” आनन्द” 😃जीवन सूत्र भाग 3 अंश 1😆 कमल भंसाली

सत्य ही कहा गया है, “इन्सान को अगर ऊजालों को तलाशना है, तो उसे अंधेरों का अनुभव करना जरुरी है” । आखिर यह अँधेरा है,क्या !और मानव जीवन ज्यादा देर तक उसे क्यों नही सहन कर पाता ? प्रश्न उचित लगता है। सीधे सीधे ओशो के शब्दों में कहे, तो “अँधेरा, अज्ञान है, प्रकाश ज्ञान है”। आत्मिक अज्ञानी ही ज्ञान तलाशता है, चलिए हम भी उनमें शामिल हो ज्ञान के प्रकाश की एक हल्की झलक तो प्राप्त करने की कोशिश करें।

सृष्टि का नियम है, वो हर प्राणी को सक्षमता तो प्रदान करती है, परंतु जब सवाल पूर्णता का आता है, तो ज्ञान का सहारा लेने को कहती है। आज का इन्सान इस मामले में काफी सजग प्रतीत होता है, परन्तु उसकी सजगता में कहीं न कहीं एक प्रश्न उभर कर आ ही जाता है, आखिर इस ज्ञान से वो हासिल कर क्या करना चाहता है ! ऊपरी सतह से इस का उत्तर कहीं से भी प्राप्त किया जा सकता है, वो आनन्द, सुख, आराम और शान्ति को अपनाना चाहता है या फिर उसका कोई ऐसा लक्ष्य है, जो उसे सही जीवन की दिशा बता दे।

चलिए इस मर्म को भी तलाशते है, क्यों इन्सान जीवन को नये नये आयाम देकर आनन्दमय और उत्साही जीवन प्राप्त करना चाहता है ? इस चर्चा को आगे प्रस्तुति देने के लिए हमें थोड़ी विगत की सैर करनी चाहिए, जब मानव अपनी प्रारंभिक अवस्था में बिना साधनों के अपना अस्तित्व तलाश रहा था। आश्चर्य की बात है, आज की स्थिति और उस समय की स्थिति में एक समानता नजरआ रही है, पहले मानव बिन साधनों के आत्मिक आनन्द ढूंढता था, आज साधनों के रहते भी वो, उसी आनन्द को तलाश रहा है। मानते है, ना आप। तो बताइये ज्यादा साधनों को प्राप्त करने का मानव स्वभाव क्या सही है !

यहां बता देना उचित होगा कि पहले इंसान के पास सुख के साधन कम थे, आज इनकी गिनती असंभव है। जरा सी चेतना का सहारा लेकर हम आगे बढ़ते है, तो अहसास होगा पहले ज्ञान की रफ़्तार धीमी थी, आदमी धीरे धीरे अर्जित कर ता था अतः ज्यादा दैहिक सुख से अनजान था, नैतिकता के दायरे में रहकर ही आत्मिक आनन्द को तलाशता था। आज साधनों की अधिकता के बावजूद भी एक अनजान सा ख़ौफ हर समय उसके आनन्द या सुख को संकुचित करता रहता है। आखिर ये संकुचन क्या है ?, कैसा है, क्या यह किसी बाहरी प्रक्रिया की देन है !

सदिया बीत गई, आज तक बड़े बड़े महर्षि भी इस सवाल के उत्तर की तलाश करने का साहस ज्यादा दिन नहीं कर पाते, देह थक जाती, मन अवसादों से विचलित हो जाता, तब उनकी आत्मा में शायद एक प्रश्न लहरा जाता, कि जो अब तक की जीवन यात्रा की, क्या वो सही दिशा की लौकिक यात्रा थी ! क्या यह लौकिक यात्रा ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है ? जानता हूँ, ऐसे प्रश्न हर एक के दिमाग में नहीं आ सकते, आते तो शायद दुनिया के विस्तार के साथ “सच” जैसा अमृतमय तत्व कभी निम्नतम स्तर पर आज नहीं होता, ईमानदारी को ढूंढना नहीं पड़ता, रिश्तों को प्रेम के अहसास को याद नहीं दिलाना पड़ता, शान्ति को खोजना नहीं पड़ता, पर्यावरण कोई तर्क का विषय नहीं होता और शायद हर प्राणी को अपना सही अस्तित्व की खोज के लिए इधर उधर भटकना नहीं पड़ता। पर कहते है, जब धुरी से कोई अस्तित्व हट जाता है, तो उसके घूमने की लय असंगत हो जाती है, आज का जीवन भी असन्तुलित होकर सही सुख का अनुभव नहीं कर पा रहा है। एक रिक्तता का अनुभव हम सभी अंदर से कर रहे, चाहे स्वीकार करे या नहीं, सत्य तो यहीं है, चाहे हम इस सत्य से भी हम अपनी दैनिक आदत की तरह मुंह घुमा ले।

