🌹असंभव 💮जीवन सूत्र.. भाग 1🐌 कमल भंसाली

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जीवन को हम सभी सुख और शांति की कल्पनाओं के साथ जीने की कोशिश करते है, और यह सही भी लगता है। संभावनाओं से संचालित जीवन को समझने में काफी समझदारी है। जब बात समझदारी की कर रहे है, तो यह भूलना हमारे लिए सही नहीं होगा कि जीवन पाने वाले सभी वर्गो में मानव जीवन सर्वश्रेष्ठ और सार्थक होता है। जितने विकल्प मानव जीवन को मिले है, उतना भाग्यशाली और शायद ही कोई वर्ग हो। पशु पक्षियों को ही लीजिये और गौर कीजिये वे कितने मजबूर, तन्हां और निस्सहाय होते है, उन्हें अपनी सीमित गतिशीलता पर शायद बहुत दुःख होता होगा। जीवन मानव का इतना कीमती है, की खोने के बाद हम उसको पाएँगे या नहीं कह नहीं सकते, तो फिर उसके प्रति हमारा नजरिया कभी कभी कमजोर क्यों होने लगता है ? यह चर्चा हमें यहां जरुर करनी चाहिए।

सबसे पहले हम अपने जीवन की उद्गमता के बारे में ही बात करे, तो चर्चा की सार्थकता बढ़ सकती है। सबसे पहले यह समझने की बात है, जीवन प्रेम का ही एक उत्पादन है, कभी अगर इसमें कोई दूसरा दूषित तत्व अगर समा भी गया है, तो भी बिना शारीरक मिलन ये धरती पर नहीं आता। प्रेम के दो पूरक तत्व पुरुष और स्त्री दोनों में समान भाग से विभक्त किये गए, उनके अनुसार ही दोनों के देह को निर्मित किया गया है। कोई भी कारण से अगर दोनों तत्व एक इंसान में आ गए या किसी एक तत्व की आंतरिक कमी रह गई है, तो वो जीव उत्पादन की प्राकृतिक क्षमता से दूर हो जाता है। तथ्य पूर्ण यह भी कहा जा सकता है, जीवन से जीवन तैयार होता है। हमें यहां इस चर्चा को सीमित ही रखना उचित होगा क्योंकि जिसको जीवन मिलता वो अच्छी तरह से जानता है, वो इस संसार में कैसे आया, पर आने का सही उद्धेश्य सब नहीं जानते या जानकर भी अपनी कई कमजोरियों के कारण उसे सही दिशा नहीं दे पाते। अभी हमारा इसी विषय पर इतनी चर्चा करना ही सही होगा और उन दूसरे जीवन तत्व को तलाशने की कोशिश करते है, जिनसे जीवन हमारा महत्व पूर्ण हो सके।

1.शरीर ..जीवन का पहला सूत्र…..

जीवन का सबसे पहला सही सूत्र है, हमारा अपना वजूद या हमारा शरीर जिसके हम मालिक बने है, और उसके प्रति हमारी जिम्मेदारी सूक्ष्म होते हुए भी बहुत महत्वपूर्ण होती है, परन्तु उसके प्रति हमारा नजरिया ज्यादातर काफी लापरवाही का सा रहता है, जो किसी भी तरह उचित नहीं कहा जा सकता। शरीर पंच तत्व से बना है, भारतीय दर्शन में सभी पदार्थों के मूल पञ्चत्त्व माने गए है। पृथ्वी (ठोस), आप (जल, द्रव ), आकाश (शून्य), अग्नि (प्लाज्मा), और वायु (गैस) यह पांच महाभूत है, जिनसे सृष्टि का प्रत्येक पदार्थ बना है। लेकिन इनसे बने पदार्थ जड़ यानी निर्जीव होते है, सजीव बनाने के लिए इनको आत्मा की जरुरत होती है। मानव चूँकि सजीव प्राणी है, अतः वो शरीर और आत्मा दोनों का मालिक एक तय अवधि तक होता है, जिसे हम हमारी उम्र भी कहते है। अतः इसकी क्षण भंगुरता का ज्ञान भी हमें नहीं भूलना चाहिए। कौशिश हमारी सदा यही होनी चाहिए कि इन दोनों के प्रति हमारी जागरुकता बनी रहे। कहने को यही कहा जा सकता है, ऐसे कर्मो से बचना ही श्रेयस्कर होगा जिनसे इनका शीघ्र क्षय होता है। प्रतिदिन के जीवन में शरीर को स्वस्थ और आत्मा को पवित्र रखना सही होगा।

