🚸 दोस्ती 😃एक चर्चा भावुकता भरी🔴कमल भंसाली

रिश्तों के आकाश में कितने ही आपसी सम्बंधों के सितारे चमकते है, उनकी चमक जितनी दूर से तेज नजर आती है, शायद ही नजदीक से उतने चमकते नजर आये, पर एक रिश्ता जो खून का नहीं होते हुए भी जिंदगी की क्षितिज में ध्रुव तारा की तरह हर तरह के सुख दुःख में अपनी चमक कायम रख सकता है, उसे हम “दोस्ती” के नाम से जानते है। दोस्ती शब्द की एक बड़ी शानदार परिभाषा पुरानी फ़िल्म दोस्ती के इस गाने के शुरुआती मुखड़े से उजगार होती है,

“मेरा तो जो भी कदम है, वो तेरी राह में है
के तू कहीं भी रहे तू मेरी निगाह में है ”

क्या वास्तव में दोस्ती को इस तरह से महत्वपूर्ण दर्जा दिया जा सकता है ? इस प्रश्न का उत्तर बड़ा संक्षिप्त है, अगर दोस्ती सच्ची और पवित्र हो, तथा दो दोस्त अगर अपने दिल के तार एक ही सुर में बजाते हो, जिनकी आत्मा में हर सवाल का ईमानदार जबाब हो, तो निसन्देह जीवन को इस से बड़ा किसी भी प्रेम का उपहार नहीं मिल सकता। रिश्तों का महत्व अपनी जगह कम नहीं होता, परन्तु आज के यथार्थ में दोस्ती की भूमिका बड़ी हो गई है, इससे इंकार करना, सही नहीं कहा जा सकता। कभी कभी तो ऐसा होता है, कि पारिवारिक शान्ति के लिए दोस्तों का सहयोग लिया जाता है। आज के युग में जब तकनीकी युग से ऊपर की तरफ जा रहा है, तब से पारिवारिक रिश्ते खोखले और कहने मात्र के लिए रह गए और इससे इस कृत्रिम रिश्ते का महत्व और भी बढ़ गया है।

हम अपनी चर्चा में इस रिश्ते के हर पहलू पर गौर करना चाहेंगे पर उससे पहले यह स्पष्ट करना उचित होगा कि इसकी कोई सटीक उम्र की बात नहीं कर सकते पर हाँ, इसे हम समझदारी का रिश्ता कह सकते है। जब तक दोस्ती करने वालों की समझ साथ चलती है, उतनी ही इसकी उम्र होती है। हकीकत में दोस्ती एक कलात्मक सम्बंध है, इसका सहजता से दो प्राणियों में निर्माण किया जा सकता है। कई ऐसे साक्ष्य है, जिनसे प्रमाणित किया जा सकता है, कि दोस्ती जीव, जन्तुओं सभी की भी जरुरत है, और वो इंसानी दोस्ती से ज्यादा सच्ची व ईमानदार मानी गई है। दोस्ती का कोई जैविक कारण ढूंढना बहुत मुश्किल होता है, परन्तु इतना तय किया जा सकता है की दिल और दिमाग दोनों के सहयोग से जन्म लेने वाला यह रिश्ता ज्यादातर अपनी उच्चतम क्षमता में भी स्वार्थ से काफी ऊपर होता है। पारिवारिक रिश्तों में अपेक्षाओं की आंशका जहां ज्यादा रहती है, वहां दोस्ती बड़ी बिंदास होती है।

आखिर दोस्ती बनती क्यों फिर किस कारण से बिगड़ भी जाती है, इसका एक संक्षित सा उत्तर है, स्वार्थ और अविश्वास। आज हम कृष्ण और सुदामा के युग की बात नहीं कर सकते क्योंकि उस समय स्वार्थ की भूमिका बड़ी ही कम होती थी, अतः उनकी जैसी दोस्ती अब सिर्फ इतिहास का उदाहरण मात्र ही है। आज ज्यादातर दोस्ती आपसी स्वार्थ से ही बनती है, और विश्वास की मात्रा तो नगण्य के समान या ऊपरी सतह की पर्त मात्र है। इस तरह की दोस्ती जरुरत की दोस्ती कह लाती है, और ये ज्यादातर राजनेताओं, अधिकारीगण, प्रसिद्धि पानेवाले लोगों में और उच्चतम धनाढ़्य लोगों के अंतर्गत ही होती है। कहने की जरुरत नहीं ऐसी दोस्तियों की बुनियाद दिल से नहीं दिमाग से बनती है। इनकी उम्र जरुरत के अनुसार ही होती है, और रोजमर्रा की जिंदगी में बेखुबी से प्रयोगित होती रहती है। इनके टूटने से सुख दुःख का कोई अनुभव नहीं होता। दोस्ती शब्द की मजबूरी ही कहिये ऐसे सम्बंधों में उसका प्रयोग किया जाता है, हकीकत में जब की एक भी सद् गुण का मिलना उस सम्बोधन में मुश्किल होता है।

