण के एक त्याग ने उसे महाभारत का एक शानदार किरदार के रुप में स्थापित किया, यह बात और है, किन्ही व्यक्तिगत कारणों के कारण उसने पांडवों का साथ नहीं दिया, जबकि वो कुंती का पुत्र था। त्याग को कुछ धर्म तपस्या के सन्दर्भ में वस्तु विशेष पर भी अपनाते है, हालांकि इसका कोई भी धार्मिक कारण प्रत्यक्ष दृष्टिगत होना कठिन लगता है। त्याग का प्रयोग जीवन को सही दिशा और समाज में फेले आडम्बरों युक्त रिवाजों को वक्त के अनुसार बदलने में किया जाय तो एक आर्थिक और सामाजिक उन्नति को सही दिशा मिल सकती है। भारतीय हिन्दू समाज में जन्म, शादी, मरण जैसे परम्परागत रस्म रिवाज आज भी त्याग के प्रयोग का इंतजार कर रहे है।

त्याग की सबसे बड़ी खूबसूरती होती है, उसके प्रति हमारी शुद्ध भावना और निष्फल उसके प्रति किया प्रयास। त्याग आपसी प्रेम को बढ़ाता ही नहीं अपितु आपसी रंजिसो पर विराम भी लगा देता है, इससे मानव मन शुद्ध होकर आपसी प्रेम, खुशहाली प्राप्त करता है, जो उसे श्रेष्ठ ही नहीं विशिष्ट बनाता है।

आइये कुछ त्याग जो जीवन को नई दिशा दे सकते है, उन पर गौर करते है।

1.शरीर सम्बन्धी त्याग में सबसे पहले महत्वपूर्ण है कि अति आमदनी की चाह में मिलावट न हो । इस तरह का त्याग मानव प्रेम की सबसे सशक्त पहचान होती है। मिलावट करके वो दूसरो के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ तो करता है, परन्तु देर सबेर वो भी इसका शिकार हो सकता है, क्योंकि समाज और देश में फैले रोग कभी न कभी, किसी भी रुप में मिलावट करने वालो को भी नहीं बख्शता अतः इस तरह के विचारो को आत्मा से त्यागना जीवन को सही दिशा देना होगा।

2. आडम्बर और दिखावा इंसान के स्वयं संचालित अवगुणों के अंतर्गत आते है, अगर इनसे देश, समाज नकारत्मक रूप से प्रभावित हो तो इनका त्याग उसे सही विचारक बनाता है। इस तरह के त्याग से आत्मा को मान सम्मान मिलता है, अतः स्वीकार त्याग है, पालन करना भी आसान होता है।

3. क्रोध और हिंसा का त्याग परमार्थ श्रेणी के त्याग के अंतर्गत लिया जा सकता है, इससे स्वयं, परिवार और समाज सभी का भला स्वत् ही हो जाता है। अतःइस अवगुण को जीवन से अलविदा कर दिया जाय, तो एक सुंदर, स्वस्थ, और सशांत जीवन प्राप्त किया जा सकता है। चूँकि भावुक भावनाओं के इस वेग को रोकना सहज नहीं होता, अतः इस पर काफी आत्मिक परिश्रम करने की जरुरत होती है, जो हर इंसान के लिए सहज नहीं है। तभी तो शास्त्रों में कहा गया,

सर्व परवशं दुःख सर्वम् आत्मवशं सुखम् ।
एतद् विद्दात समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ।।

(यानी जो चीजे अपने अधिकार में नहीं है वह सब दुःख है तथा जो चीज अपने अधिकार में है वह सब सुख है।)
अतः अति क्रोध पर अधिकार करना उचित है अगर हमे जीवन को गौरवमय करना है।

4. ईष्या, द्वेष, जलन दूसरों को नहीं खुद को जलाती है, ये रोग और महामारी के नायक है। इनका त्याग एक साथ नहीं हो सकता क्योंकि कमजोर चरित्र इनका पोषण करते है, परन्तु संयम और धैर्य से इन्हे त्याग कर जीवन में मधुरता हासिल की जा सकती है।

5. अर्थ और साधनों का अधिक संचय जीवन को शक्ति नहीं विरक्ति और खालीपन देते है, अतः जरुरत से ज्यादा इनकी आशक्ति से बचना जीवन को सार्थकता का अनुभव करा सकता है।

6. कामवासना और शारीरिक सम्बन्धों की अति से जीवन कमजोर और निकम्मा हो जाता है, दिमाग को दूषित करता है। स्पष्ट बात है, प्रेम और कामवासना में बहुत अंतर होता है, इसको समझकर इंसान को अपने चरित्र का मूल्य समझना सही होगा। प्रेम प्रेरणामय होता है, वासना शर्मिंदगी महसूस कराती रहती है। गन्दा साहित्य, मनोरंजन के अन्य दूषित साधनों का जितना त्याग करेंगे, उतना ही जीवन आनन्द बढ़ता रहेगा। प्रभु से प्रेम करने वाले ही जीवन दर्शन में उसका सही महत्व समझ सकते है क्योंकि उनके पास चिंतन की विशिष्ठ कुंजी ” आस्था ” होती है। आस्थाओं का संकलन त्याग से ही संभव है।

7. संसार में जितने साधन है, उनसे उतने ही प्रकार के अवगुण भी इस संसार में है, सबका विश्लेषण करना मुश्किल है, अतः प्रत्येक इन्सान को अपने जीवन की मीमांसा कर उन अवगुणों का त्याग करना चाहिए, इससे जीवन सकारत्मक चरित्र का निर्माण कर सकता है। उदाहरण के तौर पर आज का मोबाइल प्रयोग लीजिये, जिसका सही उपयोग बिरले ही करते होंगे। मोबाइल पर झूठ बोलना तो आम रिवाज हो गया है, यही नहीं इस के गलत प्रयोग से कई तरह के अपराधों का निर्माण होना भी शुरु हो गया है। फैड्रिक लेविस डोनाल्डसों के अनुसार संसार में हर समाज को सात गलत दूषित कर सकते है, वो है,

1- Wealth without work.
2- Pleasure without conscience.
3- Knowledge without character.
4- Commerce without morality.
5.-Science without humanity.
6 -Worship without sacrifice.
7 -Politics without principle.

वर्तमान की हमारी जिंदगी भी बहुत जगह ऐसे गलत कार्यों में उलझती रहती है, हल्के दुःख के सैलाब जब चाहे हमें जिधर चाहे बहा के ले जा सकते है, वो हमारी मानसिक कमजोरी को प्रत्यक्ष दर्शित भी करते है, परन्तु हम उनका उपाय बिना मेहनत किये, खोजने की कोशिश करते है और हर हालात को समय की मेहरवानी का मोहताज बना देते है। जबकि हम जानते है, कुछ अवगुणों के त्याग से जीवन को सदा अमृतमयी बहारों को सुपुर्द किया जा सकता है, निर्णय का अधिकार हमारे खुद के पास है, अतः चिंतन हमें करना है, “त्याग या भोग”। शुभ कामनाओं सहित….. लेखक ** कमल भंसाली**

Advertisements

💥त्याग💥आत्मसागर का अमृत🌸कमल भंसाली🌸&rdquo पर एक विचार;

  1. बहुत ही आद्यात्मिक ह्रदय शील की गहराइयों को छूने व् मानवतामूल्यों को गति पूर्वक जीवन म् सजोने वाली रचना के लिए आपको ह्रदय से सादुवाद!!

    पसंद करें

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.