🚥अति भोग की चाह नहीं सही राह🚦कमल भंसाली

माना जा सकता है, भोग जीवन के सन्दर्भ में एक परम्परावादी सलाह का शब्द है, जिसके बारे में हर जीवन विशेषज्ञ, धर्म गुरु और तपस्वी सदा एक ही चेतावनी देते रहते कि अति भोग से बचो। इससे एक बात तो साफ़ हो जाती है, कि भोग जीवन की जरुरत है, उससे पूर्णतया तो वो भी नहीं बच सकते,जो सलाह देते है । परन्तु, मात्रा की अधिकता ही उसका नुकसान है। इस तथ्य को हम अगर समझने की कोशिश करे उस से पहले इस शब्द को जरा विस्तृत ढंग से समझने की जरुरत है। इंग्लिश में इस शब्द के तहत enjoyment, suffering, sexual enjoyment, perception, carnal, pleasure, use, apllication, utility, result of good आदि सब भोग के सन्दर्भ में प्रयुक्त किये जाते है। हिंदी भाषा में भोग का अर्थ भोगने का भाव, उपयोग में लाना, देवताओं को अर्पित खाद्य पदार्थ, कर्मफल, भोजन करना, और संभोग या मैथुन। इस शब्द की जो व्याख्या हमारे शरीर और आत्मा के प्रसंग में चिंतनमयी है, हम आज उसी पर जरा चर्चा करते है।

यह तो तय है, इसकी अति हर तरह से इंसान को विचलित करती है, क्योंकि इसमे आकर्षण का तत्व ज्यादा रहता है, जो रोकने को जरा कम पसन्द करता है। साधारण मानव इस से अनजान रहता है, यह हम नहीं कह सकते क्योंकि अधिकता के खतरे की जानकारी सभी को होती है, नदी व समुंदर के पास रहनेवाला यह नहीं कह सकता कि अगरपानी इनमे बढ़ जाए तो उसका घर डूबेगा या नष्ट नहीं होगा, फिर भी वो अपने घर में सभी भोग के साधन बढ़ाते रहेगा। भोग जब तक जरुरी होता है, तब तक तो सुहावना व जीवन उपयोगी कहा जा सकता है, पर अधिकता काफी कष्टमयी होती है। जीवन की आज जो उलझने बढ़ रही है, काफी हद तक वो भोगवादी संस्कृति की देन है, इनसे बचाव करना सहज नहीं हो सकता, पर यह भी जरुरी नहीं की साधनों के कारण भोग की अधिकता को रोका नहीं जा सकता।

भोग शब्द संसारिक साधनों और शरीर की कामवासनाओं से ज्यादा तालुकात रखता है, हमारी यह चर्चा इसी सन्दर्भ में ज्यादा महत्व रखेगी, इसलिए मानव स्वभाव और आदतों का विश्लेषण करने से पहले यह जरुरी हो जाता है, कि क्या भोग को संयमित कर जीवन को सन्तुलित किया जा सकता है, ? इसका सही उत्तर सकारत्मक ही होगा। धार्मिक शास्त्रों की बात करे तो उनके अनुसार शरीर और आत्मा दो भिन्न भिन्न होते हुए भी एक ही शरीर की संरचना मे समाहित है। शरीर को ही भोगवादी का प्रशंसक माना गया है, आत्मा उसकी अधिकता का ज्यादातर विरोध करती ही नजर आती है। आदमी के शरीर में जल की मात्रा ज्यादा होती है, ऐसा शरीर विशेषज्ञो का कहना है, अगर उनकी बात पर एतराज नहीं करे, तो कह सकते है, शरीर को प्यास का अनुभव होता रहता है, इस “अनुभव” को हम दूसरे शब्द तृष्णा या प्यास के नाम से भी जानते है। यही तृष्णा इंसानी भोग का सबसे बड़ा कारण नजर आती है। तृष्णा और भोग की सच्चाई को समझने में हमारा धार्मिक ग्रन्थ गीता हमें काफी सहयोग दे सकती है।

महाभारत प्रसंग के आदि पर्व अध्याय 75 श्लोक 51 के अनुसार:

पृथिवी रत्नसंपूर्णा हिरण्य पशवः स्त्रियः ।
नालमेक्सय तत्सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत् ।।

( इसका अर्थ कुछ इस तरह दिया जा सकता है; पृथ्वी रत्नों से भरी है; यह स्वर्ण ( मूल्यवान धातुएं आदि ) पशुधन, तथा स्त्रियों का भंडार है। यह सब एक व्यक्ति के लिए पर्याप्त नहीं है ऐसा मानते हुए मनुष्य शमन का रास्ता अपनाये। ऐसा इसलिए कि मनुष्य सब मिल जाने पर भी असन्तुष्ट बना रहेगा और काश! की मेरे पास और अधिक होता जैसे भाव उसके मन में उत्प्नन होते रहेंगे )..इंटरनेट से साभार

इस श्लोक की सार्थकता देखिये, ये वर्तमान की भी सच्चाई है, आदमी कमी का भय हर समय महसूस करके असन्तुष्ट ही रहता है, चाहे उसकी सारी आकांक्षाओं को मंजिल ही क्यों न मिल जाए। अति लालसा भोग की प्यासी प्रेमिका की श्रेणी में आती है, जब तक जरुरत हो तो उसकी चाहत एक अच्छी प्रेमिका की भूमिका निभाती है, परन्तु जब बिना जरुरत वो जगती रहे तो समझने में भूल अगर हम न करे तो वो एक अतृप्त प्यासी प्रेमिका लगने लगती है। चूँकि अति भोग शरीर की कमजोरी की एक प्रक्रिया है, अतः इसका संयम से अगर इलाज कर लिया जाय, तो जीवन में स्वस्थ, मधुर ऊर्जा का संचार होता रहेगा।