चूँकि हमारा ध्येय दोस्ती को अंदर तक आज के युग के अनुसार जानने का है, तो हम उस दोस्ती की बात थोड़ी यहां करले, जो सचमुच में हमारे लिए उपयोगी है, तो शायद हमारा मकसद अधूरा नहीं रहे। आधुनिक युग ने इंसान के दिल की परिभाषा प्यार के सम्बंध में बदल दी है। प्यार आत्मिक नहीं शारीरिक सुख का साधन बन गया है। बात यहां तक भी रहती तो शायद ठीक थी, परन्तु जब अर्थ की उतप्ती भी इससे करने की सोच दिमाग में पनपने लगे तो शायद दोस्ती शब्द खंजर का काम करने लगे। आप और हम इस से वंचित कब तक रह सकेंगे ! यह चिंतन और चिंता का विषय है। आज जन्म लेने के बाद जब बच्चा कुछ ही साल बाद फ़ेसबुक जैसी सोसियल साइड पर अपनी प्रोफाइल बनाता है, और दोस्ती के लिए निमन्त्रित करता है, तब ख्याल आता है, उन दोस्तियों का जो कभी गांव की गलियों में तैयार होती और बिन निमन्त्रण सच्ची गुणवता के आधार पर बनती, कहना ना होगा, ऐसी दोस्ती जिंदगी भर अपनी महक से लिपटी रहती, जब भी साथ होती, ख़ुशी का वातावरण तैयार करती। फ़ेसबुक तथा अन्य सोसियल साइड जो दोस्ती को बनाने का काम करते है, वो मानव की त्रासदी है, या प्यार की आकांक्षा, कहना फिलहाल मुश्किल ही है, पर वक्त की शंका गलत भी नहीं है, आदमी, आदमी कम व्यपारी ज्यादा बन गया है। खुदा ख़ैर करे।

किसी भी चीज का हर पहलू अच्छा या बुरा नहीं होता है, उसका उपयोग ही उसे अच्छा या बुरा बनाते है। आज जिंदगी जिस तरह से बिखर कर अनुशासनहीन हो रही है, उसमे हम अपनी कुछ इच्छाओं का तुस्टिकरण जरुर इस तरह के मीडिया से करते है, परन्तु दैनिक और व्यवहारिक दुनिया में तो सजीव दोस्ती ही सही काम करती है। भावनओं से सजी दोस्ती का हर मर्म समझती है। अतः हम अभी सजीव दोस्ती के ऊपर ज्यादा समय दे सके, तो जिंदगी का आनन्द कुछ और ही होगा, सोसियल मीडिया की दोस्ती बिना किसी गुणवत्ता के कई एब तो देती है, पर तन्हाई का भी कोई उपचार नहीं कर पाती।

अगर हमारे पास कुछ दोस्त है, तो उन्हें अगर बेहतर ढंग से जानकार जीवन को हम सुगम ढंग से जीने की कल्पना कर सकते है, आवश्यकता इतनी है, दोस्त को मान सम्मान हमसे मिले, जरुरी नहीं की हर समय वो साथ चले पर जीवन की कठिनता में अगर बिना कोई प्रश्न किये, वो अपनी क्षमता के साथ खड़ा है, तो समझिये एक सच्चे दोस्त की महत्वपूर्ण सम्पदा आपके पास है। तभी तो अल्बर्ट कामुस ने कहा ” Don’t walk behind me; I may not lead. Don’t walk in front of me; I may not follow. Just walk beside me and be my friend.”

वैसे दोस्त बनने का कोई कारण होना जरुरी नहीं है, कोई जब चाहे दोस्त बना सकता या बन सकता है, वास्तव में ऐसे सम्बंधों की हकीकत सिर्फ जीवन के ऊपरी धरातल तक ही सीमित रहती है। माना, चन्द क्षणों की जान पहचान भी दोस्ती में तबदील होते देरी नहीं लगती, परन्तु उम्र की तराजू से इस तरह की दोस्ती को गंभीरता से नापना सहज नहीं होता। आइये, संक्षिप्त रुप से दोस्ती के प्रकार की चर्चा करते है, हालांकि यह दावा नहीं है, इनके अलावा और भी प्रकार की दोस्ती नित नये अनुभव के द्वारा हर रोज सामने आकर अपना अंत भी बता जाती है।

1.सच्ची दोस्ती
2. आकर्षण की दोस्ती
3. वैचारिक दोस्ती
4. मीडिया द्वारा दोस्ती
5. मजबूरी की दोस्ती
6. स्वार्थ की दोस्ती
7. राजनैतिक दोस्ती

चूँकि सभी प्रकार की दोस्ती स्वयं को खुद परिभाषित करती है, सिवाय, एक सच्ची दोस्ती को छोड़ कर क्योंकि सब कि कोई वजह बनती है, उनकी गुणवता की चर्चा करना कोई अच्छी बात नहीं है। अतः जो दिल, आत्मा को जीवन पर्यन्त सन्तोष दे, की , कि मेरे पास एक सच्चा और सही दोस्त है, हकीकत में वो ही ” सच्ची दोस्ती ” होती है । ऐसी पवित्र दोस्ती के लिए खुद को भी सच्चा और संयमित बना रहना जरुरी है।

” छुपा हुआ सा मुझ ही में है तू कहीं ऐ दोस्त
मेरी हँसीं में नहीं है, तो मेरी आह में है……( फ़िल्म दोस्ती )

चर्चा यहीं समाप्त नहीं होती……..लेखक कमल भंसाली……क्रमश

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.