🐙मंगलमय सहयोग 🐙 जीवन सूत्र भाग 2 अंश 1 🐙 🌺कमल भंसाली🌺

इंसानी जीवन की सबसे खूबसूरत जरुरत होती है, “सहयोग”, इस शब्द को अगर परिभाषित किया जाय तो शब्द की सार्थकता अपने आप झलकने लगती है। हकीकत यह है, कि इसके बिना जीवन का कोई भी सूक्ष्म सा सूत्र नहीं तैयार किया जा सकता। सहयोग एक वो तत्व है, जो सहारे को तलाशता है, पर, इसकी मजबूरियां भी बड़ी विलक्षण होती है, सबसे पहले इसकी जरुरत को ही लीजिये, इसको किसी का साथ जरुर चाहिए, अकेले से इसका वजूद तैयार नहीं होता। जीवन के लिये सहयोग प्राणदायक तत्व है, भावनाओं से ही इस का निर्माण होता है।

यह सच है, हर प्राणी अकेला संसार आता है, पर उसके आने में भी सहयोग की जबरदस्त भूमिका होती है। प्राणी मात्र का जन्मबीज पांच तत्वों ( क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा यानी धरती, पानी, अग्नि, आकाश एवं वायु ) के आपसी सहयोग से ही तैयार होता है, यानी, सहयोग का धरातल आपसी सम्बंध होते है, सम्बंधों की सहजता से सहयोग की बुनियाद बनती है।

चूँकि हम मानव जीवन के सूत्र तलाश रहे है, अतः हम यहां सिर्फ उन्हीं बिंदुओं पर चर्चा करना पसन्द करेंगे, जिनको जानने से मानव जीवन का उपकार हो सकता है। यह तय है, असंख्य मानव का सभी के साथ सम्बंध नहीं हो सकता परन्तु सहयोग आपस में किया जा सकता है, इसे हम सामूहिक सहयोग कह कर प्राप्त करते है, या खुद दे सकते है। ऐसे सहयोग पवित्र और सुंदर कामों में अब तक ज्यादा दिखाई दे सकते है, परन्तु विधि और वक्त का कमाल समझिये गलत कामों में भी आजकल सामूहिक सहयोग का उपयोग लोग कर लेते है। इसका कारण कमजोर मानसिकता तो है ही, पर गलत लोलुपता के कारण सामूहिक हिंसा में इसका प्रयोग बढ़ना निसन्देह चिंता की बात है। कहते है, बिना स्वार्थ का सहयोग मिलना कठिन है, ऐसा चिंतन करने से पहले इस तथ्य पर भी गौर करना लाजमी होगा, जैसे बिना कारण कोई काम नहीं होता, वैसे ही बिना कोई आकांक्षा का सहयोग आदान प्रदान करने लायक नहीं होता। संक्षिप्त में यह ही कहा जा सकता है, इस सूत्र के बिना जीवन सहस्त्र मुखी नहीं बनाया जा सकता क्योंकि हमारा जीवन सजीव, निर्जीव दोनों तत्वों के सहयोग पर पूर्णतयः निर्भर रहकर कर ही गतिशील बना रह सकता है। सहयोग के बारे में हमें यह जरुर ध्यान रखना होगा की इसके लिए अपने दैनिक रवैये में इस तत्व से हम विमुख नहीं रहे, कहा भी गया है, ” Self help is best help.” जब हमें अपने आपका सहयोग जरुरी है, तो फिर दूसरों द्वारा चाहे सहयोग पर उचित शंका ही रहनी चाहिए।