जीवन में दो तत्व काफी महत्वपूर्ण माने गए है, जी, हाँ, हम कर्म और धर्म की ही बात कर रहे है। किसी भी प्राणी को लीजिये उसका जीवन इन दोनों के ऊपर ही काफी हद तक निर्भर है, मानव चूँकि विशिष्ट श्रेणी का प्राणी है, अतः उसके लिए ये दोनों तत्व ही जीवन सार का निर्माण कर सकते है, निसन्देह इनकी गुणवत्ता उसके चिंतन पर ही निर्भर करती है। कर्म और दैहिक धर्म से ही हमारा अस्तित्व जगत में आता है, इन्हीं की दिशा निर्देश पर जीवन को चलने के संकेत मिलते है, जीवन चलता भी है, पर मन की गति का इनके साथ तालमेल धीरे धीरे कम होने लगता है, क्योंकि मन की तासीर चंचलता है, उसे अति बन्धन अस्वीकार्य होते है परन्तु उसे राजनीति आती है, अतः वो अपनी तिकड़मों से सदा भ्रम के रास्तों में चाहतों के प्रति इंसान को उकसाता ही रहता है। जिस इंसान की आत्मिक शक्ति कमजोर होती है, वो मन के इस भ्रमजाल में उलझ जाता है, और आत्मिक आनन्द को संसारिक सुखों में तलाशता रहता है, और जीवन लक्षित परमानन्द को जानने से कतराता रहता है, जबकि वो ही सही जीवन सार है। समझने की बात है, कि अंत का आनन्द परम् आनन्द ही सही जीवन की सही मीमांसा है।

जरुरी नहीं जीवन में हम आत्मिक आनन्द को केंद्र बिंदू मानकर ही कार्य करे या इस आनन्द को कर्म शक्ति का महत्व दे,। यह तो सहज और सरलता से स्वयं ही प्राप्त होने वाला होता है। नैतिकता और सादगी से प्राप्त जिस तत्व को आसानी से पाया जा सकता है, उसके लिए मश्क्त करना कहां तक उचित है ? सच कहें इसके सहज होने से ही हमारा ध्यान इस पर नहीं जाता, क्योंकि लगातार सहज रहना सरल नहीं है। नये नए साधनों की कल्पना कर हम कैसे आज के वर्तमान युग में सादगी पूर्ण जीवन की कल्पना कर सकते है ! अगर हम इस तरह का चिंतन कर रहे तो निसन्देह हम ज्ञान नहीं तकनीकी बात कर रहे है। सादगी का जीवनभूति साधनों से कोई दुश्मनी नहीं है, सादगी अगर हमारे व्यवहार में है, तो फिर हम क्या अपनाते है, इस से कोई फर्क जीवन में नहीं आ सकता, अनैतिक कार्यों से अगर दूर है, तो कोई भी साधन हमें विचलित नहीं कर सकता, अगर आडम्बरों को जीवन में स्थान न दे, तो कोई भी धार्मिक पंथ हमें नही फुसला सकता, सत्य हमारी जबान पर जब तक है, भय कभी पास नहीं आ सकता, कर्तव्य की ईमानदारी से आत्मा को सदा जागृत अवस्था में रखा जा सकता है, अतः असन्तोष के अलावा किसी से जीवन पर्यावरण दूषित नहीं हो सकता। जब पर्यावरण स्वस्थ रहेगा तो विश्वास कीजिये, जीवन स्वस्थ, सफल, और आनन्दित हो जाएगा, शायद हमें परमानन्द का जरा सा भी अनुभव हो जाए, और जीवन लक्ष्य की तरफ हमारा एक सही कदम बढ़ जाये। हमें सिर्फ ध्यान इतना ही रखना उचित होगा कि आनन्द को एक सफर ही समझे, अंतिम मंजिल नहीं, क्योंकि हमारा सफर ज्यादातर भावात्मक ही होता है, पता नही कब अपना रुख बदल ले। रिचर्ड बैक ने सही कहा है, ” प्रसन्नता वो पुरस्कार है जो हमें हमारी समझ के अनुरुप सबसे सही जीवन जीने पे मिलता है”।*****क्रमश*****लेखक कमल भंसाली

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