शारीरिक भोग की चाह साधनों की चाह से अधिक खतरनाक जानी जाती है। प्रेम कामवासना का पूरक हो सकता है, पर हर कामवासना में प्रेम हो यह जरुरी नहीं है, क्योंकि प्रेम आत्मा की चाह होती है, वासना शरीर की जरुरत। चाह में पवित्रता का सतांस रहता है, और शरीर की जरुरत में या तो याचना या फिर नाजायज अधिकार। आचार्य रजनीश के अनुसार ” तुम किसी व्यक्ति से प्रेम कर सकते हो, इसलिए कि वो तुम्हारी कामवासना की पूर्ति करता है। वो प्रेम नहीं, मात्र एक सौदा है। तुम किसी व्यक्ति के साथ कामवासना की पूर्ति कर सकते हो इसलिए क्योंकि तुम प्रेम करते हो । तब काम भाव का अनुसरण करता है छाया की। भांति, प्रेम के अंश की भाति। तब वो सुंदर होता है। और यदि तुम किसी व्यक्ति से बहुत गहराई से प्रेम किये चले जाते हो, तो धीरे धीरे कामवासना तिरोहित हो जाती है। आत्मीयता इतनी सम्पूर्ण हो जाती है कि कामवासना की कोई आवश्यकता नहीं रहती “।

आइये भोग के कुछ दूसरे जीवन उपयोगी जानकारी पर एक नजर डालने की कौशिश करते है।

1. भोग संसार के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए जरुरी है।
2. अति भोग की चाह रोग निर्मित तत्वों को निमन्त्रण देती है।
3. भोग को अछूत की श्रेणी में रखने से जीवन का मकसद नगण्य हो सकता है।
4. भोग की संयमित मात्रा जीवन का उत्साह बरकरार रखती है।
5. भोग और लालसा का मिलन कभी न हो तो अच्छा है, इन्हे जीवन पथ का हमराही न बनने दे, तो मंजिल की निकटता का आनन्द कुछ और ही होता है।
6. भोग के प्रति न आसक्ति अच्छी न ही बेरुखी। सन्तुलन भोग ही जीवन को उपयोगी और महत्वपूर्ण बना सकता है।

अतः जो भोग को एकदम नकारने की बात करते है, उन्हें अपने ही जीवन के मर्म को सबसे पहले समझना होगा, भोग के द्वारा ही उनकी काया का निर्माण हुआ है, अतः एक दम नकारना उनका सही नहीं कहा जा सकता।

भोग को अगरअपनी आत्मा से एक स्वच्छ और पवित्र दिशा निर्देश प्राप्त हो जाए, तो भोग जीवन को सदा स्कारत्मक्ता की और ले जा सकता है। इसके कई सीधे साधे नियम है, जो शास्त्रों के अनुसार समस्त मानव के लिए उपकारी हो सकते है।
1.भोग को मधुरता से समझे।
2. भोग भी कई प्रकारों का होता है, सब भोग की अपनी पहचान और सीमा रेखा होती है, उनकी पहचान जरुरी है।
3. संसारिक भोग भी काफी हद तक जीवन को सार्थकता प्रदान करते है, उनकी पहचान जरुरी है।
4. सीमा से अधिक आर्थिक लालच भोग के दायरे की बाहर की चीज है, उससे इंसान का शैतानी रूप ही निखरता है। इसका तोड़ संयम, दान, और मानवता हित के कर्म ही सकते है।
4. वासना को जब शरीर की संक्षिप्त प्रेम उपाषित तत्व समझा जाय और आपसी सहमति के अंतर्गत ही अगर अंजाम दिया जाय तो भोग नहीं प्रेम की चरमता का अनुभव ही समझना सही होगा।
5. धर्म को राजनैतिक रूप में उपयोग भोग के अंतर्गत ही आता है।अतः बचना ही उचित होगा।
7. सबके हित में किया कोई भी साधन साध्य के रुप में ही जाना जाता है, उसे भोगना कहना अनुचित होगा।
8. भोग को कभी भी धर्म का दुश्मन नहीं समझना चाहिए, क्योंकि भोग की विरक्ति ही इंसान को धर्म के प्रति जागरुक करती है।

चूँकि भोग को धार्मिक गुरु कुछ इस तरह से विश्लेषण करते है, तब हमे लगता है, भोग कोई रोग है, यह गलत धारणाये उल्टी आशक्ति का निर्माण करती है, भोग जीवन की सच्चाई है, हकीकत में भोग निर्माण की पहली क्रिया की शुरुआत है। भोग न होता तो संसार आज इतना सुंदर और विस्तृत नहीं होता। भोग कभी नहीं कहता, मुझे अति से प्यार है, हकीकत में वो भी चाहता है, सब उसे प्यार संयमिता से ही करे, और अपनी गलतियों की सजा में उसका नाम न ले।

कबीर दास जी का यह दोहा जरुरत से ज्यादा भोग में विश्वास रखने वालों के लिए एक प्रेरणामय सन्देश दे सकता है, अगर स्वीकार हो…

“चाह मिटी, चिंता मिटी, मन बेपरवाह
जिसको कुछ नही चाहिए वह शहंशाह” ******

■■■ लेखक●●●कमल भंसाली

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