🌒चन्द्रग्रहण🌓 कमल भंसाली🌕

लाल, मेरे

हाँ, तुम्हीं तो थे
मेरे जीवन नभ् के चन्दा
थे, तुम राज दुलारे
जब मुस्कराते तो
छितरा जाते
मेरे अरमां के सितारे
एक प्यारा शब्द
“माँ” तुम्हारा
खोल देते
खुशियों के बन्धन सारे

मेरे दिल की हर सांस
तुम्हारी धड़कन के साथ चलती
मेरे चेहरे से
तुम्हारी निगाहे नहीं उठती
आज, सच कहती बेटा
अब उनमें
यह “माँ” नहीं रहती
उम्र की दहलीज पर
आँखे झुकी रहती
टूटी कमर
बहुत कुछ सहती
मैं पुकारती
तुम नहीं आते
जब तुम्हें जरुरत होती
तो पुकार लेते
“माँ” कहकर
कोई बिना चूका
कर्ज समझ
सहन कर लेते
इस बन्धन की
कीमत कितनी जल्दी
आंक लेते
तुम समझदार हो गए
माँ बाप को
ढोने का दस्तूर
बेखुबी निभा रहे
हमें ही
बुढ़ापे में
जीने का ढंग
समझा रहे

भोली थी
कीमत अगर
कोख की जानती
तो सच कहती
नौं महीने के कष्ट को
इस तरह नहीं पालती
जिंदगी की शाम
इस तरह नहीं गुजारती
माँ होने की
बेबसी इस तरह
नहीं पहचान ती
परवरिश की कोई भूल
इस तरह सामने नही आती
नहीं जानती
तुम बदले
या वक्त बदल गया
पर कह सकती
मेरा चाँद
बादलों में खो गया
उसके फर्ज को
कोई ग्रहण लग गया
“माँ” होने का दर्द
अंत तक ठहर गया
चन्द्र ग्रहण बन
आँखों को धुंधला गया……..

रचियता : कमल भंसाली

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