चलिए, हम शरीर की विभिन्न गतिशीलता के प्रति पूर्णरुप से जागरुक होकर उन तत्वों की तरफ अग्रसर होते है, जिनसे हमारा जीवन अपनी सार्थकता साबित कर सकता है। समय के कण कण को समर्पित जीवन अपनी मंजिल की तरफ कई रास्तों से गुजर सकता है। तय यही है, कि विभिन्न परिस्थितियों का सामना इसे करना पड़ता है, उनमें कुछ सहज, सरल तो कुछ विषम और कठिन भी होती है। जीवन अपने अस्तित्व को सही सलामत रहकर तब ही सामना कर सकता है, जब सभी सक्षम बिंदुओं पर उसकी पकड़ मौजूद हो। इन्ही सक्षम बिंदुओं से केंद्रित हो जब जीवन आगे बढ़ता रहता है, तब हम उसे समर्थवान जीवन बना सकते है, जो हर आगे आने वाली पीढ़ी का प्रेरणा स्त्रोत बन सकता है। यहीं चिंतन सही जीवन की उत्तमता है।

2. “असंभव”….संभव सूत्र

हम प्रारंभ से ही उन कमजोर मानसिक तत्वों के चिंतन से करते है, जिनका नहीं होना ही एक शक्तिशाली तत्व का निर्माण करता है। मेरे चिंतन के अनुसार जीवन चूँकि संभावनों की धुरी पर ही ज्यादा गतिशील रहता है, अतः प्रथम हमे असंभव शब्द को ही परख कर निर्णय लेना चाहिए, कि क्या यह हमारे अनुकूल कार्य करता है ? अगर नहीं तो जीवन में इसका स्थान नगण्य ही उचित रहेगा।

“असंभव” शब्द मानसिक निराशा का उत्तम परिचय है, इस शब्द की यह एक अजीब गरिमा है। असंभव शब्द का जब भी प्रयोग किया जाता है, तो उसके भय को कम करने के लिए कुछ सार्थक शब्दों का उपयोग करना जरुरी हो जाता है। वैसे तो नेपोलियन जैसे दिग्गज शासक ने कहा भी कि असंभव शब्द बुद्धिमानों के शब्दकोश में नहीं होना चाहिए। पर यथार्थ में सब नेपोलियन की तरह बुद्धिमान नहीं होते अतः असंभव शब्द के बारे में हल्की सी चर्चा यहां सही होगी क्योंकि एक साधारण इंसान अपनी क्षमताओं का सही मूल्यांकन बिना ज्ञान अर्जित करने में असमर्थ होता है। चूँकि असंभव शब्द का ताल्लुक सफलता और असफलता दोनों से कहीं न कहीं रहता है, तो असंभव को उपेक्षित रखना संभव नहीं है। अंग्रेजी शब्दकोश में असंभव शब्द को कई नकारत्मक शब्दों के द्वारा प्रकट किया जा सकता है, मसलन impossible, hard, unproductive, undesirable और भी ऐसे अनेक शब्दों से शब्दकोश भरा है, परन्तु संभावना का तत्व हर शब्द में समाया है, अतः जीवन की सकारत्मक चेतना ऊपरी सतह तक इन पर नजर डालती है, तब तक जब तक निराशा का गहन आक्रमण जीवन को असहनीय न कर दे। सफल और दृढ़ शक्ति वाले व्यक्तित्व अंसभव के आस पास भी नहीं फटकते, न ही उनकी रूचि उसे जानने की होती है। अगर जीवन विज्ञान के किसी भी पहलू पर गौर से चिंतन करे तो समझ में आ सकता है, अंसभव आत्मिक चेतना को स्त्रोत प्रदान कर, कुछ मूल्यांकित निर्माण का मार्ग परस्त करना चाहता है, जिनका सही गुणपूर्ण मूल्यांकन कोई विरला ही कर सकता है, ऐसे ही एक वैज्ञानिक थे, आइंस्टीन। वो बार बार असफलता को जरुर स्वीकार करते, परन्तु संभव ही सदा उनके दिमाग में रहता और अपने पिछले प्रयास की कमियों को दूर करते रहते, नतीजन उन्होंने अंत में असंभव को संभव में बदल दिया।

जीवन की सार्थकता में अगर बढ़ोतरी की हमारी आंकाक्षा हो तो नकारत्मक असंभावना में से असफलता के “अ” को जीवन सूत्र से निकाल कर, सार्थक कर्म की संभावनों में हमें निसंकोच प्रयासरत हों जाना चाहिए।

लभते सिकतासु तैलमपि यत्नतः पीडियत्
पिबेच्च मृगतृष्णिकासु सलिलं पीपासार्दित: ।
कदाचिदपि पर्यटच्छशाविष्णमासादयेत्
न तु प्रतिनिविष्टमूर्खचितमाराध्येत ।। (भर्तृहरि निति शतक श्लोक)

“अथक प्रयास करने पर रेत से भी तैल निकाला जा सकता है तथा मृगमरीचिका से भी जल ग्रहण किया जा सकता है। यहां तक की सींघ वाले खरगोशों को भी दुनिया में विचरण करते देख सकते है; लेकिन एक पूर्वाग्रही मुर्ख को सही बात का बोध कराना असंभव है।”

अतः चिंतन योग्य है, कि असंभव कुछ भी नहीं, सब संभव है। आर्थर सी क्लार्क की इन पंक्तियों को जरुर याद रखे, ( “The only way to discover the limits of possible is to go beyond them into the impossible. “…..क्रमश…लेखक***कमल भंसाली

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