“सहयोग” जीवन का महत्व पूर्ण सूत्र तत्व होते हुए भी इसकी सही समझ तब तक मानव को समझ में नहीं आती, जब तक वो सम्बंधों का महत्व नहीं समझता। इसलिए गुणी लोगों ने सम्बंधों की परिभाषा को विस्तृत आयाम देते हुए, मानव को सामाजिक प्राणी की पदवी दी, तथा समाज में उसके सहयोग को उसकी जिम्मेदारी बताई गयी। सच भी है, अकेला इंसान आखिर क्या करता ? चूँकि समाज शब्द में विस्तृता ज्यादा थी, अतः उसको मुख्य अंश से बाँध कर परिवार, जातियों , रिश्तों आदि का निर्माण किया गया, जिससे मानव अपनी भूमिका में प्रभावकारी बन जाए। गौर कीजिये, आज तक की हमारी उपलब्धियों पर तो स्वयं ही समझ में आ जाएगा, सहयोग से हमनें कितनी सक्षमता हासिल की। परन्तु सहयोग को जब लज्जित होना पड़ता है, तब कुछ गलत प्राणी अपनी तुच्छ महत्वकांक्षाओं के लिए इसका दुरुपयोग करने लगते है। ध्यान यही रखना है, कि हमें हमारा विवेक कभी गलत सहयोग के लिए विवश न करे।

हम अपनी ही दिनचर्या पर जरा सी नजर डाले तो समझ में आ जाएगा, हमारा अस्तित्व को कायम रखने के लिए हमें हर कदम पर एक दूजे का सहयोग जरुरी होता है, परन्तु इंसानी फितरत है, कब मन बदल जाए, इस चंचलता को भी लगाम देने के लिए हर सहयोग को मूल्य आधारित करना जरुरी हो गया तो अर्थ को अपनाना लाजमी था, और बहुत सारे शारीरिक सहयोग के लिए अर्थ समर्थित व्यव्यस्था का निर्माण किया गया, जिसे हम अर्थ व्यवस्था के नाम से पहचान लेते है। हॉलंकि आत्मिक और नैतिक सहयोग में अर्थ को सीमित दायरे में जरुरत के अनुसार आज भी रखा जाता है। सहयोग को कई तरह से वर्गीकृत किया जा सकता है जैसे शारीरिक, मानसिक, और आत्मिक, शारीरिक सहयोग की भूमिका का अवलोकन किया जा सकता है, बाकी दो सहयोग का अनुभव वंदन किया जाता है। सहयोग को कभी कभी वापस लेकर भी कुछ परिणामों को बदलने की चेष्टा भी की जाती है, उसे हम “असहयोग” के नाम से जानते है। इसका सही और सटीक उदाहरण महात्मा गांधी का असहयोग आंदोलन के रुप से जग जाहिर है, उनका यह परीक्षण हमारे सर्व हित में था, अतः सफल रहा और विश्व में नेल्शन मण्डेला जैसे नेताओं ने अपने देश की स्वतन्त्रता के लिए अपनाया। चूँकि काफी भावुकता से सम्बंधित होता है इस प्रकार का सहयोग भरा असहयोग अतः मानव कल्याण सम्बंधित उद्देश्यों में ही इसका प्रयोग उचित लगता है।

सहयोग की खासियत इस बात से भी समझनी सही होगी की इसमे त्याग की भूमिका अहम रहती है, चाहे वो शारीरिक, मानसिक परिश्रम, समय या फिर अर्थ और वस्तु या फिर कोई और, देने वाले को अपना हिस्सा इसमे लगाना ही पड़ता है, अतः गुणवत्ता के आधार पर इसका लेन देन किया जाय, तभी सहयोग की सार्थकता सफल हो सकती है। जीवन को चमत्कारिक बनाने के लिए यह जीवन सूत्र काफी सक्षमता प्रदान करता है, इस पर हमें सूक्ष्मता और गंभीरता से समझना चाहिये।

सहयोग की भावना में पवित्रता जितनी होगी उतना ही इसे प्रभावकारी बनाया जा सकता है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार “संदेह करने वाले व्यक्ति के लिए प्रसन्नता ना इस लोक में है, ना ही कहीं और, अतः हैलन केलर का कथन ” Alone we can do so little ; together we can do so much.” हमारे व्यक्तित्व विकास के लिए, काफी प्रेरक हो सकता है, ध्यान रखना सही होगा।… क्रमश….

लेखक**कमल भंसाली**

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